सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

क्षणिकाएं

समर्थ सक्षम है ।
जीवन जैसा है उसको वैसे ही ,
सहने को,
पर क्या कभी सोचा ?
कि कैसे निर्बल, निर्भर, निर्धन का
अहित सुनिश्चित न हो ।

ज्ञान है, धन है
सम्मान है
क्या नहीं है ?
और क्या चाहिए ?
पर क्या सोचा ?
उनके लिए कभी जिनके जीवन में,
लाइलाज मर्ज है,
नाम पर कर्ज है ।
गवाने को कुछ नहीं ,
कमाने को रोटी है ।
रहने को टिन की टपकती छत है,
और सर पर तपता सूरज है । 











***
सुन बच्चे !
संभलकर हँस,
इतने उलझे हुए मामलों में न फँस,
क्योंकि
बड़े होने के बाद ,
हालात एक से होते हैं ।
और ,
बड़ा हर बच्चा होता है ।

तेरे हँसने से ,
तकलीफ होती हैं ।
इसलिए कहता हूँ ।
तेरे बड़े होने पर ,
बड़ा मैं भी हो जाऊँगा ।
देख लेना तू ,
फिर हँसी न निकलेगी ,
फिर रोना न आएगा,
तब देखूँगा कैसी हँसी निकलती है ?

तब लगेगा इन महाशय को
गुरु बना ले ,
क्या पहुँची चीज़ है ये,
हमारे बड़े होने भर में ,
ये भी बड़े हो गए ,
बखूबी ये ,
बाल अबोध मन को ,
समझ गए ।

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