मरी हुई सीढ़िया ,
शोर नहीं करती ।
चलती हुई भी ,
शोर नहीं करती , मगर कराहा करती थी ।
ये ऊपर जाती , तो सब ऊपर जाते ।
ये निचे जाती , तो सब निचे जाते ।
जब रुक जाती ,
सिर्फ सेवाए देकर ,
जब तक चलती है चले ,
की आशा लेकर, बोझा ढोती ।
मगर इनके ऊपर या निचे नहीं जाने पर भी ,
लोग इन्हें रौदकर , अब भी चले जा रहे है ।
मेहनतकश आज कुछ बढ़ गए है ।
और आलसी अब लिफ्टो में ,
भीड़ बड़ा रहे है ।
देखते है कब तक चलती है , चले !
ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
गुरुवार, 18 सितंबर 2014
मरी हुई सीढ़िया
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