मनुष्य अक्सर यह मान लेता है कि सुंदरता का अर्थ सिमेट्री है—सब कुछ बराबर, संतुलित और एक-सा। लेकिन जब वह सृष्टि की ओर देखता है, तो यह धारणा बार‑बार टूटती है। मानो ईश्वर ने जानबूझकर मनुष्य के सौंदर्यबोध को चुनौती देने के लिए ही यह संसार रचा हो।
क्या ईश्वर ने कुछ भी सुंदर नहीं बनाया? अगर सुंदरता का अर्थ सिमेट्री है, तो शायद नहीं। नदियाँ सीधी नहीं बहतीं, वे टेढ़ी‑मेढ़ी रास्तों से गुजरती हैं। पहाड़ उबड़‑खाबड़ हैं, कहीं मैदान है तो कहीं पठार। पत्थर एक आकार के नहीं होते, एक ही पेड़ के पत्ते भी एक जैसे नहीं होते। हर जीव अलग है, हर देह में भिन्नता है।
मनुष्य का ही शरीर देख लें—बायाँ हिस्सा दाएँ जैसा नहीं है, केवल उसका आभास है। आँखें बराबर नहीं, हाथों की ताकत समान नहीं, दिल शरीर के बीच में नहीं है। फिर भी शरीर काम करता है, चलता है, जीता है।
तो फिर प्रश्न उठता है—सुंदरता क्या है? सुंदरता वह है जो काम करे। जो जीवित रखे। जो उपयोगी हो।
सूरज गरम है, चंद्रमा ठंडा। अगर दोनों एक जैसे होते, तो दिन‑रात का अर्थ ही नहीं बचता। कुछ ग्रह धीरे चलते हैं, कुछ तेज; कुछ में वलय हैं, कुछ में नहीं। केवल एक ही ग्रह—पृथ्वी—पर जीवन है। क्या यह असंतुलन है, या सटीक उपयोगिता?
ईश्वर ने सिमेट्री क्यों नहीं चुनी? क्योंकि पूर्ण सिमेट्री जड़ होती है। अगर पृथ्वी पूरी तरह गोल होती, तो मौसम नहीं बनते। अगर तापमान हर जगह समान होता, तो हवा नहीं चलती। अगर सब कुछ बराबर होता, तो परिवर्तन असंभव हो जाता।
ईश्वर ने सिमेट्री को नकारा नहीं, बल्कि उसे सीमित किया। जहाँ ज़रूरी था वहाँ संतुलन दिया, और जहाँ जीवन फूट सकता था वहाँ असमानता छोड़ दी।
तो मनुष्य सिमेट्री से इतना प्रेम क्यों करता है? क्योंकि सिमेट्री उसे नियंत्रण का भ्रम देती है। चौकोर घर, बराबर कमरे, सटीक टाइलें—सब कुछ अनुमान में रहता है। कारें चौकोर, इमारतें चौकोर, शहर चौकोर। अगर कहीं रेखा टेढ़ी हो जाए, तो उसे बदसूरत कह दिया जाता है।
लेकिन क्या जो दिखने में सुंदर है, वही उपयोगी भी होता है?
उपयोगिता बनाम सिमेट्री प्रकृति उपयोगिता को चुनती है, सौंदर्य को नहीं। नदी का काम पानी पहुँचाना है, सीधी दिखना नहीं। पेड़ का काम फल देना है, पत्तों का एक‑सा होना नहीं। आँखें बराबर हों या न हों, दिखना ज़रूरी है।
मनुष्य अक्सर किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार को केवल उसके रूप से आँक लेता है। लेकिन जीवन रूप से नहीं, उपयोग से चलता है।
धर्मों का विरोधाभास भी इसी का उदाहरण है एक धर्म कुछ कहता है, दूसरा उसका उलटा। अगर सत्य पूरी तरह सिमेट्रिक होता, तो केवल एक ही धर्म होता। लेकिन सत्य बहुआयामी है, और मनुष्य सीमित। हर धर्म सत्य की उपयोगिता का एक पक्ष पकड़ता है, न कि उसकी संपूर्ण सिमेट्री।
तो असली प्रश्न क्या है? क्या हमें सुंदर दिखना है, या उपयोगी होना है? क्या बराबर होना ज़रूरी है, या सार्थक होना?
ईश्वर ने पृथ्वी को भी पूरी तरह गोल नहीं बनाया। थोड़ा सा झुकाव रखा—और उसी से ऋतुएँ बनीं, जीवन पनपा।
अंततः सृष्टि हमें यह सिखाती है कि सिमेट्री से अधिक महत्वपूर्ण उपयोगिता है। कोई कैसा दिखता है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह क्या करता है।
मनुष्य सिमेट्री को सुंदर कहता है क्योंकि वह उसे समझ सकता है। ईश्वर असिमेट्री रचता है क्योंकि उसी में जीवन संभव है।

