मृत्युलोक

ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........

शनिवार, 28 दिसंबर 2024

दोगला पन

प्रस्तुतकर्ता ऋषभ सिंह चंदेल पर 9:50 am कोई टिप्पणी नहीं:
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ऋषभ सिंह चंदेल
मैं , मेरे हृदय में व्याप्त दर्द, अनुराग, लगन और विचार का उत्पत्तिकर्ता नहीं , इनका सर्व कालीन ठेकेदार हूँ ।
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@RISHABH SINGH CHANDEL. चित्र विंडो थीम. Blogger द्वारा संचालित.