बुधवार, 3 सितंबर 2014

तात्कालिक सन्यासी

मैं असमय ही कहीं,
नहीं जाता ।
तो कहीं रूक भी नहीं जाता ।
पर कभी - कभी उन ,
एकांत ठिकानों का ध्यान,
मुझे असमय ही रोक लेता है ।
लोग ऐसे ठिकानों पर अब ,
सैर सपाटो को जाया करते है ।
मुझे याद है ,
किंही महापुरुष ने मंदिर बनवाए ,
सोचा होगा की भगवान का संग ,
भगवान बना देगा ।
पर ऐसा हो न सका ,
और जो हुआ सर्वविदित है,
कि हरे - भरे पहाड़ो को देखकर ,
सून - सान गुफाओं मे जाकर ,
और अंत में भव्य देवालयों में प्रसाद पा कर ,
मैं असमय ही रूक जाता हूँ ।
पर अब ऐसा हो न सकेगा ,
क्योंकि ये जगहें तस्वीरों में कैद होने लायक है ।
लोग यहाँ सैर सपाटे के लिए आते है ।
असमय रुकने के लिए नहीं ।

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