मंगलवार, 24 नवंबर 2015

एक अनन्त गहरा कुँआ !!!!

घनी झाड़ियों में छिपा हुआ,
एक अनंत गहरा कुँआ।
पाताल तक गहरा,
शायद उससे भी ज्यादा
कहते थे ऐसा सभी,
जब भी इसमें फेंका पत्थर,
जानने को कितना गहरा ?
आज तब एक आवाज नहीं किया।
गूँगा है,
बूढ़ा भी है।
अंदर के दीवारों की छपाई,
उधड़ गई है।
कोई अब नहीं जाता है उसके पास,
मनहूस भी है।
कहते थे ऐसा सभी,
लील ही लेता है।
जो भी गिरता है इसमें।

पता नहीं क्यूँ,
पर कई तो कूदे थे इसमें,
आज तक एक आवाज नहीं आई।
भूखा भी है।

आम हलचल से दूर,
अकेला पड़ा,
झाड़ियों ने जिसके मुँह को है ढक रखा।
एक अनन्त गहरा कुँआ।

मैंने एक दिन उसमें झाँका,
और आवाज़ लगाई ।
ओये! कुँए कब तक नहीं बोलेगा?
इतने दिनों तक चुप रहकर
शायद बोलना ही भूल गया।

हर बरसात के बाद मुँह में पानी,
भर कर बैठ जाता है।
इस बार सूखे,
पर कुछ तो बोलेगा।

अकेला अनमना सा,
उदास होगा शायद,
इसकी पसंद का ही कुछ
देकर देखता हूँ।
कितना कुछ व्यर्थ पड़ा है।
मेरे पास,

लेकिन कितना कुछ डालकर देखा,
एक आवाज़ न आई।
अब कि बार एक ऐसी चीज़,
उसके पास लेकर गया दिखाने को,
जो मेरी मनपसंद थी ।
मैं सतर्क था पर पता नहीं,
कैसे हाँथ से छूट गई ।

मैं चिल्लाया,
अंदर से भी वैसी ही आवाज़ आई।
मेरे पास से गई।
और उसको मिल गई।
एक के बाद एक,
मैं और कुँआ ।
उसका नाम पुकारते रहे।

तब से आज तक,
कुँए ने वही बोला।
जो मैं बोलता हूँ।

मैं ने पूँछा,
क्यों रे कुँए ?
मेरी दी हुयी चीज़ इतनी पसंद आ गई।
मैं तब से,
जवाब के इंतज़ार में चुप हूँ,
और शायद कुँए को अब मुझ से,
बात करने में दिलचस्पी रही नहीं।







कल रात माता का मुझे ईमेल आया है ।

ज्यादातर हिन्दू भगवान की मूर्तियों में -
१) भगवान खड़े रहते हैं।
२) भगवान आशीर्वाद दे रहे होते हैं। 
३) भगवान के हाथों में अस्त्र-शस्त्र होते हैं।
    
     ( पिछले दिनों एक गाना बड़ा प्रचलित था। जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे - कल रात माता का मुझे ईमेल आया है माता ने मुझे फेसबुक पर बुलाया है। ये बात आज हास्यास्पद लग सकती है। लेकिन सोचिये जब भगवान की मूर्ति के हाथों में इलेक्ट्रानिक गैज़ेट होंगे, एक हाथ में लैपटॉप, दूसरे में स्मार्ट फ़ोन हो। तब ये सोचना बिलकुल लाजमी होगा की माता का ईमेल मुझे क्यों नहीं आया ? )

     मूर्ति का निर्माण अक्सर एक पूर्वधारणा लेकर किया जाता है । एक परिस्थिति सोची जाती है उसके बाद मूर्ति का निर्माण किया जाता है । मूर्तिकला चित्रकला का थ्री डायमेंशनल व्यू होता है इसलिए मूर्ति का प्रभाव मानव मन पर भी चित्र से कहीँ अधिक होता है । चित्रकला से मूर्तिकला की तनिक सी समानता के कारण चित्र कला के किंचित आधारभूत गुण एक आदर्श मूर्ति से भी अपेक्षित होते हैं।
      हमारी नैतिकता का एक स्रोत धर्म है। धर्म हमें नैतिकता के आधार भगवान को अपना आराध्य मानने की अपेक्षा रखता है । सामान्यतः भगवान को मानने से बहुदा धार्मिक व मनोवैज्ञानिक उलझनों का जवाब सरलता से मिल जाता है । 
       परंतु यहाँ प्रश्न यह नहीं है। सोचने की बात ये है कि शक्तिपीठों में स्थापित पिंडो से लेकर बुद्ध और महावीर की ऊर्ध्वाधर गगन चुम्बी मूर्तियों की व्यवहारिकता कितनी है ? अर्थात् ये मूर्तियाँ केवल आशीर्वाद दे सकती है क्या ? ये हमें एक गैर लचीले नियम में बाँधती है जिसमें भगवान से हमारा रिश्ता फिक्स हो गया है। 
       पिछले दिनों हिंदी के जाने माने अख़बार पर एक लेख पढ़ा । लेख हनुमान जी की बदसूरत सी दिखने वाली मूर्ति पर था । लेखक का मानना था जब हमारी चेतना में हनुमान जी की इतनी शक्तिशाली छवि है तो उनकी ऐसी मरियल सी मूर्ति बनाना कैसे उचित हो सकता है ? यूरोप के देवताओं की नंगी मूर्तियों को देख कर हमें शर्म आ जाती है इस प्रकार का भाव मन में आना में ही उस मूर्तिकार की सफलता है । शर्म तो हमें आती है उनके लिए तो धरोहर है। 
       जो बात कहने के लिए इतनी भूमिका बांधी गई वो बात बहुत साधारण सी है कि जगजीत सिंह के एक वीडियो में एक बच्ची राम को अपना भाई मानती है। देश में कौन से मंदिर में राम जी मूर्ति को देख कर पाँच साल की लड़की को उसमें अपना भाई दिखेगा ? निश्चय ही किसी में भी नहीं । इसीप्रकार फेसबुक पर एक फ़ोटो तैर रही है जिसमेँ लगभग 5-6 साल की बच्ची हनुमान जी की मूर्ति से गले मिल रही है और मूर्ति तब भी आशीर्वाद दे रही है । मेरा मानना है एक ऐसी मूर्ति बननी चाहिए जिसमेँ भगवान से गले मिलने का सुख भी मिल सके और लगे भगवान भी हमसे गले मिलने में सहज मासूस कर रहे है क्योंकि निकटता से प्रेम बढ़ता है। 
        नैतिकता का बीज बचपन में बोया जाता है इसलिए मंदिरों में मूर्तियाँ बच्चों का मनोविज्ञान ध्यान में रख कर बनानी चाहिए न की तलवार, भाला लिए हुए और सिर्फ आशीर्वाद देते हुए

    

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

निराश मत होओ, सब ठीक हो जायेगा

"निराशा से सिर्फ मन घायल होता है, हमारी नसमझी हमारी जान ले लेती है । "

      मनोनुकूल जीवन न होने के कारण निराश होना मन का स्वाभाविक लक्षण है। ऐसे में किसी के यह कहने पर की "निराश मत होओ सब ठीक हो जायेगा "। सिर्फ और सिर्फ कोरा झूठ प्रतीत होता है जो कि मन बहलाने के लिए बोला जा रहा है । हालाँकि हो सकता है, ऐसा बोलने वाला हमारा हित ही चाहता हो फिर भी उसकी इन बातों से मन का हाल और जीवन का अकाल दोनों ही दूर तो नहीं हो पायेगा । और इसकी जकड़न के बढ़ने का परिणाम अत्यंत भयवाह होता है । निराश और हताश व्यक्ति ही आत्महत्या करते हैं। मच्छर और मक्खी से बचने के लाख जुगत भिड़ने वाला मनुष्य खुद को मर लेगा । सुनने भर से विश्वास नहीं होता । आत्महत्या की ऊँची दर वैश्विक समस्या है । विश्व में, हर 40 सेकेण्ड में एक मनुष्य खुद को मर लेता है । 
      देख लिया इतनी खतरनाक चीज़ है निराशा। निराशा और कुछ नहीं मनुष्य के पञ्च चिर शत्रुओं का ही ऐसा मिश्रण है जिसमें इन पाँचों के विपरीत गुण भरे हुए है । उदाहरण के लिए सामान्यत: निराश व्यक्ति स्वतः भले क्रोध, काम, लोभ से बचा रहे पर उससे जुड़े अन्य लोगों में वह इन भावों को बोता और सींचता रहता है । निराश व्यक्ति वास्तव में चलता फिरता शांति विनाशक यंत्र है । 
       ऐसे में निराशा के साथ किये गए प्रयोग के कुछ संभावित परिणाम अग्र लिखित है । शायद ये आपकी या आपके किसी अपने के मन से निराशा को दूर कर आशा का संचार कर सके । और हाँ ये प्रयास उस एक बेकार लाइन से लाख गुना अच्छे है जिसमें कथा कथित शुभचिंतक ये कहते है कि 'निराश मत होओ सब ठीक हो जायेगा' । ऐसे में एक ही बात बोलने का मन करता है-" घण्टा ठीक हो जायेगा, आप के ऊपर आएगा तब पता चलेगा और तब देखूँगा कैसे सब अपने आप ठीक होता है ?"


(१) सबसे पहले निराशा को मन का स्वाभाविक गुण मानते हुए अपनी निराशा को और उसके कारण को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना चाहिए । ऐसा करने से आपको अपनी भावनाओं की सही समझ बनेगी । कभी-कभी निराशा के कारण इतने संश्लिष्ट होते है कि उनको पहचानना कठिन होता है । ऐसा करके आप खुद को जान पाएंगे । और सबसे मजेदार बात आप यह जान पाएंगे कि किसी विषय में कौन-सी बात आपको सबसे ज्यादा मानसिक स्तर पर चुभ रही है और तब आप अनायास ही मन ही मन कहेंगे "ओ तेरी, अबे इस बात को लेकर मैं इतना परेशान हूँ । " व्यक्ति केवल चिंतन न करने के कारण सामान्य सी बातों को भी नज़रअंदाज़ कर देता है । ऐसा करने से बचें ।

(२) अपने जीवन की परिस्थितियों को आप से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता । हाँ हाँ ! वो चाहे कितना बड़ा बाबा या फ़क़ीर हो । दूसरों से जल्दबाजी में अपने भाव शेयर न करें । क्योंकि वो कुछ नहीं कर सकते वो केवल वही घिसी पिटी पञ्च लाइन " निराश मत होओ......." दे सकते हैं । और आपके इस कुत्सित मानसिक दशा से बाहर निकलने के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं । इस तरह का हर असफल प्रयास आप को और निराश के दलदल में धकेलते जायेंगे ।

(३) यह बिंदु सबसे महत्त्वपूर्ण है । समस्या को पहचान जाने के बाद उसके वास्तविक हल का विकल्प खोजें (बस इतनी सी ही बात है) । यह उपाय अखंड, अपराजेय, सब मन शोक निवारक, विशेष तरीकों से सिद्ध किया हुआ है । यह उपाय किसी भी निराशाग्रस्त मन से उसके निराशा के कारण को क्षण भर में तो नहीं हटा सकेगा पर हाँ हटाना शुरू जरूर कर देगा । अब समस्या बढ़ेगी नहीं । धीरे-धीरे ही सही उपचार होने लगेगा ।
एक आम जीवन की परंतु काल्पनिक-सी परिस्थिति को लेकर इसका परिक्षण करके देख सकते है जैसे कि मान लेते हैं कोई परीक्षार्थी किसी अमुक 'सफलता' की प्राप्ति की आकांक्षा में मेहनत करता है और हर बार विफल हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसके मन में निराशा घर कर जायेगी । कुछ भी करने का उसका मन नहीं करेगा । और इस मनः दशा के साथ उसका जीवन दिन ब दिन कठिन होता जायेगा । सम्भावना है कि एक विषम दिन वो आत्महत्या भी कर ले । ऐसी स्थिति में यदि विकल्प रूप में उसे शीघ्रता से कोई अन्य सफलता मिल जाती है तो निश्चितरूप से उसकी निराशा में कमी आएगी ।

कुछ अन्य अवलोकन का भी सहारा लेकर इसे समझ सकते हैं । मान लेते है कि कोई व्यक्ति किसी बड़े व प्रतिष्ठित संस्थान से इंजीनियरिंग करना चाहता था परंतु ऐसा नहीं हो पता है तो वह किसी अन्य संस्थान से भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर सकता है । और यदि वो ऐसा कर पता है तो उसके जीवन में कम से कम इस कारण से कभी भी स्थाई और दृढ़ निराशा नहीं छायेगी ।

(४) विकल्पों की जहाँ भी बहुलता होगी । वहाँ निराशा के मामले कम मिलेंगे । व्यक्ति सिर्फ अपनी आकाँक्षाओं की पूर्ती करना चाहता है । स्वाभाविक सी बात है जब एक ही प्रकार की इच्छा कई लोग पालेंगे तो कुछ को निराशा और विफलता हाथ लगेगी ही परंतु ऐसे में भी मनुष्य को चाहिए की तुलनात्मक रूप से समानान्तर विकल्प की तलाश करते हुए सदा आशावादी बने रहने का प्रयास करना चाहिए ।

"निराशा से सिर्फ मन घायल होता है हमारी न समझी हमारी जान ले लेती है । "

सोमवार, 16 नवंबर 2015

मुझे तो जाना ही था ।

खोजते हुए ठिकाना,
मेरा वहाँ आना,

शायद वो दो थे,
एक हो ही पाना ।
बाजू वाली कुर्सी पे नज़र पड़ते ही,
मेरा समझ जाना,
और चुप चाप वहाँ से चले जाना,
मुझे तो जाना ही था ।

किसने सोचा था,
होगी ऐसी मुलाकात,
आँखों का टकराना ।
न मुझे कुछ कहना था ।
और न उसने कुछ कहाँ,
ऐसा ही होगा पता था ।
रो रो कर खुद को समझाना ।
की मुझे तो जाना ही था ।

ऐसा कैसे हो गया ?
मैंने कभी खुद के लिए,
जो नहीं माँगा,
वो कैसे मैं समझ गया ।
करीब एक घंटे बिताने का इरादा था मेरा,
पर पता नहीं क्या हुआ,
मैं उठा और सेकंड भर में वहाँ से चला गया,
क्योंकि मुझे तो जाना ही था ।

ये बात उसको कैसे बताता,
की उसकी विवश्ता को,
समझता हूँ मैं न ।
इसलिए तो ,
कुछ कहे बिना ही चला गया ।

क्योंकि मुझे तो जाना ही था। 

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में न्याय को अपने हाथ में लेने का जूनून तथा कंगारू न्याय की सोच  कँहा तक जायज है ? क्या दिमापुर घटनाक्रम ने भारत की न्याय व्यवस्था की लचर स्थिति को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है ?
 भारत, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जिसकी आबादी लगभग सवा सौ करोड़ के पास है । विश्व में इतनी बड़ी आबादी के साथ संसाधनों के सदुपयोग को सुनिश्चित करने के साथ संसाधनों का विकास एक बड़ी चुनौती और समस्या है । संसाधनों में सबसे महत्वपूर्ण मानव संसाधन है । मानव ही अपनी विवेक अनुसार अन्य संसाधनों का उपयोग करता है इसप्रकार आर्थिक समृद्धि ही सामाजिक विकास सुनिश्चित करता है ।
        अशिक्षित और अकुशल मानव संसाधन देश के लिए बोझ के सामान है और सामाजिक बुराई में वृद्धि करता है । अविकसित मानव संसाधन वाले समाज में अपराधों का दर भी अधिक होता है इसलिए एक अति विशाल और कार्यशील न्यायतंत्र की जरूरत होती है । परंतु भारत की व्यापक जनसंख्या के लिए यहाँ का न्याय तंत्र अपर्याप्त, लचर और बहुत धीमा प्रतीत होता है।
         भारत में आधुनिक न्याय व्यवस्था का शुभारम्भ  1772 से हो गया था। जिसमें  पूर्ववर्ती ब्रिटिश सरकार और स्वतंत्र भारत की सरकार के द्वारा आवश्यक सुधार किये गए परंतु सुधार की मांग की तुलना में आपूर्ति के अत्यंत धीमे होने के कारण अधिकांश मामलो में न्याय व्यवस्था की आलोचना की जाती है ।
         न्याययिक मामलो में भ्रष्टाचार, वकीलो के द्वारा मांगी गई ज्यादा फीस, न्यायप्रक्रिया का धीमापन और ताकतवर के पक्ष में ही न्याय होने की मान्यता ने सामान्य जान मानस में लोकतान्त्रिक न्यायव्यवस्था में विश्वास रखने की बजाय कंगारू न्याय को अपनाने की ओर बढ़ रहे है । ऐसा होने पर मात्र आरोप के आधार पर सजा दिया जाने लगेगा इसमें न्याय होने की गुंजाईश बिलकुल शून्य हो जायेगी ।
          भीड़ का न कोई चेहरा होता है और न ही कोई दिशा । कंगारू न्याय या सड़क पर न्याय की प्रवृत्ति लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलने का परिचायक है । जो की किसी भी शर्त पर अस्वीकार्य है ।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

मुझे भी अब चुभने लगा है !

"यदि मुझे अपनी जाति को भूल कर आरक्षण सही लगता है तो अपनी आर्थिक स्थिति को याद करके उतना ही गलत भी लगता है"
"आरक्षण का विरोध जायज है और उस विरोध का समर्थन भी पर .र..र..र..र न्तु। "

      घर में सबसे बड़े होने के कारण पहले सभी से बहुत सारा प्यार और दुलार मिलता था । जैसे-जैसे छोटे भाई और बहन परिवार में आते गए । अब वो बात नहीं रही, किसी चीज़ को बाँटना मेरे लिए बहुत कठिन हो गया। अचानक से सेंटर ऑफ़ अट्रैक्शन कहीँ और शिफ्ट हो गया था। उस वक्त 5 साल की उम्र में ये समझना कठिन था कि ये अचानक सब को क्या हो गया। वैसे ये तो बेहद सरल सा नियम है कि जिस भी चीज़ का मार्केट में विकल्प उपलब्ध हो जायेगा उसकी यू. एस. पी. पर बट्टा लगना तो तय है। अब जीवन में प्रतिस्पर्धा सा अनुभाव होने लगा परन्तु प्रतिस्पर्धा में तो कोई न कोई विजेता होता है । मगर यहाँ तो घरेलु समाजवाद आ गया था जिसमें " क्षमता के अनुसार काम और आवश्यकता के अनुसार सुविधाएं " का नियम चलता था। अब बस सोचने को रह गया था कि वो भी क्या दिन थे ?  किसी ने सच ही कहा है कि समाजवाद सिर्फ सोचने में अच्छा लगता है ।
       लेकिन यहाँ पर बालकाण्ड से इस लेख का  श्रीगणेश करने का क्या औचित्य हो सकता है ? कुछ तो जरूर होगा तभी लिखा गया है। 

        50 के दशक से पहले तक अंग्रेजों की गुलामी सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्या थी। इससे  निजात पाने के लिए दलितों, किसानों और जनजातियों ने भी संघर्ष किया था तो नवनिर्मित राष्ट्र किसी एक को महत्त्व कैसे दे सकता है ?

        ऐतिहासिक परिदृश्य में देखे तो जब तक समाज की संरचना इस प्रकार की थी कि उच्च वर्ण सत्ता, संसाधन और शक्ति का एकमात्र उपभोगकर्ता था तब तक तो सब ठीक था । मगर जैसे ही देश में लोकतंत्र के आने के बाद सभी के साथ और सभी के विकास की बात होने लगी तो पहले से स्थापित जमींदारो, पूंजीपतियों के पेट में दर्द उठना स्वाभाविक था। अब जन्म जात स्वामित्व छीनने वाला था, जो कल तक बराबरी में चलने की हिम्मत नहीं करते थे वो अब साथ में बैठने वाले थे । सिर्फ बाहर से कानूनी दबाव के कारण भाईचारे का दिखावा तो कर लिया पर अंदर से अभी भी उतनी ही दूरियाँ थी।
        
         1949 में पास हुए संविधान के कुछ अनुच्छेद उन चुनिंदा जातियों को जो पिछड़ी हुयी है और जिनका सरकारी नौकरी में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं उनके लिए सकारात्मक कार्यवाही के माध्यम से आरक्षण की व्यवस्था की। इस नई व्यवस्था से जिनको फायदा था उनका प्रसन्न होना और जिनको ऐसा लग रहा था कि  उनके साथ अन्याय हुआ है उनका क्रोधित होना अपेक्षित था। 

           आज देश के आजाद होने के बाद के 68 साल बीत जाने के बाद ऐसे क्या कारण हो सकते है ? कि बहुत प्रयास करने पर भी ऐसा लगने लगा है कि आरक्षण का विरोध भी जायज है और उस विरोध का समर्थन भी ।

इस सम्बन्ध में निम्न तथ्य व तर्क प्रस्तुत है :
           
(1) आरक्षण व्यवस्था के विरोध में सर्वाधिक उठाया जाने वाला सवाल है, आखिर कब तक ? कोई तो तारीख होगी जब यह व्यवस्था ख़त्म होगी ? कोई तो वह लक्ष्य होगा जिसकी प्राप्ति के बाद ये घोषणा की जायेगी कि अब से आरक्षण ख़त्म । यद्यपि संविधान सरकारी नौकरी और पिछड़ेपन के उन्मूलन को आरक्षण का लक्ष्य मानता है । पर क्या भरोसा? कल को पिछड़ेपन की नई परिभाषा गढ़ ली जाये । जिस देश में आज तक गरीबी की सटीक परिभाषा निर्धारित कर नहीं पाये वे पिछड़ापन क्या बताएँगे ? और जहाँ तक बात सरकारी नौकरी में भागीदारी की रही तो ऐसा क्यों लगता है सरकार को कि दलित सरकारी नौकरी ही करेंगे। मोदी जी के स्टार्ट अप इंडिया, मेक इन इंडिया, मुद्रा बैंक, सामाजिक बैंकिंग, स्किल इंडिया में आरक्षित वर्गों को उद्यमशीलता के लिए भी प्रोत्साहित कर सकते है ।
      'डिक्की' नामक संगठन दलित उद्यमशीलता को बढ़ावा भी देता है ।

(2) जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था में समय के साथ कई कमियाँ उजागर हुयी है। जिनमें से एक तो दलित आरक्षित जाति के भीतर ही अति/महा दलित आज भी अपने वर्ग के ऊपरी तबके के लोगों द्वारा शोषित है । फलस्वरूप आरक्षण का लाभ संपूर्ण आरक्षित वर्ग को न होकर सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित होकर रह गया है ।

(3) चूँकि वर्तमान समय में देश डिजिटल क्रांति और तेज आर्थिक समृद्धि के दौर से गुजर रहा है । इस दौर में सभी अर्थशास्त्री एक स्वर में महंगाई को अपरिहार्य बता रहे है । अगले कई दशकों तक ऊँची महंगाई दर इसी प्रकार बनी रहेगी । इस माहौल में जीवित रहने के लिए
देश सस्ता अनाज, तेल, नमक सभी जाति के गरीबों और वंचितों को दे रहा है तो सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थान में आरक्षण क्यों नहीं दे सकता ?

(4) आरक्षण व्यवस्था का लाभ एक बार ले चुकने के बाद भी ठीक आर्थिक स्थिति वाले परिवार कई पीढ़ियों तक इसका अवैध लाभ लेते रहते हैं जो कि अनुचित और अन्याय है। इसको रोकने का सरकार को प्रयास करना चाहिए ।

(5) एक अत्यंत रोचक तथ्य और तर्क इस व्यवस्था के विपक्ष में यह है कि अनुसूचित जाति के मुस्लिम और ईसाइयों को आरक्षण सिर्फ धर्मान्तरण के भय से नहीं दिया जा रहा । यह किस हद तक उचित है ?
      
       इसके अतिरिक्त कई अन्य ख़ामियाँ भी हो सकती है जिनका वर्णन न करने का कारण उनके प्रति मेरी अनभिज्ञता है ।

       कोई भी व्यवस्था पूर्णतः सही नहीं हो सकती। कुछ न कुछ ख़ामियाँ समय के साथ रेंगते हुए प्रवेश कर ही जाती है इसलिए सरकार को चाहिए की एक विशेषज्ञ कमिटी के माध्यम से व्यवस्था में विद्यमान त्रुटियों को दूर करने के सम्बन्ध में आवश्यक सिफारिशें ग्रहण करे और देश में बढ़ रहे आरक्षण के विरुद्ध रोष को समय रहते सीमित और नियंत्रित करें । अन्यथा गुजरात से शुरू हुयी यह चिंगारी कब भयवाह अग्निकांड में तब्दील हो जायेगी पता भी नहीं चलेगा ।
      

      
        

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

जो देखता हूँ वही लिखता हूँ ।

( दृश्य ) अपनी छोटी बेटी और सबसे छोटे लड़के के साथ एक मुस्लिम महिला । लड़की सर झुककर ही बैठी रही, काफी निस्तेज सी । अपनी माँ की जिम्मेदारियों को देखकर शायद सहमी हुई सी। छोटा बेटा मोबाइल में गेम खेलने की ज़िद लिए मोबाइल माँ के हाथों से छीनने के असफल प्रयास करता हुआ । माँ का मन चिंताग्रस्त था । तभी मोबाइल में मैं हूँ डॉन की रिंगटोन के बजने पर फ़ोन को उठाने के बाद की बातचीत के अंश अग्रलिखित है ।
     " आफ़ताब ! हाँ हाँ । सब ख़ैरियत । बड़े वाले लड़के की तबियत अब ठीक है । (माँ की आँखों में आँशु आ गए ) मझोले की तबियत बहुत ख़राब है । छोटे वाले को अभी अस्पताल से इंजेक्शन दिला के आ रही । उसको कुत्ता काट लिया था । " 
      हाल ही में आये धर्म आधारित जनगणना के आंकड़े पहले ही मेरे नादान से हिन्दू हृदय को कचोट रहे है । उस पर इस प्रकार का मार्मिक दृश्य देख कर सचमुच हृदय पसीज जाता है । एक माँ और चार बेटे और एक बेटी । मुसीबत के समय में किस-किस की सेवा करे । ऊपर से घर के काम भी देखने होते है । ये है जनसंख्या विस्फोट जिसकी लपटे जब तब इंसान को जलाती रहती है । 

इस दृश्य को देखने के बाद उठे विचारों को एक एक कर नीचे लिखे देता हूँ, ठीक लगे तो मान लीजियेगा :


(1) सब कहते हैं कि मुसीबतों को झेलने के बाद ही इंसान मजबूत बनता है और मजबूती से शक्ति आती है । शक्ति के अर्जन पर जिम्मेदारी आती है । एक जिम्मेदार मुस्लिम महिला के पास मोबाइल होना चाहिए । भले ही ये मुसीबतों की देन है पर किंचित खुलेपन का द्योतक भी तो है । नहीं तो कहा फतवा के फेर में मोबाइल बिना चूड़ियों वाले हाथों में आने वाला था । माँ के हाथ में मोबाइल की पहुँच निश्चय ही बेटी को भी इसके लिए उकसायेगी । 
    इस्लाम के नाम पर जितना लश्कर-ए-तोएबा ने भारत में बम से तबाही मचाई है उतनी और बल्कि उससे ज्यादा तबाही इस समाज ने महिलाओं के मूलभूत अधिकारों को छिन के मचाई है । बस किसी तरह भारत की हर मुस्लिम बाला बन जाये 'मलाला' तो समझो काम हो गया।


(2) जनसंख्या किसी भी समाज की बढ़े अंततः प्रत्यक्ष रूप से कष्ट उस समाज को और उसके बाद देश को झेलना पड़ता है । 
      वैसे ही इतनी महंगाई है । उसके बाद दिल्ली जैसे मेट्रो शहरोँ में प्रवसन के कारण जनसंख्या का जमघट लग गया है । खाने को अनाज पुज नहीं पा रहा है । न्यूनतम जरूरत तक लोग पूरा नहीं कर पा रहे । गंदगी से बुरा हाल है । डेंगू का प्रकोप चरम स्तर पर है । डेंगू के इलाज के लिये शहर भर के पपीते के पेड़ नंगे हो चुके है और बकरी का दूध 2000 रूपये प्रति लीटर बिक रहा है । इतने पर भी नहीं समझियेगा की "हम दो हमारे दो " का स्लोगन सरकार ने ट्रक और ऑटो के पिछवाड़े का सूनापन कम करने के लिए नहीं दिया था । इस भीषण महंगाई में कैसे सबल और सकुशल श्रमिक तैयार करेंगे यही सबसे बड़ी चुनौती है । भारत विश्व का सबसे युवा देश होने के इस सुनहरे अवसर के लाभ को भुनाते हुए फिलहाल नहीं दिख रहा है। 

(3) एक नारी के जीवन की व्याख्या प्रश्नों के अबूझ गट्ठर से ही हो सकती है । जिनके उत्तर वेदना और वेदना की सीमा के निरन्तर उतार चढ़ाव के दौरान शरीर पर खिंची अनगिनत आड़ी तिरछी रेखाएँ बयाँ करती है ।       
               " पीड़ा ही व्यक्ति में ज्ञान के स्रोत के उद्गम द्वार को खोलती है । पीड़ा ही जीवन है । " 
          
सर झुका कर बैठी हुई उस लड़की के मन की सबसे बड़ी कुंठा क्या होगी ? क्या लडकियाँ मौन रहने को, सर झुकाने को, सिर्फ बाते मानने को ही होती है ? क्या कभी किसी को अपनी दयनीय स्थिति का निवारण अपने धर्म को छोड़ने में छिपा हुआ लग सकता है ? क्या लव जिहाद जैसी घटनाएँ प्रेमजाल न होकर धर्म, समाज और पारिवारिक बन्दिशों को ठेंगा दिखने की तरकीब है ? इन प्रश्नों के और इनके अतिरिक्त कई अनगिनत प्रश्नों के प्रकोप से घायल उस मासूम से चेहरे में सुंदरता बची ही नहीं थी । क्या यही उसका भाग्य है ?
               इसके अतिरिक्त अपने सम वयस्क भाई की तरह क्यों वह भी मोबाइल में गेम खेलने की ज़िद नहीं कर रही थी ?
                
(4) कुछ भी हो इतनी तकलीफों के बाद भी मोबाइल का रिंगटोन " मैं हूँ डॉन" शाहरुख़ खान की पिक्चर वाला था । 
                    
चीजों को लिख देने से उन पर विश्वास पक्का हो जाता है और भरोसे की एक अपनी अलग नज़र होती है । जिस नज़र से देखने पर सब कुछ सच लगने लगता है । इसलिए जो देखता हूँ वही लिखता हूँ । फ़ोन पर बातचीत खत्म करते हुए बोले गए आखिरी लफ़्ज के साथ यही विराम लेता हूँ ।

"Salawalikum"
                
       
       

शनिवार, 27 जून 2015

"सबसे अच्छा दिन, सबसे भाग्यशाली दिन, सबसे मजेदार दिन वो दिन होता है जिस दिन सभी आपको आपके जन्मदिन की बधाई देते है न की वो दिन जिसकी तारीख आपके जन्म दिनाँक से मेल खाती है । "

क्षणिकाएँ

         (1)
आस पास लोग है ।
और उन्ही में से कुछ की ,
आवाज़ लगातार आती रहती है ।
नए आते है ।
उठती आवाज़ों में ,
अपनी भी आवाज़ घोलते है ।
कुछ जाते है ।
खालीपन छोड़ जाते है ।
सिर्फ उनके लिए जिन्होंने ,
उनको आते और जाते देखा था ।

           (2)
रंग बदलते रहते है ।
सभी हलचल ध्यान नहीं खिंच पाते ।
आँखे खुली हुई है ।
क्या कुछ नया है ?
पुराने में क्या नया है ?
आज किसने क्या पहना है ,
कौन क्या देखता है ?
देखो, वो आ गई ।
कपड़ो का रंग मैच कर रहा है ।
आँखे आँखों में पता नहीं क्या देखती है ?

            (3)
बिलकुल भी समय नहीं है ।
सब कुछ बीतता जा रहा ।
व्यस्तता का अपना आनंद है ।
शांत हो जाने के कितने नुकसान है ।
साँसे रुक जाये,
नहीं ?
तो जिंदगी क्यों रुक जाये ।
एक दिन की सन्डे की छुट्टी के मजे
का आधार 6 दिन की मेहनत में है ।










आर्थिक आरक्षण : एक सोच ऐसी भी

जाति निरपेक्ष आरक्षण व्यवस्था, जो की गरीबी और अमीरी पर आधारित होती है आर्थिक आरक्षण कहलाती है, ऐसे में गरीब ब्राह्मण और क्षत्रिय भी आरक्षन का लाभ ले सकेंगे । 1991 में नरसिम्हा राव की सरकार ने तात्कालिक तौर पर इसका प्रयास किया था परंतु माननीय सुप्रीम कोर्ट के यह पूछने पर की यह आर्थिक आरक्षण किस आधार पर दिया जायेगा सरकार के द्वारा आज तक जवाब नहीं दिया गया । जवाब न दे पाने का कारण ऐसी व्यवस्था को न लाने की मंशा नहीं अपितु ऐसी किसी भी भरोसे मंद व्यवस्था का अभाव है जिसके आधार पर यह निर्धारित किया जा सके कौन गरीब है ?

भारत में 2001 की जनगणना के अनुसार कुल कार्य शील जनसँख्या लगभग 40 करोड़ है । जिसमे से लगभग 3.5  करोड़ लोग टैक्स देते है और इस 3.5 करोड़ में से 89% लोग की आय 5 लाख से कम है । एक और बात कृषि से हुई आय पर टैक्स नहीं लगता है इस बात का लाभ उठा कर हर जमींदार गरीब बनकर आरक्षण लेगा, इसको कैसे रोकियेगा ।

इतना ही नहीं भारतीय समाज में टैक्स चोरी के कारण काला धन की समस्या किसी से छुपी हुई नहीं है ।

हालात इतने ख़राब है की बी.पी. एल. कार्ड सबसे पहले उसका बनता है जिसे उसकी सबसे कम जरुरत है ।

वर्तमान में जाति आधारित व्यवस्था सबसे सही है जब तक उपरोक्त वर्णित समस्याओं का हल नहीं हो जाता । आज भी मलाई दार परत और गैर मलाई दार परत के बीच के विभाजन का भी दुरूपयोग हो रहा है । फर्जी आय प्रमाण पत्र कितनी आसानी से बन जाता है सब जानते है ।

आरक्षण को जाति के आधार पर करने का मूल कारन भारतीय समाज की संरचना है । जिसमे जाति केवल सामाजिक मामला न होकर के सामाजिक आर्थिक मामला है । अर्थात् धन एवं संपत्ति का जमाव उच्च जातियों के पास अधिक है और वही शोषण कर्ता भी है ।

यदि इतने पर भी जिस किसी को लगता हो की उसके " समानता के अधिकार का हनन हुआ है तो मैं रोज सुप्रीम कोर्ट (जोकि दिल्ली में प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन के पास है) के सामने से गुजरता हूँ तो एक दिन रुक के पी. आई. एल. पीड़ित के नाम से डाल देता हूँ ।

या फिर जिस किसी को भी वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में लगता है सुधार की जरुरत है वो ज्यादा उचित और दोष रहित व्यवस्था के साथ सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रख सकता है । व्यवस्था निश्चय ही बदल जायेगी ।

आलोचना करना आसान है परंतु सुधार के उपाय बताना उतना ही कठिन । और सबसे आसान उपाय बताये - "अपना सरनेम भूल कर सोचिये सब सही लगेगा ।"

मंगलवार, 2 जून 2015

क्षणिकाएँ

तुम जल सम शीतल होकर,
यूँ ही बहते जाना ।
जमकर जो ठोस हो जाना ,
शीघ्र पिघल भी जाना ।

ऐसे न बन जाना ,
और ऐसे बन जाना ।
देखना सब कुछ कितना आसान है पाना ।
जैसे हो वैसे ही ,
आखिरी तक बचे रह जाना ।

जो उचित ही होगा ,
मिलेगा ही ,
मैं स्वयं ही लाकर खुद को दूंगा ।
अर्जित कर लूंगा ।

स्वभाववश जीने में ,
हँसना कम रोना अधिक होता है ।
संवेदना को सहना ,
हमेशा उतना ही सरल नहीं होता है ।

इच्छा आसानी से मन में उठती है ,
उसे पूरा करने की मगर डगर कठिन होती है ।

मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

ये पश्चिमी विक्षोभ है ।

       15 दिसंबर से 15 मार्च के बीच भारतीय उपमहाद्वीप में भूमध्य सागर, काला सागर और कैस्पिएन सागर से चलने वाली आद्र पछुआ पवनों के कारण वर्षा होती है। इस बेसमय वर्षा से मध्य प्रान्त और उसके आस पास के क्षेत्रों में फसल को  नुकसान पहुँचा है । सो किसानो की हालात दयनीय बनी हुई है ।
        ध्यान देने योग्य बात ये है कि भूमध्य सागर भारत के पश्चिम में है इसके अतिरिक्त पश्चिम में और भी कुछ है। हाँ ! इंग्लिश चैनल उसके बाद बे ऑफ़ बिसके से होते हुए गिब्राल्टर जल संधि से भूमध्य सागर । भूमध्य सागर को लाल सागर से जोड़ दिया स्वेज नहर ने और इसके बाद बाबेल मंडेब जल संधि पार कर के पहुँच गए अरब सागर में । वही अरब सागर जिसकी तट सीमा भारत के पश्चिमी राज्य गुजरात से टकराती है । गुजरात में है सूरत । सूरत में पश्चिम से आये अंग्रेजो ने खोली व्यापारिक कोठी और उसके बाद क्या हुआ आपको पता ही है ?
        सूर्य पूर्व से उगता है, पश्चिम से नहीं और वर्तमान समय सौर्य ऊर्जा का समय है । भारत की विदेश नीति और ऊर्जा नीति क्रमशः पूर्व की ओर देखो और पूर्व से उगने वाले सूर्य की ओर देखो को उल्लेखित करती है ।
        हमे पश्चिम से घृणा नहीं है पर जिन्होंने सोमनाथ का मंदिर तोड़ा था पश्चिम से आये थे। पाकिस्तान भारत के पश्चिम में है। इटली भी पश्चिम में है और इटली से नेपोलियन आते आते रह गया मगर ....। वैसे तो पृथ्वी गोल है अर्थात जो पश्चिम में है वो पूर्व में भी है ।
        पश्चिमीकरण के सामने हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृति पिछड़ती जा रही है। हम रंग रूप में तो भारतीय परंतु आचार, विचार और व्यवहार में पक्के अंग्रेज है । स्वच्छ और सुगंध भारत की चाहत ने गंदे, गरीब और दुर्गन्ध पूर्ण भारत से दूरी बनानी शुरू कर दी है । अब सहन नहीं होता । कुछ भी हो जाये अब इसके बगल में नहीं बैठ सकता, इसके हाथ का पानी नहीं पी सकता, ये तो यहाँ भी आ गए, इनके कारण ही आज इंडिया इतना पीछे है । ये वाक्यांश प्रायः सुने जा सकते है ।
        पर सौ बात की एक बात भारत ने 200 वर्षो का पराधीनता का समय झेला है और उसके बाद अगर केवल 68 वर्षो में हमे जो मिला और हमारे दूसरे भाइयों को नहीं मिला तो ये मात्र तुक्का है और तुक्के पर अभिमान नहीं करना चाहिए ।
        सो अन्तर का जब वाजिब कारण है तो अगली बार से अकारण सीट से नहीं उठना, इससे किसी को बुरा लग सकता है ?
    
       

सोमवार, 6 अप्रैल 2015

कोयले पर आधारित ताप बिजली घर परर्यावरण को दुष्प्रभावित करते है ।  सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के द्वारा किये गए अध्ययन से भारत के विभिन्न ताप बिजली घरों में विभिन्न कमियाँ पाई गई है । 
     स्वस्थ्य, शिक्षा, पेय जल, सड़क के सामान ही ऊर्जा भी जनता की बुनियादी आवश्यकता है । जिसमे से विद्युत ऊर्जा, ऊर्जा का एक प्रमुख प्रकार है । विद्युत ऊर्जा के उत्पादन के कई माध्यमों जैसे कोयला आधारित ताप बिजली घर, जल विद्युत परियोजना, अनविनिकृत ऊर्जा स्त्रोतों इत्यादि में से कोयला आधारित ताप बिजली संयंत्र सर्वाधिक अनुपात में भारत की विद्युत ऊर्जा आवश्यकता की आपूर्ति करता है ।
      भारत में कोयले के विशाल भंडार, अन्य ऊर्जा स्त्रोतों की तुलना में आसान तकनीक, सस्ती ऊर्जा दर और तुलनात्मक रूप से कम लागत और कम निर्माण के समय के कारण कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना भारी संख्या में शुरू की गई ।
       कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजना के केवल लाभ ही नहीं है अपितु हानि भी है। ऊर्जा संयंत्र से भारी मात्रा में कोयले के दहन के कारण दहन पश्चात उत्पाद के रूप में विषैली गैस, अध जले ईंधन के सूक्ष्म कण, प्रदूषित जल और राख का ढेर निकलता है ।
        ये सभी पर्यावरण के विभिन्न घटको के प्रदूषण का कारण है । विषैली गैसे जैसे कार्बन डाइ ऑक्साइड, सल्फर के ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड और कार्बन मोनो ऑक्साइड, अध जले ईंधन के सूक्ष्म कण इत्यादि वायु प्रदूषण करते है जबकि सल्फर के ऑक्साइड और नाइट्रोजन के ऑक्साइड के कारण अम्लीय वर्षा होती है जो स्थल और जल के प्रदूषण का कारण है । प्रदूषित जल और निष्काषित राख से स्थल, जल और वायु तीनो ही प्रभावित होती है ।
         सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट के द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में भारत के कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र की कमियों को उजागर किया गया है । जिसमें कम प्लांट लोड फैक्टर, अधिक कार्बन डाइ ऑक्साइड की वातावरण में निष्काषित मात्रा, अधिक सल्फर के ऑक्साइड का निष्कासन,  अत्यधिक स्वच्छ जल का उपयोग और अत्यधिक दूषित जल का निष्कासन और अत्यधिक दहन पश्चात उत्पन्न राख की मात्रा प्रमुख कमियाँ है ।
          
     
    

बुधवार, 25 मार्च 2015

अंतिम

मेरी महत्ता किसी अनजान के लिए
क्या होगी ?
मैं नहीं पहले बोलूंगा,
क्या वो बोलेगी ?

जितना प्रगाढ़ मोह होगा,
उतना ही तीव्र,
उसका विद्रोह होगा ।

मैं आरम्भ से ही द्रवित ,
चक्षु सदा रहे अश्रु भरित ,

मेरे रोने का कैसे मान होगा ?
था जो आँशु ले के ,
सदा समक्ष उपस्थित ,

जब भ्रम टूटा था ,
और जब टूटेगा
आँखों में आँशू किसके होंगे ?
किसके ज्यादा सच्चे होंगे ?
सब समय लिखेगा ।






शनिवार, 21 मार्च 2015

जागो ग्राहक जागो !!

यू आर माय हम्प्टी डम्पति हेल्लो हनी बनी, जिंदगी के साथ भी जिंदगी के बाद भी, फेना ही लेना, पहले इस्तमाल करे फिर विश्वास करे , मुँह में रजनीगंधा कदमो में दुनिया, हो रहा भारत निर्माण भारत सरकार द्वारा जनहित में जारी इत्यादि पक्तियाँ आपने यदा-कदा तो सुनी ही होगी और ये वाली लाइन तो पक्का ही सुनी होगी अबकी बार ........ ............।
     ये विज्ञापन जगत है, जो वर्तमान विनिमय बाजार का महत्वपूर्ण घटक है । विज्ञापन कुछ सूचनाओं का व्यवस्थित, आकर्षक, संक्षेपित वर्णन होता है जो संचार के साधनों के मध्यम से विक्रेता और क्रेता के बीच मुद्रा लेन-देन को प्रोत्साहित करता है । विज्ञापन की सहायता से वस्तु एवं सेवाओँ के प्रदेता ग्राहक या उपभोक्ता को अपनी ओर आकर्षित करते है । विज्ञापनों की सहायता से लोगो को वित्त बाजार में आने वाले नए उत्पादों, उपलब्ध उत्पादों एवं सेवाओँ के बारे में जानकारी प्राप्त होती है । विज्ञापन देने के लिए भी विज्ञापन दिए जाते है । सरकार अपनी विभिन्न योजनाओं के प्रचार के लिए सम्बंधित विज्ञापन जारी करती है ।
    जिस प्रकार हम परिवहन साधनों के माध्यम से एक जगह से दूसरी जगह जाते है वैसे ही विज्ञापन संचार के साधनो के माध्यम से हम तक पहुचते है । विज्ञापन होर्डिंग, अख़बार, पम्पलेट, स्पीकर के माध्यम से, टेलीविज़न, रेडियो, व्यक्तिगत बातचीत, टेलीफोन या मोबाइल कॉल के द्वारा आदि के माध्यम से हम तक पहुचते है । मोबाइल कॉल के माध्यम से चुनाव के दौरान प्रमुख राजनेताओं के द्वारा अपनी पार्टी के पक्ष में वोट करने की अपील तो आपने सुनी ही होगी । ये विज्ञापन के वर्तमान तरीकों में सर्वाधिक लोकप्रिय और असरदार तरीका है ।
     विज्ञापनों से हम घिरे हुए है । ये कभी-कभी हमारे लिए सर दर्द बन जाते है तो कभी शांत से महौल में हम से बात भी करते है । हमारे आसपास की बेरंग दीवारे, कोने और सूनी छते सभी कुछ इनसे गुलज़ार है । विज्ञापनों की रचना करते वक्त विज्ञापन निर्माता लोगो के मनोविज्ञान का ध्यान रखकर घटनाओँ का क्रम, पात्र, संवाद और भाषा का चयन करते हैं। ये वही तत्त्व है जो एक अच्छे, अधिक लोकप्रिय और कमजोर, कम लोकप्रिय विज्ञापन के बीच अन्तर का कारण बनते है ।
     अक्सर नए अभिनेता और अभिनेत्रियाँ बड़े परदे पर आने से पहले विभिन्न दैनिक उपयोग की वस्तुओं के विज्ञापन में देखे जा सकते है । ये उनके कॅरियर का पहला पड़ाव है जबकि खेल जगत से जुड़ी हस्तियों के लिए ये उनके कॅरियर के सर्वोच्च स्तर पर पहुचने के बाद आने वाला पड़ाव है ।
     विज्ञापन हमेशा ही अच्छे या बुरे नहीं होते । कुछ विज्ञापन इतने मनोरंजक और हास्यास्पद होते है की लोगो की ज़ुबाँ पे यूँही चढ़ जाते है और मनोरंजन के साथ सही रास्ता भी दिखाते है पर कभी-कभी विज्ञापन लोगो को ठगने का माध्यम बन जाते है । विज्ञापनों के दुरूपयोग पर अंकुश रखने के लिए सरकार ने ' द एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड्स कौंसिल ऑफ़ इंडिया ' का गठन किया है जो भ्रामक विज्ञापनों से जुड़ी शिकायतो के आधार पर उनके प्रसारण पर प्रतिबन्ध लगाता है ।
    

शुक्रवार, 20 मार्च 2015

अर्थव्यवस्था- सामाजिक व राजनीतिक विसंगति एवं वणिज्यवादी धर्मं

  • 'मुझे याद है, हमने पैसे जोड़ कर सबसे पहले बैट और बॉल ख़रीदा था उसके बाद कमाएँ हुए पैसो से क्रिकेट अकादमी शुरू की । ' 
  •     यही तो नियमबद्ध व्यवस्था की विशेषता है । आरम्भिक संसाधनों को जुटाने का साहस था तो भविष्य में संसाधनों से पूँजी और पूँजी से ढेर सारी सेवाएँ, संसाधन और पूँजी अर्जित कर ली और इसप्रकार अर्जित पूंजी से और पूंजी ।
  •     अर्थव्यवस्था भी नियमो से आबद्ध है । जोखिम उठाने वाला लाभ कमाता है । मैंने ये बिलकुल नहीं कहा की वही धनाढ्य बन जाता है । ये तो लाभ की महिमा है क्योकि अर्जित लाभ का उद्यमशीलता से सीधा सम्बन्ध होता है । 
  •      किसी भी व्यवस्था के नियम एक ही दिन में नहीं बने होंगे मगर आधारभूत नियम तो व्यवस्था निर्माण की आरंभिक अवस्था में ही बनते है और अत्यंत कम विचलन के साथ और आवश्यकता के अनुसार संशोधित होकर प्रभाववान बने रहते  है । 
  •      अर्थव्यवस्था से बँधे हुए समाज की ये विशेषता है की उसमे विषमता होगी ही होगी । गरीबी और बेरोजगारी इसकी आवश्यक बुराइयाँ है । संसाधनों का असमान वितरण, समाज का आर्थिक आधार पर स्तरीकरण कभी समस्या है तो कभी समाधान । तापमान के अन्तर के कारण ऊर्जा का प्रवाह होता है । ये विषमता ही प्रवाह का कारण है । मुद्रा का प्रवाह भी आवश्यकता के अनुरूप और सामाजिक विषमता के न्यूनता के उद्देश्य से होता है । 
  •      अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद या साम्यवाद । साम्यवाद समाजवाद की अंतिम वह अवस्था है जिसको परिभाषित ही इस शर्त पर किया गया है की इसकी प्राप्ति संभव है परंतु किसी एक समय । ये ऐसी ही बात हुई की चींटी एवेरेस्ट पर चढ़ना शुरू कर दे तो उसके शिखर पर पहुचेगी तो परंतु किसी एक समय । इसप्रकार पूंजीवाद कही ज्यादा प्रतिस्पर्धा पूर्ण व्यवस्था है और जोखिम से लाभ का सीधा सम्बन्ध कही ज्यादा सटिकता से  स्थापित करता है । होना भी यही चाहिए -'लोगो को उनकी क्षमता के अनुसार न की जरूरत के अनुसार ' ।
  •       समय के साथ जैसे जैसे अर्थ का महत्व बढ़ता गया । सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक पहचान भी अर्थ आधारित ही हो गई । सामाजिक सम्मान और जाति मूलतः दो ही रह गई - धनी और निर्धन । राजनीति भी धनाढ्य और पूंजीपति के अनुसार चलने लगी जबकि गरीब और बेरोजगार राजनीति रूपी रथ के पहिये बनकर रह गए है और पूंजीपति उस रथ का  मालिक है । धार्मिकता रूढ़िवादी विचारो से भरी हुई होती है । अर्थ से जन्मे धर्मो ने कट्टर ब्राम्हणवाद और धर्म संचालित स्तरीकरण को ध्वस्त कर दिया है । आर्थिक क्रियाओ से बंधे होने का ये विरोध है या समर्थन की वणिज्यवादि धर्मो ने जैसा वस्त्र त्यागकर दिखाया है या तो तुम व्यवस्था का अंश हो जाओ या नग्न और नगण्य हो जाओ ।
  •        अब सब कुछ, सारे सम्बन्ध अर्थ आधारित होने पर ही अर्थपूर्ण है । सड़क और सड़क के दोनों ओर की पूंजी का उपयोग उसकी कीमत चूका कर ही किया जा सकता है अन्यथा छः-छः महीने जगह बदलते रहो, मन लगा रहेगा ।

शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

हरि नाम महामंत्र माहात्म्य

पहले 'हरे कृष्ण' दो बार पुनः 'कृष्ण' दो बार तदन्तर 'हरे' की दो बार आवृति करे । 'हरे राम' दो बार पुनः 'राम' दो बार तदन्तर 'हरे ' की दो बार आवृति करे । इस प्रकार महामंत्र पूर्ण हुआ ऐसा श्री सनत्कुमार संहिता में कहा गया है ।

हे हरे ! मेरे चित्त को हरकर भवबंधन से मुक्त कर दीजिये ।

हे कृष्ण ! मेरे चंचल चित्त को अपनी ओर आकर्षित कर लीजिये ।

हे हरे ! अपने स्वाभाविक माधुर्य से मेरे चित्त को हर लीजिये ।

हे कृष्ण ! भक्तितत्ववेत्ता अपने भक्त द्वारा अपने भजन का ज्ञान देकर मेरे चित्त को शुद्ध कर दीजिये ।

हे कृष्ण ! अपने नाम-रूप-गुण-लीला आदि में मेरी निष्ठा उत्पन्न कर दीजिये ।

हे कृष्ण ! अपने नाम-रूप-गुण-लीला आदि में मेरी रूचि उत्पन्न कर दीजिये ।

हे हरे ! मुझे अपनी सेवा के योग्य बना दीजिये।

हे हरे ! मुझे अपनी सेवा के योग्य बनाकर अपनी सेवा का आदेश दीजिये ।

हे हरे ! अपने प्रियतम सहित की गई अपनी अभीष्ट लीलाओं का मुझे श्रवण कराइये ।

हे राम ! हे राधिकारमण अपनी प्रियतमा राधिका जी सहित की गई अपनी अभीष्ट लीलाओं का श्रवण कराइये ।

हे हरे ! हे श्रीमति राधिके आप अपने प्रियतम श्री कृष्ण के साथ अपनी अभीष्ट लीलाओं का दर्शन कराइये ।

हे राम ! हे राधिकारमण आप अपनी प्रियतमा सहित अपनी अभीष्ट लीलाओं का दर्शन कराइये ।

हे राम ! आप मुझे कृपया अपने नाम-रूप-गुण-लीला एवं स्मरण आदि में नियुक्त कर लीजिये ।

हे राम ! उस लीला में मुझे अपनी सेवा योग्य बना दीजिये ।

हे हरे ! मुझे अंगीकार कर मेरे साथ रमण कीजिये अर्थात मुझे आनंदित कीजिये ।

हे हरे ! मेरे साथ रमण कीजिये । मेरे साथ विहार कीजिये ।