( दृश्य ) अपनी छोटी बेटी और सबसे छोटे लड़के के साथ एक मुस्लिम महिला । लड़की सर झुककर ही बैठी रही, काफी निस्तेज सी । अपनी माँ की जिम्मेदारियों को देखकर शायद सहमी हुई सी। छोटा बेटा मोबाइल में गेम खेलने की ज़िद लिए मोबाइल माँ के हाथों से छीनने के असफल प्रयास करता हुआ । माँ का मन चिंताग्रस्त था । तभी मोबाइल में मैं हूँ डॉन की रिंगटोन के बजने पर फ़ोन को उठाने के बाद की बातचीत के अंश अग्रलिखित है ।
" आफ़ताब ! हाँ हाँ । सब ख़ैरियत । बड़े वाले लड़के की तबियत अब ठीक है । (माँ की आँखों में आँशु आ गए ) मझोले की तबियत बहुत ख़राब है । छोटे वाले को अभी अस्पताल से इंजेक्शन दिला के आ रही । उसको कुत्ता काट लिया था । "
हाल ही में आये धर्म आधारित जनगणना के आंकड़े पहले ही मेरे नादान से हिन्दू हृदय को कचोट रहे है । उस पर इस प्रकार का मार्मिक दृश्य देख कर सचमुच हृदय पसीज जाता है । एक माँ और चार बेटे और एक बेटी । मुसीबत के समय में किस-किस की सेवा करे । ऊपर से घर के काम भी देखने होते है । ये है जनसंख्या विस्फोट जिसकी लपटे जब तब इंसान को जलाती रहती है ।
इस दृश्य को देखने के बाद उठे विचारों को एक एक कर नीचे लिखे देता हूँ, ठीक लगे तो मान लीजियेगा :
(1) सब कहते हैं कि मुसीबतों को झेलने के बाद ही इंसान मजबूत बनता है और मजबूती से शक्ति आती है । शक्ति के अर्जन पर जिम्मेदारी आती है । एक जिम्मेदार मुस्लिम महिला के पास मोबाइल होना चाहिए । भले ही ये मुसीबतों की देन है पर किंचित खुलेपन का द्योतक भी तो है । नहीं तो कहा फतवा के फेर में मोबाइल बिना चूड़ियों वाले हाथों में आने वाला था । माँ के हाथ में मोबाइल की पहुँच निश्चय ही बेटी को भी इसके लिए उकसायेगी ।
इस्लाम के नाम पर जितना लश्कर-ए-तोएबा ने भारत में बम से तबाही मचाई है उतनी और बल्कि उससे ज्यादा तबाही इस समाज ने महिलाओं के मूलभूत अधिकारों को छिन के मचाई है । बस किसी तरह भारत की हर मुस्लिम बाला बन जाये 'मलाला' तो समझो काम हो गया।
(2) जनसंख्या किसी भी समाज की बढ़े अंततः प्रत्यक्ष रूप से कष्ट उस समाज को और उसके बाद देश को झेलना पड़ता है ।
वैसे ही इतनी महंगाई है । उसके बाद दिल्ली जैसे मेट्रो शहरोँ में प्रवसन के कारण जनसंख्या का जमघट लग गया है । खाने को अनाज पुज नहीं पा रहा है । न्यूनतम जरूरत तक लोग पूरा नहीं कर पा रहे । गंदगी से बुरा हाल है । डेंगू का प्रकोप चरम स्तर पर है । डेंगू के इलाज के लिये शहर भर के पपीते के पेड़ नंगे हो चुके है और बकरी का दूध 2000 रूपये प्रति लीटर बिक रहा है । इतने पर भी नहीं समझियेगा की "हम दो हमारे दो " का स्लोगन सरकार ने ट्रक और ऑटो के पिछवाड़े का सूनापन कम करने के लिए नहीं दिया था । इस भीषण महंगाई में कैसे सबल और सकुशल श्रमिक तैयार करेंगे यही सबसे बड़ी चुनौती है । भारत विश्व का सबसे युवा देश होने के इस सुनहरे अवसर के लाभ को भुनाते हुए फिलहाल नहीं दिख रहा है।
(3) एक नारी के जीवन की व्याख्या प्रश्नों के अबूझ गट्ठर से ही हो सकती है । जिनके उत्तर वेदना और वेदना की सीमा के निरन्तर उतार चढ़ाव के दौरान शरीर पर खिंची अनगिनत आड़ी तिरछी रेखाएँ बयाँ करती है ।
" पीड़ा ही व्यक्ति में ज्ञान के स्रोत के उद्गम द्वार को खोलती है । पीड़ा ही जीवन है । "
सर झुका कर बैठी हुई उस लड़की के मन की सबसे बड़ी कुंठा क्या होगी ? क्या लडकियाँ मौन रहने को, सर झुकाने को, सिर्फ बाते मानने को ही होती है ? क्या कभी किसी को अपनी दयनीय स्थिति का निवारण अपने धर्म को छोड़ने में छिपा हुआ लग सकता है ? क्या लव जिहाद जैसी घटनाएँ प्रेमजाल न होकर धर्म, समाज और पारिवारिक बन्दिशों को ठेंगा दिखने की तरकीब है ? इन प्रश्नों के और इनके अतिरिक्त कई अनगिनत प्रश्नों के प्रकोप से घायल उस मासूम से चेहरे में सुंदरता बची ही नहीं थी । क्या यही उसका भाग्य है ?
इसके अतिरिक्त अपने सम वयस्क भाई की तरह क्यों वह भी मोबाइल में गेम खेलने की ज़िद नहीं कर रही थी ?
(4) कुछ भी हो इतनी तकलीफों के बाद भी मोबाइल का रिंगटोन " मैं हूँ डॉन" शाहरुख़ खान की पिक्चर वाला था ।
चीजों को लिख देने से उन पर विश्वास पक्का हो जाता है और भरोसे की एक अपनी अलग नज़र होती है । जिस नज़र से देखने पर सब कुछ सच लगने लगता है । इसलिए जो देखता हूँ वही लिखता हूँ । फ़ोन पर बातचीत खत्म करते हुए बोले गए आखिरी लफ़्ज के साथ यही विराम लेता हूँ ।
"Salawalikum"
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