दिन को जगे ,
काम को भागे ,
शाम को घर आना पड़ता ही है ।
दिन के राजा को ,
परेशानी इससे होती है ।
की रात ही क्यों होती है ।
पुरे दिन पिसते रहो ,
परिवार के लिए घिसते रहो ।
फिर भी शाम को घर आना पड़ता ही है ।
दिन के राजा को ,
परेशानी इससे होती है ।
कि आखिर रात ही क्यों होती है ।
भागे भागे जाओ , भागे भागे आओ ,
धक्के खाओ , थक भी जाओ ,
उस पर भी जब देर तो हो ही जाती है ।
बहुत ग्लानी होती है ।
की आखिर रात ही क्यों होती है ।
घर जाने में,
जितना कष्ट मिला , उतना ही आराम मिला ।
समता का सिद्दांत मिला ।
खाने का डब्बा , पत्नी का प्यार ,
बच्चो से दुलार ,माँ बाप का आशीर्वाद ,
आखिर क्या लेने घर जाते हो ।
तुम्हारे बिना भी सब अच्छे से रात में सोते है ।
हा तुम्हारी पत्नी भी आराम से सोती है ।
इतनी परेशानी होती है ।
तो क्यों जाते हो ,
विशवास दिलाने को ,
सब घर आते है तो मै भी आता हु ।
तुम सब मुझसे ही हो ।
यह याद दिलाने को ,
की तुम्हारी तकलीफों से ,
मुझको भी तकलीफे होती है ।
तब पर भी आखिर ये रात ही क्यों होती है ।
ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
मंगलवार, 16 सितंबर 2014
रात ही क्यों होती है
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