मंगलवार, 24 नवंबर 2015

कल रात माता का मुझे ईमेल आया है ।

ज्यादातर हिन्दू भगवान की मूर्तियों में -
१) भगवान खड़े रहते हैं।
२) भगवान आशीर्वाद दे रहे होते हैं। 
३) भगवान के हाथों में अस्त्र-शस्त्र होते हैं।
    
     ( पिछले दिनों एक गाना बड़ा प्रचलित था। जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे - कल रात माता का मुझे ईमेल आया है माता ने मुझे फेसबुक पर बुलाया है। ये बात आज हास्यास्पद लग सकती है। लेकिन सोचिये जब भगवान की मूर्ति के हाथों में इलेक्ट्रानिक गैज़ेट होंगे, एक हाथ में लैपटॉप, दूसरे में स्मार्ट फ़ोन हो। तब ये सोचना बिलकुल लाजमी होगा की माता का ईमेल मुझे क्यों नहीं आया ? )

     मूर्ति का निर्माण अक्सर एक पूर्वधारणा लेकर किया जाता है । एक परिस्थिति सोची जाती है उसके बाद मूर्ति का निर्माण किया जाता है । मूर्तिकला चित्रकला का थ्री डायमेंशनल व्यू होता है इसलिए मूर्ति का प्रभाव मानव मन पर भी चित्र से कहीँ अधिक होता है । चित्रकला से मूर्तिकला की तनिक सी समानता के कारण चित्र कला के किंचित आधारभूत गुण एक आदर्श मूर्ति से भी अपेक्षित होते हैं।
      हमारी नैतिकता का एक स्रोत धर्म है। धर्म हमें नैतिकता के आधार भगवान को अपना आराध्य मानने की अपेक्षा रखता है । सामान्यतः भगवान को मानने से बहुदा धार्मिक व मनोवैज्ञानिक उलझनों का जवाब सरलता से मिल जाता है । 
       परंतु यहाँ प्रश्न यह नहीं है। सोचने की बात ये है कि शक्तिपीठों में स्थापित पिंडो से लेकर बुद्ध और महावीर की ऊर्ध्वाधर गगन चुम्बी मूर्तियों की व्यवहारिकता कितनी है ? अर्थात् ये मूर्तियाँ केवल आशीर्वाद दे सकती है क्या ? ये हमें एक गैर लचीले नियम में बाँधती है जिसमें भगवान से हमारा रिश्ता फिक्स हो गया है। 
       पिछले दिनों हिंदी के जाने माने अख़बार पर एक लेख पढ़ा । लेख हनुमान जी की बदसूरत सी दिखने वाली मूर्ति पर था । लेखक का मानना था जब हमारी चेतना में हनुमान जी की इतनी शक्तिशाली छवि है तो उनकी ऐसी मरियल सी मूर्ति बनाना कैसे उचित हो सकता है ? यूरोप के देवताओं की नंगी मूर्तियों को देख कर हमें शर्म आ जाती है इस प्रकार का भाव मन में आना में ही उस मूर्तिकार की सफलता है । शर्म तो हमें आती है उनके लिए तो धरोहर है। 
       जो बात कहने के लिए इतनी भूमिका बांधी गई वो बात बहुत साधारण सी है कि जगजीत सिंह के एक वीडियो में एक बच्ची राम को अपना भाई मानती है। देश में कौन से मंदिर में राम जी मूर्ति को देख कर पाँच साल की लड़की को उसमें अपना भाई दिखेगा ? निश्चय ही किसी में भी नहीं । इसीप्रकार फेसबुक पर एक फ़ोटो तैर रही है जिसमेँ लगभग 5-6 साल की बच्ची हनुमान जी की मूर्ति से गले मिल रही है और मूर्ति तब भी आशीर्वाद दे रही है । मेरा मानना है एक ऐसी मूर्ति बननी चाहिए जिसमेँ भगवान से गले मिलने का सुख भी मिल सके और लगे भगवान भी हमसे गले मिलने में सहज मासूस कर रहे है क्योंकि निकटता से प्रेम बढ़ता है। 
        नैतिकता का बीज बचपन में बोया जाता है इसलिए मंदिरों में मूर्तियाँ बच्चों का मनोविज्ञान ध्यान में रख कर बनानी चाहिए न की तलवार, भाला लिए हुए और सिर्फ आशीर्वाद देते हुए

    

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