बुक बोल देने मात्र से क्या होता है ।
थिएटर की सीट या पहले आओ पहले पाओ ।
जैसा ही सब कुछ थोड़े ही होता है ।
की बस एक बार ,
अपना अधिपत्य साबित करना होता है ।
कोई भी सामान जो कम कीमती हो ,
रख दो , अब से ये चीज़ हमारी ।
ऐसे में तो प्रतिस्पर्धा खूब हो जाएगी , तब ।
नजरो से ही चीज़े आरक्षित होगी ।
सच कह रहा हु ,
इसी तरह छह लडको ने ,
सारे मोहल्ले के माहौल को बाट लिया ।
दुर्भाग्यवास सबसे अच्छा खिलाडी ,
आखिर के लिए बच गया ।
सभी कप्तानो ने उसे सामूहिक रूप से ,
पहले नजरो से बाटा फिर हाथो से ,
अंत में अंत सदा सीधा साधा नहीं होता ।
खिलाडी दर खिलाडी खेल चलता रहा ।
खेल तो कब का शुरू हो चुका था ।
अंतहीन अप्रत्याशित बटवारा इसी प्रकार चलता रहा ।
मै तो पहले से कहता था ,
इनसे खेल न होगा और हुआ भी नहीं ।
ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
गुरुवार, 18 सितंबर 2014
हिस्सेदारी
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें