थी राख बची और रक्त बहा ।
करूँ लाख जतन ,
पर कह न सकूँ , मैं वो कथा ।
जिसमें था अतीत में तीत घुला ।
जिसमें थी राख बची और रक्त बहा ।
मैं तो भूल चुका था ,
जब देखा तुमको याद किया ।
देवी ! पर तुम न वो क्षण याद करो ।
मुझको अब तो माफ़ करों।
तब जली, मेरे कारण
अब कारण मैं होऊँ, मैं नहीं चाहता ।
इतने पर भी यही चाहता ।
समझो ! हो अंत कथा का ,
वैसा ही ,
जैसा कभी हुआ था ।
जिसमें थी राख बची और रक्त बहा ।
देवी विस्मय में , उत्तर की आस में पूछा ?
कहो न तुम दीर्घ कथा , बता दो बस इतना ।
हे आर्यपुत्र ! तुमने आज भी मुझको कैसे पहचाना ?
ये प्रेम ही है न , नहीं ये छल ,
क्यों स्वप्न तुम्हें ही आया ?
हे देवी ! यह अविरल कृपा युगल किशोर की
क्या होता है ?
जो बलिदान का फल पहले मैं चख पाया ।
आखिर याद करों ,
पहले तुमने ज्वाला को अपनाया।
फिर था मेरा शीश कटा ।
और तब ज्वाला ने था तुमको अपनाया।
उतने पर भी जो मुझमे प्राण बचे थे।
उनकी आड़ में ,
तुम्हारी काया को प्रकाशित होते देखा था।
आज भी जब वही स्वर्ण रूप आँखों में आया,
तो पहचान लिया ।
और कथा को याद किया ।
जिसमें थी राख बची और रक्त बहा ।
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