शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

आज कल

जब तक आभासी आशा थी ,
चित् स्वर्थी था , मन ललचाया हुआ , मस्तिष्क में काल्पनिक सपनें थे ।
तब तक रिश्तो में माधुर्य और मिठास था ।
आने का स्वागत हुआ ।
मिलने की आतुरता थी ।
जाने पर अॉखे नम थी ,
अब जब स्वार्थ बहुदेशीय परियोजना की
तरह विफल हो जाएगा ।
सपनें शीशे की तरह टूटें ही समझो ।
लालच मन में ही वृध्द हो गया ।
अब रिश्तों में तीक्ष्ण मौन ,
आभासी माधुर्य और मिठास था ।
आवाज में कर्कशता थी ,
आने का स्वागत तो हुआ ।
पर मिलने का प्रयास नहीं ,
जाने की प्रतीक्षा थी ।
आखें अबकी बार सूखी हूई और लाल थी ।

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