शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में न्याय को अपने हाथ में लेने का जूनून तथा कंगारू न्याय की सोच  कँहा तक जायज है ? क्या दिमापुर घटनाक्रम ने भारत की न्याय व्यवस्था की लचर स्थिति को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है ?
 भारत, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जिसकी आबादी लगभग सवा सौ करोड़ के पास है । विश्व में इतनी बड़ी आबादी के साथ संसाधनों के सदुपयोग को सुनिश्चित करने के साथ संसाधनों का विकास एक बड़ी चुनौती और समस्या है । संसाधनों में सबसे महत्वपूर्ण मानव संसाधन है । मानव ही अपनी विवेक अनुसार अन्य संसाधनों का उपयोग करता है इसप्रकार आर्थिक समृद्धि ही सामाजिक विकास सुनिश्चित करता है ।
        अशिक्षित और अकुशल मानव संसाधन देश के लिए बोझ के सामान है और सामाजिक बुराई में वृद्धि करता है । अविकसित मानव संसाधन वाले समाज में अपराधों का दर भी अधिक होता है इसलिए एक अति विशाल और कार्यशील न्यायतंत्र की जरूरत होती है । परंतु भारत की व्यापक जनसंख्या के लिए यहाँ का न्याय तंत्र अपर्याप्त, लचर और बहुत धीमा प्रतीत होता है।
         भारत में आधुनिक न्याय व्यवस्था का शुभारम्भ  1772 से हो गया था। जिसमें  पूर्ववर्ती ब्रिटिश सरकार और स्वतंत्र भारत की सरकार के द्वारा आवश्यक सुधार किये गए परंतु सुधार की मांग की तुलना में आपूर्ति के अत्यंत धीमे होने के कारण अधिकांश मामलो में न्याय व्यवस्था की आलोचना की जाती है ।
         न्याययिक मामलो में भ्रष्टाचार, वकीलो के द्वारा मांगी गई ज्यादा फीस, न्यायप्रक्रिया का धीमापन और ताकतवर के पक्ष में ही न्याय होने की मान्यता ने सामान्य जान मानस में लोकतान्त्रिक न्यायव्यवस्था में विश्वास रखने की बजाय कंगारू न्याय को अपनाने की ओर बढ़ रहे है । ऐसा होने पर मात्र आरोप के आधार पर सजा दिया जाने लगेगा इसमें न्याय होने की गुंजाईश बिलकुल शून्य हो जायेगी ।
          भीड़ का न कोई चेहरा होता है और न ही कोई दिशा । कंगारू न्याय या सड़क पर न्याय की प्रवृत्ति लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलने का परिचायक है । जो की किसी भी शर्त पर अस्वीकार्य है ।

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