गुरुवार, 19 नवंबर 2015

निराश मत होओ, सब ठीक हो जायेगा

"निराशा से सिर्फ मन घायल होता है, हमारी नसमझी हमारी जान ले लेती है । "

      मनोनुकूल जीवन न होने के कारण निराश होना मन का स्वाभाविक लक्षण है। ऐसे में किसी के यह कहने पर की "निराश मत होओ सब ठीक हो जायेगा "। सिर्फ और सिर्फ कोरा झूठ प्रतीत होता है जो कि मन बहलाने के लिए बोला जा रहा है । हालाँकि हो सकता है, ऐसा बोलने वाला हमारा हित ही चाहता हो फिर भी उसकी इन बातों से मन का हाल और जीवन का अकाल दोनों ही दूर तो नहीं हो पायेगा । और इसकी जकड़न के बढ़ने का परिणाम अत्यंत भयवाह होता है । निराश और हताश व्यक्ति ही आत्महत्या करते हैं। मच्छर और मक्खी से बचने के लाख जुगत भिड़ने वाला मनुष्य खुद को मर लेगा । सुनने भर से विश्वास नहीं होता । आत्महत्या की ऊँची दर वैश्विक समस्या है । विश्व में, हर 40 सेकेण्ड में एक मनुष्य खुद को मर लेता है । 
      देख लिया इतनी खतरनाक चीज़ है निराशा। निराशा और कुछ नहीं मनुष्य के पञ्च चिर शत्रुओं का ही ऐसा मिश्रण है जिसमें इन पाँचों के विपरीत गुण भरे हुए है । उदाहरण के लिए सामान्यत: निराश व्यक्ति स्वतः भले क्रोध, काम, लोभ से बचा रहे पर उससे जुड़े अन्य लोगों में वह इन भावों को बोता और सींचता रहता है । निराश व्यक्ति वास्तव में चलता फिरता शांति विनाशक यंत्र है । 
       ऐसे में निराशा के साथ किये गए प्रयोग के कुछ संभावित परिणाम अग्र लिखित है । शायद ये आपकी या आपके किसी अपने के मन से निराशा को दूर कर आशा का संचार कर सके । और हाँ ये प्रयास उस एक बेकार लाइन से लाख गुना अच्छे है जिसमें कथा कथित शुभचिंतक ये कहते है कि 'निराश मत होओ सब ठीक हो जायेगा' । ऐसे में एक ही बात बोलने का मन करता है-" घण्टा ठीक हो जायेगा, आप के ऊपर आएगा तब पता चलेगा और तब देखूँगा कैसे सब अपने आप ठीक होता है ?"


(१) सबसे पहले निराशा को मन का स्वाभाविक गुण मानते हुए अपनी निराशा को और उसके कारण को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना चाहिए । ऐसा करने से आपको अपनी भावनाओं की सही समझ बनेगी । कभी-कभी निराशा के कारण इतने संश्लिष्ट होते है कि उनको पहचानना कठिन होता है । ऐसा करके आप खुद को जान पाएंगे । और सबसे मजेदार बात आप यह जान पाएंगे कि किसी विषय में कौन-सी बात आपको सबसे ज्यादा मानसिक स्तर पर चुभ रही है और तब आप अनायास ही मन ही मन कहेंगे "ओ तेरी, अबे इस बात को लेकर मैं इतना परेशान हूँ । " व्यक्ति केवल चिंतन न करने के कारण सामान्य सी बातों को भी नज़रअंदाज़ कर देता है । ऐसा करने से बचें ।

(२) अपने जीवन की परिस्थितियों को आप से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता । हाँ हाँ ! वो चाहे कितना बड़ा बाबा या फ़क़ीर हो । दूसरों से जल्दबाजी में अपने भाव शेयर न करें । क्योंकि वो कुछ नहीं कर सकते वो केवल वही घिसी पिटी पञ्च लाइन " निराश मत होओ......." दे सकते हैं । और आपके इस कुत्सित मानसिक दशा से बाहर निकलने के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं । इस तरह का हर असफल प्रयास आप को और निराश के दलदल में धकेलते जायेंगे ।

(३) यह बिंदु सबसे महत्त्वपूर्ण है । समस्या को पहचान जाने के बाद उसके वास्तविक हल का विकल्प खोजें (बस इतनी सी ही बात है) । यह उपाय अखंड, अपराजेय, सब मन शोक निवारक, विशेष तरीकों से सिद्ध किया हुआ है । यह उपाय किसी भी निराशाग्रस्त मन से उसके निराशा के कारण को क्षण भर में तो नहीं हटा सकेगा पर हाँ हटाना शुरू जरूर कर देगा । अब समस्या बढ़ेगी नहीं । धीरे-धीरे ही सही उपचार होने लगेगा ।
एक आम जीवन की परंतु काल्पनिक-सी परिस्थिति को लेकर इसका परिक्षण करके देख सकते है जैसे कि मान लेते हैं कोई परीक्षार्थी किसी अमुक 'सफलता' की प्राप्ति की आकांक्षा में मेहनत करता है और हर बार विफल हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसके मन में निराशा घर कर जायेगी । कुछ भी करने का उसका मन नहीं करेगा । और इस मनः दशा के साथ उसका जीवन दिन ब दिन कठिन होता जायेगा । सम्भावना है कि एक विषम दिन वो आत्महत्या भी कर ले । ऐसी स्थिति में यदि विकल्प रूप में उसे शीघ्रता से कोई अन्य सफलता मिल जाती है तो निश्चितरूप से उसकी निराशा में कमी आएगी ।

कुछ अन्य अवलोकन का भी सहारा लेकर इसे समझ सकते हैं । मान लेते है कि कोई व्यक्ति किसी बड़े व प्रतिष्ठित संस्थान से इंजीनियरिंग करना चाहता था परंतु ऐसा नहीं हो पता है तो वह किसी अन्य संस्थान से भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर सकता है । और यदि वो ऐसा कर पता है तो उसके जीवन में कम से कम इस कारण से कभी भी स्थाई और दृढ़ निराशा नहीं छायेगी ।

(४) विकल्पों की जहाँ भी बहुलता होगी । वहाँ निराशा के मामले कम मिलेंगे । व्यक्ति सिर्फ अपनी आकाँक्षाओं की पूर्ती करना चाहता है । स्वाभाविक सी बात है जब एक ही प्रकार की इच्छा कई लोग पालेंगे तो कुछ को निराशा और विफलता हाथ लगेगी ही परंतु ऐसे में भी मनुष्य को चाहिए की तुलनात्मक रूप से समानान्तर विकल्प की तलाश करते हुए सदा आशावादी बने रहने का प्रयास करना चाहिए ।

"निराशा से सिर्फ मन घायल होता है हमारी न समझी हमारी जान ले लेती है । "

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