नियमो को मानने वाले ,
बन्धनों में जल्दी बंध जाते है ।
सहायता को तत्पर रहते है।
सस्ते में सभी से छले जाते है ।
क्या करे ?
आश्रितों को , इमानदारो को ,
और भोलेपन से भरे मन को ,
लूटने की होड़ जो मची है ।
मौके कम ही दिए जाते है ।
अवसर हमेशा सिमित ही होते है ।
उन मौको को पाकर ,
जिनसे ये बात बदल जाये की ,
अब से आश्रितों को , इमानदारो को ,
और भोलेपन से भरे मन को ,
ठगा न जा सकेगा ।
ऐसा होना पर्याप्त होगा ,यह समझने के लिए ,
मै निराश्रित होकर भी , अलग होकर भी
खुश हु । स्वतंत्र हु ।
अपनों के और बहुत करीबी अपनों के ,
सभी के बन्धनों से मुक्त हु ।
मानों जीती हारी बाज़ी है ,
ये मेरे हिस्से की आज़ादी है ।
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