सोमवार, 7 अप्रैल 2014

क्योकि ये चुनावकाल है


पत्रकारिता मनोरंजन के लिए नहीं होती है । किसी कि दशा का अवलोकन करके उससे ये कहना कि यदि मेरे सामर्थ्य में होता तो मैं तुम्हारी स्थिति बदल देता अथवा आवाक हो जाना, देश कि  अवस्था पर क्षुब्धित होना , तीनो ही स्थितियाँ निरर्थक है। पत्रकारिता तो सत्तासीनों को वास्तविकता के दर्शन कराती है इसलिए जब कोई इसे समाज का आइना मानकर अपना सच प्रस्तुत कर रहा हो तो उस में से ज्यादा से ज्यादा ग्रहण करना चाहिए न कि उसका मनमुताबिक विश्लेषण या उत्पाद बनाकर उससे व्यापार ।  आजादी से अबतक देश कि दशा में बहुत बदलाव नहीं हुआ है  उदाहणार्थ  पहले बिना इलाज़ के मरते थे अब लाइलाज़ बीमारियाँ जान ले रही है। 

पता सबको सब है  फिर सनसनी किस बात कि है कौन है जो अपने वर्त्तमान से अनभिज्ञ है ? यदि है तो कारण क्या है ? इसका जिम्मेदार कौन है ? पहले से ही ये पीछे थे तो आज इनकी दशा का अवलोकन क्यों ? ये आश्चर्य कैसा है सभी के चेहरे पर सब कुछ देखकर ? बात तो बस इतनी सी है कि अभिनय करके जिम्मेदारी से बचा जा सकता है परन्तु परिणाम और प्रभाव से नहीं।  चीज़े यदि नई लग रही हैं इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि इनके लिए हम और  हमारे लिए ये नए है।  इनकी स्वयं से लड़ाई तो पुरानी है और अभी तक न जीत पाने के जिम्मेदार भी हम सब है।  ऐसा कुछ तो अनुभव समाचार टीवी चैनलो पर जब देश के किसी दूरदराज़ इलाके में बसे हुए रहवासियो कि दशा को देखकर होता है क्योकि ये चुनावकाल है । भाषा  और  व्यवहार बनते बिगड़ते रहते है।

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