रविवार, 4 जनवरी 2026

तो क्या ईश्वर को सिमेट्री पसंद नहीं?

मनुष्य अक्सर यह मान लेता है कि सुंदरता का अर्थ सिमेट्री है—सब कुछ बराबर, संतुलित और एक-सा। लेकिन जब वह सृष्टि की ओर देखता है, तो यह धारणा बार‑बार टूटती है। मानो ईश्वर ने जानबूझकर मनुष्य के सौंदर्यबोध को चुनौती देने के लिए ही यह संसार रचा हो।

क्या ईश्वर ने कुछ भी सुंदर नहीं बनाया? अगर सुंदरता का अर्थ सिमेट्री है, तो शायद नहीं। नदियाँ सीधी नहीं बहतीं, वे टेढ़ी‑मेढ़ी रास्तों से गुजरती हैं। पहाड़ उबड़‑खाबड़ हैं, कहीं मैदान है तो कहीं पठार। पत्थर एक आकार के नहीं होते, एक ही पेड़ के पत्ते भी एक जैसे नहीं होते। हर जीव अलग है, हर देह में भिन्नता है।

मनुष्य का ही शरीर देख लें—बायाँ हिस्सा दाएँ जैसा नहीं है, केवल उसका आभास है। आँखें बराबर नहीं, हाथों की ताकत समान नहीं, दिल शरीर के बीच में नहीं है। फिर भी शरीर काम करता है, चलता है, जीता है।

तो फिर प्रश्न उठता है—सुंदरता क्या है? सुंदरता वह है जो काम करे। जो जीवित रखे। जो उपयोगी हो।

सूरज गरम है, चंद्रमा ठंडा। अगर दोनों एक जैसे होते, तो दिन‑रात का अर्थ ही नहीं बचता। कुछ ग्रह धीरे चलते हैं, कुछ तेज; कुछ में वलय हैं, कुछ में नहीं। केवल एक ही ग्रह—पृथ्वी—पर जीवन है। क्या यह असंतुलन है, या सटीक उपयोगिता?

ईश्वर ने सिमेट्री क्यों नहीं चुनी? क्योंकि पूर्ण सिमेट्री जड़ होती है। अगर पृथ्वी पूरी तरह गोल होती, तो मौसम नहीं बनते। अगर तापमान हर जगह समान होता, तो हवा नहीं चलती। अगर सब कुछ बराबर होता, तो परिवर्तन असंभव हो जाता।

ईश्वर ने सिमेट्री को नकारा नहीं, बल्कि उसे सीमित किया। जहाँ ज़रूरी था वहाँ संतुलन दिया, और जहाँ जीवन फूट सकता था वहाँ असमानता छोड़ दी।

तो मनुष्य सिमेट्री से इतना प्रेम क्यों करता है? क्योंकि सिमेट्री उसे नियंत्रण का भ्रम देती है। चौकोर घर, बराबर कमरे, सटीक टाइलें—सब कुछ अनुमान में रहता है। कारें चौकोर, इमारतें चौकोर, शहर चौकोर। अगर कहीं रेखा टेढ़ी हो जाए, तो उसे बदसूरत कह दिया जाता है।

लेकिन क्या जो दिखने में सुंदर है, वही उपयोगी भी होता है?

उपयोगिता बनाम सिमेट्री प्रकृति उपयोगिता को चुनती है, सौंदर्य को नहीं। नदी का काम पानी पहुँचाना है, सीधी दिखना नहीं। पेड़ का काम फल देना है, पत्तों का एक‑सा होना नहीं। आँखें बराबर हों या न हों, दिखना ज़रूरी है।

मनुष्य अक्सर किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार को केवल उसके रूप से आँक लेता है। लेकिन जीवन रूप से नहीं, उपयोग से चलता है।

धर्मों का विरोधाभास भी इसी का उदाहरण है एक धर्म कुछ कहता है, दूसरा उसका उलटा। अगर सत्य पूरी तरह सिमेट्रिक होता, तो केवल एक ही धर्म होता। लेकिन सत्य बहुआयामी है, और मनुष्य सीमित। हर धर्म सत्य की उपयोगिता का एक पक्ष पकड़ता है, न कि उसकी संपूर्ण सिमेट्री।

तो असली प्रश्न क्या है? क्या हमें सुंदर दिखना है, या उपयोगी होना है? क्या बराबर होना ज़रूरी है, या सार्थक होना?

ईश्वर ने पृथ्वी को भी पूरी तरह गोल नहीं बनाया। थोड़ा सा झुकाव रखा—और उसी से ऋतुएँ बनीं, जीवन पनपा।

अंततः सृष्टि हमें यह सिखाती है कि सिमेट्री से अधिक महत्वपूर्ण उपयोगिता है। कोई कैसा दिखता है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह क्या करता है।

मनुष्य सिमेट्री को सुंदर कहता है क्योंकि वह उसे समझ सकता है। ईश्वर असिमेट्री रचता है क्योंकि उसी में जीवन संभव है।

बुधवार, 17 सितंबर 2025

सब खत्म

जेन मन थोड़ी दुनिया देखे हे,
वो पैसा, जमीन अउ सोना जानथे।
जेन मन ज्यादा देखे हे,
वो कमाथें, बचाथें अउ उड़ा देथें।
जेन मन इजराइल, गाजा, यूक्रेन देखे हे,
वो बस जीये बर चाहथें।
कमाय ले जादा खर्च करना चाहथें।

मार के बाद पैसा,
उधारी चुकाना नई हे।
जमीन काबर खरीदी?
घर काबर बनाय?

सब तो मिसाइल के निशाना मं हे।
जब हम खुद नई बचबो,
त पैसा का बचाबो?
पैसा हमन ला नई बचाही।

सोमवार, 8 सितंबर 2025

व्हाइट इज डर्टी

साफ–सुथरे शहर,
शहर के साफ–सुथरे लोग,
चूने से भी ज्यादा सफेद,
पुट्टी लगाए चेहरे— हू-ब-हू एक जैसे।

क्योंकि शहर में रहना मतलब—
वेल एजुकेटेड, वेल मैनर्ड और सबसे ज़रूरी—सफेद।
सफेद यानी साफ।

मगर पता नहीं क्यों,
एयर-कंडीशनर की ठंडी में
ये वेल एजुकेटेड लोग
जम गए हैं,
अपने लिए भी नहीं बोल पा रहे।
और वेल मैनर्ड लोग
बर्गर के नीचे कुचल गए हैं,
आस–पास की गंदगी तक साफ नहीं कर पा रहे।

सफेद से रिसते हैं—
बदबूदार,
टॉयलेट पेपर यूजर,
अर्बन व्हाइट कबूतर।

शनिवार, 6 सितंबर 2025

आज अंतिम छुट्टी पर

एक दिन दफ्तर जाते हुए
मैंने एक मुर्दे को देखा।
मुर्दा लेटा हुआ था,
लोग उसे लिए जा रहे थे।

दफ्तर जाने का समय था—
सोचने लगा, अगर यह ज़िंदा होता
तो शायद अभी मेरे साथ
दफ्तर ही जा रहा होता।

मगर आज यह दफ्तर नहीं जा रहा,
और न ही वे लोग,
जो इसके पीछे चल रहे हैं।

दफ्तर जाने के वक्त,
सड़क पर जो भी दिखता है—
सब दफ्तर जाते प्रतीत होते हैं...
यहाँ तक कि मुर्दा भी।
कभी-कभी लगता है
ज़िन्दगी और मौत के बीच
बस इतना ही फर्क है—
जीवित आदमी दफ्तर जाता है,
मुर्दा सीधा श्मशान।

हम दिन भर दफ्तर जाकर
थोड़ा-थोड़ा मरते हैं,
और एक दिन ऐसा आता है
जब हमें भी
दफ्तर नहीं जाना पड़ता।

तब लोग कहते हैं—
“आज वह छुट्टी पर है,
अंतिम छुट्टी।”

कितना अजीब है,
हम जीते-जी छुट्टियों के लिए तरसते हैं,
और मरने के बाद
लोग हमें छुट्टी पर बताते हैं।

शायद ज़िन्दगी भी
एक बड़ा दफ्तर है,
जहाँ हम सब नियुक्त हैं,
कोई स्थायी नहीं,
सब संविदा पर।

हर किसी का कॉन्ट्रैक्ट
किसी अदृश्य हस्ताक्षर से बँधा है।
कोई नहीं जानता
किसका कब समाप्त हो जाएगा।

और फिर एक दिन
“सेवा निवृत्ति” का आदेश आता है।
सिर्फ़ एक चुप्पी,
सिर्फ़ एक यात्रा—
श्मशान की ओर।

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

छोटी वाली असंख्य खिड़कियाँ

सुबह के दस बजे ऑफिस के लिए राकेश जैसे-तैसे घर से निकला। उसके सामने दिनचर्या का वही दोहराव था, वही भीड़, वही घड़ी की सुई जो मानो आदेश देती हो—“दौड़ो, वरना छूट जाओगे।”

मेट्रो स्टेशन पर उतरते ही एक भारी-सी सांस निकली—लोगों की भीड़, शरीरों की धक्का-मुक्की, और चेहरों पर बसी उदासीनता। राकेश को लगा, यहाँ हर कोई खिड़की के पीछे खड़ा है।हर किसी की खिड़की की चाहत को पूरा करने के लिए ही शायद खिड़की खिंचते खिंचते इतनी बड़ी हो गई हैं । एक बड़ी खिड़की जिसमें सैकड़ो छोटी खिड़की समा गई हैं । बता पाना मुश्किल है कि सब बड़ी खिड़की को देख रहे है या उसमें से अपनी वाली छोटी खिड़की को । 

ट्रेन आई। भीड़ के साथ राकेश उसमें समा गया। सीट का सवाल ही नहीं था। बड़ी खिड़की से बाहर झांकते ही अनगिनत छोटी-छोटी खिड़कियाँ दिखीं। वह सोचने लगा—क्या हर खिड़की के पीछे कोई अपनी अधूरी इच्छा, अपनी असफल कामना, अपनी थकी हुई देह और मन को छुपाए बैठा है?

🎵 “जिंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी ये हँसाए, कभी ये रुलाए…”

ट्रेन पुल पर धीमी हुई। यमुना का बहाव तीखा था। पुल ने जैसे ट्रेन से कहा—“बहन, धीरे चलना।” राकेश ने नदी की ओर देखा। नदी भी खिड़की-सी लगी—एक खिड़की, जिससे प्रकृति शहर को देख रही थी। नदी का जल था, पर ठहराव नहीं। शहर का जीवन था, पर शांति नहीं।

उसके भीतर महंगाई और ज़िम्मेदारियों की कड़वाहट गूंजती रही। तनख्वाह कितनी भी हो, ज़रूरतें बड़ी रहती हैं। घर के रिश्तों में भी अब वह अपनापन नहीं रहा—यौन इच्छाएँ भी कभी-कभी खिड़की की तरह ही बंद हो जाती हैं, भीतर से धुंधली और अनसुनी।

🎵 “तन्हाई, तन्हाई, दिल के रास्ते में कैसी ठंडी साया तन्हाई…”

छोटी-छोटी खिड़कियों के पीछे दौड़ती जिंदगियाँ राकेश को किसी थके हुए घोड़े-सी लगती हैं, जिन्हें यह भी नहीं पता कि मंज़िल कहाँ है। गाँव की धीमी लय को छोड़कर शहर को चुना था, यह सोचकर कि सब सही हो जाएगा। पर यह शहर तो केवल नई निराशाओं का बाज़ार निकला।

राकेश ने फिर नदी को देखा। सोचा—शायद जिस दिन नदी अपनी धार धीमी करेगी, उसी दिन यह शहर भी धीरे चलने लगेगा। और शायद उसी दिन वह इस बड़ी खिड़की से बाहर उतरकर मुक्त हो सकेगा।

मंगलवार, 19 अगस्त 2025

नशे की हालत में

सरकार और नशा

सरकारें न नौकरी देती हैं,
न नशा करने देती हैं।
तो फिर चाहती क्या हैं?

न जीने देती हैं,
न मरने देती हैं,
न भूलने देती हैं दुख।

अगर पूछें खुद से—
कौन करता है नशा? क्यों करता है नशा?
तो जवाब मिलेगा—
वही जिनके पास नौकरी है,
और वही जिनके पास नहीं है।

सरकार कहती है—
नौकरी दो या न दो,
नशा तो करेगा ही इंसान।
तो क्यों दें नौकरी?
क्यों दें नशा?

कहीं नशे में
ट्रैफिक इंस्पेक्टर न बन जाए,
कहीं मास्टर न बन जाए,
कहीं जागरूक नागरिक न बन जाए।

सरकार जानती है,
एक नशेड़ी भी
कुछ बनने का सपना देखता है।

गुरुवार, 8 मई 2025

बँधनों की दुनिया


था उसका सारा यह जहाँ,
खुला गगन, धरती महान।
फिर भी उसने घर बसाया,
चार दीवारों में मन को बाँधा।

पेड़ थे, छाँव थी, ज़मीन खाली,
पर उसने लगाई क़ीमत गाली।
जो था सबका, उसे अपना बनाया,
काग़ज़ों में नाम लिखवाया।

नदी थी, झरने थे गाते,
प्रकृति के संग दिन थे बीतते।
पर उसने नल में पानी बाँधा,
स्नानघर में जीवन को साधा।

आजादी थी, उड़ सकता था,
सपनों में दिन बिता सकता था।
पर उसने नौकरी को चुना,
समय को तनख्वाह में बाँटा।

था जीवन जीने को अपना,
पर बंध गया रिश्तों का सपना।
विवाह किया, साथ निभाया,
पर खुद को कहीं खो बैठा।

दिन में सोने की आज़ादी थी,
रात में जागने की तैयारी थी।
पर बिजली बनाई रात को दिन,
और खो दिया नींद का सुकून छिन।

आग जलाई रोटी पकाने को,
बस गया एक जगह जीने को।
पर खेती, घर और परिवार के संग,
खोई स्वतंत्रता, खो गया रंग।

सुविधा के पीछे भागते-भागते,
शांति छूटी, जंग लगते-लगते।
अब भी खुला है प्रकृति का द्वार,
पर क्या लौट पाना है अब सरल और स्वीकार?

जब भी जीवन लगे बंधन में,
जब भी घुटन हो इन बर्तनों में,
एक सवाल उठता है मन में—
क्या सच में खुले हैं रास्ते वन में?

बुधवार, 23 अप्रैल 2025

कारण और परिणाम


हरी घास पर पसरा सन्नाटा,
बहती नदी का पारदर्शी गान।
शांति और आनंद का आभास —
पर तभी जब लौटने को
एक घर हो।

हम घूमते हैं,
छुट्टियाँ मनाते हैं,
क्योंकि नौकरी है,
जिससे हम भागते हैं,
पर वही तो कारण है —
छुट्टी तो बस परिणाम।

हमें पर्वत अच्छे लगते हैं,
बर्फ की चादर पर चलना — रोमांच।
पर रहते कहाँ हैं हम?
मैदानी जीवन की सरलता में।
पर्वत दिखते हैं सुन्दर,
पर जीना वहाँ कठोर है।
मैदान जीने के लिए हैं,
पर्वत—सपनों के लिए।

हम जन्मे नहीं बस
खाली बैठने के लिए,
कुछ तो कारण है,
कुछ तो उद्देश्य।

क्या वो उद्देश्य
किसी क्षेत्र में उत्कृष्टता है?
नाम कमाना? धन अर्जित करना?
या फिर मानवता का हित?
प्रकृति का रक्षण?
पृथ्वी की पुकार सुनना?

अपने लिए जीना — एक विकल्प।
दूसरों के लिए जीना — दूसरा।
दोनों में असर है,
अगर असरदार हुए,
तो ये दुनिया याद रखेगी।

पर लोग सोचते हैं उल्टा,
कहते हैं — "प्रसिद्ध बनो",
मैं कहता हूँ —
"श्रेष्ठ बनो, प्रसिद्धि स्वयं आएगी।"
प्रसिद्धि कारण नहीं,
वो तो एक परिणाम है।

बुधवार, 9 अप्रैल 2025


तरु-शाखा पर बैठ विहगिनी बुनती थी निज स्वप्न-निकेतन,
कण-कण में बसती आशा, श्रम से सजा वह मृदु आलयन।
पर्ण-पुष्प से गूँथ बनाई, जीवन की वह मधुर छवि,
मानव-सा वह चातक भी, निज कुटुम्ब हेतु अनुरक्त सदा रवि।

नभ में विहारिणी, फिर भी बंधी अपने आलय से,
स्वच्छंद थी वह, पर थी सुधि निज नीड़ के प्रालय से।
सोचा — "यह कुटी ही मेरी शांति-शरण बन जायेगी,
जहाँ सहेज रख सकूँ कांति, जहाँ प्रीति मुस्कायेगी।"

परन्तु हाय! विधि का विधान कैसा,
निज श्रम पर व्याधि का आघात कैसा।
दुष्ट ने किया विध्वंस घोंसले का,
अंडों पर पड़ा अनर्थ का झोंका।

विहगिनी थी विकल, अश्रु-प्रवाह में लीन,
सारा सृजन हो गया, पलक झपकते ही क्षीण।
गूँज उठी पीड़ा उसकी इस निरभ्र अम्बर में,
जैसे चेतावनी हो सबको इस अस्थिर संसार में।

नर की कन्या भी कुछ वैसी ही गति पाती,
जब रीति-रिवाज, कुल-धर्म को तज जाती।
जो दिखता है सरल, वह सदा सहज नहीं होता,
जो दिखता है नूतन, उसमें स्थायित्व नहीं होता।

स्वातंत्र्य उत्तम है, पर संयम उसका मूल है,
परंपरा से जुड़ा जीवन ही निष्कलुष फूल है।
जहाँ धर्म, मर्यादा और नीति का हो संग,
वहीं सुरक्षित रहता है नारी का मंगल-अभंग।

अतएव हे सुबुद्ध मानव! यह सीख सदा धारण करना,
सुधि रखो – घोंसला वही सजाना, जो न सिर्फ सुंदर, अपितु हो अडिग, अचल, स्थिर —
धर्म-संरक्षित, प्रेम-संवलित, कुल-परंपरा में गुँथा।