मैं असमय ही कहीं,
नहीं जाता ।
तो कहीं रूक भी नहीं जाता ।
पर कभी - कभी उन ,
एकांत ठिकानों का ध्यान,
मुझे असमय ही रोक लेता है ।
लोग ऐसे ठिकानों पर अब ,
सैर सपाटो को जाया करते है ।
मुझे याद है ,
किंही महापुरुष ने मंदिर बनवाए ,
सोचा होगा की भगवान का संग ,
भगवान बना देगा ।
पर ऐसा हो न सका ,
और जो हुआ सर्वविदित है,
कि हरे - भरे पहाड़ो को देखकर ,
सून - सान गुफाओं मे जाकर ,
और अंत में भव्य देवालयों में प्रसाद पा कर ,
मैं असमय ही रूक जाता हूँ ।
पर अब ऐसा हो न सकेगा ,
क्योंकि ये जगहें तस्वीरों में कैद होने लायक है ।
लोग यहाँ सैर सपाटे के लिए आते है ।
असमय रुकने के लिए नहीं ।
ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
बुधवार, 3 सितंबर 2014
तात्कालिक सन्यासी
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:) .., realy a nyc 1
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