भीड़ की ताकत होती है ।
वो क्रूर को शांत कर सकती है ।
और बस इतना काफी है ।
ये जानने के लिए की पिताजी ,
आज बिलकुल बदले हुए थे ।
बच्चे को सीने से लगाये ।
बच्चे के मुह से अपनी पेन छुड़ाए ।
माँ शंकालु थी विस्मित भी ,
पिता के हृदय परिवर्तन की कायल हो गई ।
कही ये मुहूर्त न बीत जाये ,
उसने मानो अपने ,
वात्सल्य की थाती ही खोल दी ।
बच्चे को दुलारती लोलारती ,
भारी भीड़ में ममता की व्यापारी ,
कोई इनसे सीखो ,
बच्चो को कैसे पालते है ।
भाव इतने उमड़ घुमड़ कर आ रहे थे ।
कि बच्चे के मनोविज्ञान को ,
बड़ो पे लगाना पड़ गया ।
तब कुछ स्थिति साफ हुई ।
कि भीड़ की ताकत होती है ।
वो तो बच्चो को माँ बाप के आँचल तक समेटती है।
बनाती कम ,
मगर उससे ज्यादा बिगाड़ देती है ।
ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
गुरुवार, 25 सितंबर 2014
मुहूर्त न बीत जाये
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