गुरुवार, 25 सितंबर 2014

मुहूर्त न बीत जाये

भीड़ की ताकत होती है ।
वो क्रूर को शांत कर सकती है ।
और बस इतना काफी है ।
ये जानने के लिए की पिताजी ,
आज बिलकुल बदले हुए थे ।
बच्चे को सीने से लगाये ।
बच्चे के मुह से अपनी पेन छुड़ाए ।
माँ शंकालु थी विस्मित भी ,
पिता के हृदय परिवर्तन की कायल हो गई ।
कही ये मुहूर्त न बीत जाये ,
उसने मानो अपने ,
वात्सल्य की थाती ही खोल दी ।
बच्चे को दुलारती लोलारती ,
भारी भीड़ में ममता की व्यापारी ,
कोई इनसे सीखो ,
बच्चो को कैसे पालते है ।
भाव इतने उमड़ घुमड़ कर आ रहे थे ।
कि बच्चे के मनोविज्ञान को ,
बड़ो पे लगाना पड़ गया ।
तब कुछ स्थिति साफ हुई ।
कि भीड़ की ताकत होती है ।
वो तो बच्चो को माँ बाप के आँचल तक समेटती है।
बनाती कम ,
मगर उससे ज्यादा बिगाड़ देती है ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें