अर्थव्यवस्था- सामाजिक व राजनीतिक विसंगति एवं वणिज्यवादी धर्मं
- 'मुझे याद है, हमने पैसे जोड़ कर सबसे पहले बैट और बॉल ख़रीदा था उसके बाद कमाएँ हुए पैसो से क्रिकेट अकादमी शुरू की । '
- यही तो नियमबद्ध व्यवस्था की विशेषता है । आरम्भिक संसाधनों को जुटाने का साहस था तो भविष्य में संसाधनों से पूँजी और पूँजी से ढेर सारी सेवाएँ, संसाधन और पूँजी अर्जित कर ली और इसप्रकार अर्जित पूंजी से और पूंजी ।
- अर्थव्यवस्था भी नियमो से आबद्ध है । जोखिम उठाने वाला लाभ कमाता है । मैंने ये बिलकुल नहीं कहा की वही धनाढ्य बन जाता है । ये तो लाभ की महिमा है क्योकि अर्जित लाभ का उद्यमशीलता से सीधा सम्बन्ध होता है ।
- किसी भी व्यवस्था के नियम एक ही दिन में नहीं बने होंगे मगर आधारभूत नियम तो व्यवस्था निर्माण की आरंभिक अवस्था में ही बनते है और अत्यंत कम विचलन के साथ और आवश्यकता के अनुसार संशोधित होकर प्रभाववान बने रहते है ।
- अर्थव्यवस्था से बँधे हुए समाज की ये विशेषता है की उसमे विषमता होगी ही होगी । गरीबी और बेरोजगारी इसकी आवश्यक बुराइयाँ है । संसाधनों का असमान वितरण, समाज का आर्थिक आधार पर स्तरीकरण कभी समस्या है तो कभी समाधान । तापमान के अन्तर के कारण ऊर्जा का प्रवाह होता है । ये विषमता ही प्रवाह का कारण है । मुद्रा का प्रवाह भी आवश्यकता के अनुरूप और सामाजिक विषमता के न्यूनता के उद्देश्य से होता है ।
- अर्थव्यवस्था में पूंजीवाद या साम्यवाद । साम्यवाद समाजवाद की अंतिम वह अवस्था है जिसको परिभाषित ही इस शर्त पर किया गया है की इसकी प्राप्ति संभव है परंतु किसी एक समय । ये ऐसी ही बात हुई की चींटी एवेरेस्ट पर चढ़ना शुरू कर दे तो उसके शिखर पर पहुचेगी तो परंतु किसी एक समय । इसप्रकार पूंजीवाद कही ज्यादा प्रतिस्पर्धा पूर्ण व्यवस्था है और जोखिम से लाभ का सीधा सम्बन्ध कही ज्यादा सटिकता से स्थापित करता है । होना भी यही चाहिए -'लोगो को उनकी क्षमता के अनुसार न की जरूरत के अनुसार ' ।
- समय के साथ जैसे जैसे अर्थ का महत्व बढ़ता गया । सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक पहचान भी अर्थ आधारित ही हो गई । सामाजिक सम्मान और जाति मूलतः दो ही रह गई - धनी और निर्धन । राजनीति भी धनाढ्य और पूंजीपति के अनुसार चलने लगी जबकि गरीब और बेरोजगार राजनीति रूपी रथ के पहिये बनकर रह गए है और पूंजीपति उस रथ का मालिक है । धार्मिकता रूढ़िवादी विचारो से भरी हुई होती है । अर्थ से जन्मे धर्मो ने कट्टर ब्राम्हणवाद और धर्म संचालित स्तरीकरण को ध्वस्त कर दिया है । आर्थिक क्रियाओ से बंधे होने का ये विरोध है या समर्थन की वणिज्यवादि धर्मो ने जैसा वस्त्र त्यागकर दिखाया है या तो तुम व्यवस्था का अंश हो जाओ या नग्न और नगण्य हो जाओ ।
- अब सब कुछ, सारे सम्बन्ध अर्थ आधारित होने पर ही अर्थपूर्ण है । सड़क और सड़क के दोनों ओर की पूंजी का उपयोग उसकी कीमत चूका कर ही किया जा सकता है अन्यथा छः-छः महीने जगह बदलते रहो, मन लगा रहेगा ।
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