मेरा मुख कंकड़ सदृश्य है,
हर बार जो कुचला गया है ।
कभी अहं में,
कभी स्वार्थ में,
कभी सुख की तलाश में,
चेचक वाले चेहरे-सा,
दानेदार हो गया है ।
मेरे व्यवहार का प्रतिबिम्ब है जो,
चप्पलों और जूतों की मार से,
देखो कैसा चमक गया है ?
मेरा मुख कंकड़ सदृश है,
हर बार जो कुचला गया है ।
मेरे खुद के पैरों तले पड़कर,
गालों में पदचिन्ह उपट गया है,
मेरा मुख कंकड़ सदृश है,
हर बार जो कुचला गया है।
ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
बुधवार, 26 नवंबर 2014
क्षणिकाएँ
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें