"यदि मुझे अपनी जाति को भूल कर आरक्षण सही लगता है तो अपनी आर्थिक स्थिति को याद करके उतना ही गलत भी लगता है"
"आरक्षण का विरोध जायज है और उस विरोध का समर्थन भी पर .र..र..र..र न्तु। "
घर में सबसे बड़े होने के कारण पहले सभी से बहुत सारा प्यार और दुलार मिलता था । जैसे-जैसे छोटे भाई और बहन परिवार में आते गए । अब वो बात नहीं रही, किसी चीज़ को बाँटना मेरे लिए बहुत कठिन हो गया। अचानक से सेंटर ऑफ़ अट्रैक्शन कहीँ और शिफ्ट हो गया था। उस वक्त 5 साल की उम्र में ये समझना कठिन था कि ये अचानक सब को क्या हो गया। वैसे ये तो बेहद सरल सा नियम है कि जिस भी चीज़ का मार्केट में विकल्प उपलब्ध हो जायेगा उसकी यू. एस. पी. पर बट्टा लगना तो तय है। अब जीवन में प्रतिस्पर्धा सा अनुभाव होने लगा परन्तु प्रतिस्पर्धा में तो कोई न कोई विजेता होता है । मगर यहाँ तो घरेलु समाजवाद आ गया था जिसमें " क्षमता के अनुसार काम और आवश्यकता के अनुसार सुविधाएं " का नियम चलता था। अब बस सोचने को रह गया था कि वो भी क्या दिन थे ? किसी ने सच ही कहा है कि समाजवाद सिर्फ सोचने में अच्छा लगता है ।
लेकिन यहाँ पर बालकाण्ड से इस लेख का श्रीगणेश करने का क्या औचित्य हो सकता है ? कुछ तो जरूर होगा तभी लिखा गया है।
50 के दशक से पहले तक अंग्रेजों की गुलामी सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्या थी। इससे निजात पाने के लिए दलितों, किसानों और जनजातियों ने भी संघर्ष किया था तो नवनिर्मित राष्ट्र किसी एक को महत्त्व कैसे दे सकता है ?
ऐतिहासिक परिदृश्य में देखे तो जब तक समाज की संरचना इस प्रकार की थी कि उच्च वर्ण सत्ता, संसाधन और शक्ति का एकमात्र उपभोगकर्ता था तब तक तो सब ठीक था । मगर जैसे ही देश में लोकतंत्र के आने के बाद सभी के साथ और सभी के विकास की बात होने लगी तो पहले से स्थापित जमींदारो, पूंजीपतियों के पेट में दर्द उठना स्वाभाविक था। अब जन्म जात स्वामित्व छीनने वाला था, जो कल तक बराबरी में चलने की हिम्मत नहीं करते थे वो अब साथ में बैठने वाले थे । सिर्फ बाहर से कानूनी दबाव के कारण भाईचारे का दिखावा तो कर लिया पर अंदर से अभी भी उतनी ही दूरियाँ थी।
1949 में पास हुए संविधान के कुछ अनुच्छेद उन चुनिंदा जातियों को जो पिछड़ी हुयी है और जिनका सरकारी नौकरी में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं उनके लिए सकारात्मक कार्यवाही के माध्यम से आरक्षण की व्यवस्था की। इस नई व्यवस्था से जिनको फायदा था उनका प्रसन्न होना और जिनको ऐसा लग रहा था कि उनके साथ अन्याय हुआ है उनका क्रोधित होना अपेक्षित था।
आज देश के आजाद होने के बाद के 68 साल बीत जाने के बाद ऐसे क्या कारण हो सकते है ? कि बहुत प्रयास करने पर भी ऐसा लगने लगा है कि आरक्षण का विरोध भी जायज है और उस विरोध का समर्थन भी ।
इस सम्बन्ध में निम्न तथ्य व तर्क प्रस्तुत है :
(1) आरक्षण व्यवस्था के विरोध में सर्वाधिक उठाया जाने वाला सवाल है, आखिर कब तक ? कोई तो तारीख होगी जब यह व्यवस्था ख़त्म होगी ? कोई तो वह लक्ष्य होगा जिसकी प्राप्ति के बाद ये घोषणा की जायेगी कि अब से आरक्षण ख़त्म । यद्यपि संविधान सरकारी नौकरी और पिछड़ेपन के उन्मूलन को आरक्षण का लक्ष्य मानता है । पर क्या भरोसा? कल को पिछड़ेपन की नई परिभाषा गढ़ ली जाये । जिस देश में आज तक गरीबी की सटीक परिभाषा निर्धारित कर नहीं पाये वे पिछड़ापन क्या बताएँगे ? और जहाँ तक बात सरकारी नौकरी में भागीदारी की रही तो ऐसा क्यों लगता है सरकार को कि दलित सरकारी नौकरी ही करेंगे। मोदी जी के स्टार्ट अप इंडिया, मेक इन इंडिया, मुद्रा बैंक, सामाजिक बैंकिंग, स्किल इंडिया में आरक्षित वर्गों को उद्यमशीलता के लिए भी प्रोत्साहित कर सकते है ।
'डिक्की' नामक संगठन दलित उद्यमशीलता को बढ़ावा भी देता है ।
(2) जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था में समय के साथ कई कमियाँ उजागर हुयी है। जिनमें से एक तो दलित आरक्षित जाति के भीतर ही अति/महा दलित आज भी अपने वर्ग के ऊपरी तबके के लोगों द्वारा शोषित है । फलस्वरूप आरक्षण का लाभ संपूर्ण आरक्षित वर्ग को न होकर सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित होकर रह गया है ।
(3) चूँकि वर्तमान समय में देश डिजिटल क्रांति और तेज आर्थिक समृद्धि के दौर से गुजर रहा है । इस दौर में सभी अर्थशास्त्री एक स्वर में महंगाई को अपरिहार्य बता रहे है । अगले कई दशकों तक ऊँची महंगाई दर इसी प्रकार बनी रहेगी । इस माहौल में जीवित रहने के लिए
देश सस्ता अनाज, तेल, नमक सभी जाति के गरीबों और वंचितों को दे रहा है तो सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थान में आरक्षण क्यों नहीं दे सकता ?
(4) आरक्षण व्यवस्था का लाभ एक बार ले चुकने के बाद भी ठीक आर्थिक स्थिति वाले परिवार कई पीढ़ियों तक इसका अवैध लाभ लेते रहते हैं जो कि अनुचित और अन्याय है। इसको रोकने का सरकार को प्रयास करना चाहिए ।
(5) एक अत्यंत रोचक तथ्य और तर्क इस व्यवस्था के विपक्ष में यह है कि अनुसूचित जाति के मुस्लिम और ईसाइयों को आरक्षण सिर्फ धर्मान्तरण के भय से नहीं दिया जा रहा । यह किस हद तक उचित है ?
इसके अतिरिक्त कई अन्य ख़ामियाँ भी हो सकती है जिनका वर्णन न करने का कारण उनके प्रति मेरी अनभिज्ञता है ।
कोई भी व्यवस्था पूर्णतः सही नहीं हो सकती। कुछ न कुछ ख़ामियाँ समय के साथ रेंगते हुए प्रवेश कर ही जाती है इसलिए सरकार को चाहिए की एक विशेषज्ञ कमिटी के माध्यम से व्यवस्था में विद्यमान त्रुटियों को दूर करने के सम्बन्ध में आवश्यक सिफारिशें ग्रहण करे और देश में बढ़ रहे आरक्षण के विरुद्ध रोष को समय रहते सीमित और नियंत्रित करें । अन्यथा गुजरात से शुरू हुयी यह चिंगारी कब भयवाह अग्निकांड में तब्दील हो जायेगी पता भी नहीं चलेगा ।
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