खोजते हुए ठिकाना,
मेरा वहाँ आना,
शायद वो दो थे,
एक हो ही पाना ।
बाजू वाली कुर्सी पे नज़र पड़ते ही,
मेरा समझ जाना,
और चुप चाप वहाँ से चले जाना,
मुझे तो जाना ही था ।
किसने सोचा था,
होगी ऐसी मुलाकात,
आँखों का टकराना ।
न मुझे कुछ कहना था ।
और न उसने कुछ कहाँ,
ऐसा ही होगा पता था ।
रो रो कर खुद को समझाना ।
की मुझे तो जाना ही था ।
ऐसा कैसे हो गया ?
मैंने कभी खुद के लिए,
जो नहीं माँगा,
वो कैसे मैं समझ गया ।
करीब एक घंटे बिताने का इरादा था मेरा,
पर पता नहीं क्या हुआ,
मैं उठा और सेकंड भर में वहाँ से चला गया,
क्योंकि मुझे तो जाना ही था ।
ये बात उसको कैसे बताता,
की उसकी विवश्ता को,
समझता हूँ मैं न ।
इसलिए तो ,
कुछ कहे बिना ही चला गया ।
क्योंकि मुझे तो जाना ही था।
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