रविवार, 29 मार्च 2026

उपभोक्ता का चुनाव: क्या सच में स्वतंत्र है या पहले से तय?

उपभोक्ता का चुनाव: क्या सच में स्वतंत्र है या पहले से तय?
हम अक्सर यह मानते हैं कि बाज़ार में हमारे पास अनगिनत विकल्प हैं और हम पूरी तरह स्वतंत्र होकर निर्णय लेते हैं। लेकिन यदि हम थोड़ी गहराई से देखें, तो यह “स्वतंत्रता” उतनी व्यापक नहीं है जितनी दिखाई देती है। वास्तव में, हमारा उपभोक्ता व्यवहार काफी हद तक पूर्व-निर्धारित पैटर्न और सीमित विकल्पों के भीतर संचालित होता है।
🔤 अक्षरों में छिपा बाज़ार का पैटर्न
यदि हम वैश्विक कंपनियों को अंग्रेज़ी वर्णमाला के आधार पर देखें, तो एक रोचक प्रवृत्ति सामने आती है—कुछ विशेष सेक्टर कुछ विशेष अक्षरों के आसपास केंद्रित दिखाई देते हैं।
उदाहरण के लिए, ऑटोमोबाइल सेक्टर को देखें। जब भी हम इस क्षेत्र की कंपनियों के बारे में सोचते हैं, तो हमारे मन में अक्सर Maruti Suzuki, Mahindra & Mahindra, Mitsubishi Motors, Toyota, और Honda जैसे नाम तुरंत उभर आते हैं।
यह संयोग मात्र नहीं है—यह हमारे दिमाग में बने एक संज्ञानात्मक (cognitive) पैटर्न का परिणाम है।
इसी तरह, टेक्नोलॉजी सेक्टर में Apple, Google, और Intel जैसे नाम प्रमुख रूप से सामने आते हैं।

Automobile Sector Dominant Letters:
👉 M, T, H, V, B

💻 Tech Sector Dominant Letters:
👉 A, G, I, S

🏦 Finance Sector:
👉 B, J, V

🛒 FMCG:
👉 C, P, N, L

🧠 मस्तिष्क की सीमाएँ और “आसान याद” का जाल
मानव मस्तिष्क जटिलता से बचना चाहता है। वह हर बार नए विकल्प खोजने के बजाय उन्हीं नामों और पैटर्न्स की ओर झुकता है जो पहले से परिचित हैं। इसे मनोविज्ञान में “availability bias” कहा जाता है—अर्थात जो चीज़ आसानी से याद आ जाए, वही हमें सबसे सही या प्रमुख लगती है।
इसका परिणाम यह होता है कि:
हम बाज़ार के हजारों विकल्पों में से केवल कुछ ही ब्रांड्स को याद रखते हैं
हमारा निर्णय उन्हीं सीमित विकल्पों के बीच घूमता रहता है
और हमें लगता है कि हमने “स्वतंत्र” चुनाव किया है
⚠️ क्या यह नियम हमेशा सही है?
यह समझना महत्वपूर्ण है कि यह कोई कठोर नियम नहीं है, बल्कि एक प्रवृत्ति (tendency) है।
उदाहरण के लिए, ऑटोमोबाइल सेक्टर में Ford या Tesla जैसे नाम भी हैं, जो इस पैटर्न से बाहर आते हैं।
लेकिन फिर भी, अधिकांश मामलों में हमारा मस्तिष्क उन्हीं “प्रमुख अक्षरों” और “प्रसिद्ध ब्रांड्स” की ओर झुकता है।
🎯 निष्कर्ष: स्वतंत्रता का भ्रम
इस विश्लेषण से एक गहरी बात सामने आती है—
उपभोक्ता का चुनाव पूरी तरह स्वतंत्र नहीं, बल्कि सीमित और पूर्व-निर्धारित पैटर्न्स से प्रभावित होता है।
हम जिस स्वतंत्रता पर गर्व करते हैं, वह वास्तव में:
हमारी स्मृति
हमारे अनुभव
और बाज़ार में स्थापित ब्रांड्स
इन सबके सम्मिलित प्रभाव का परिणाम होती है।
👉 इसलिए अगली बार जब आप कोई उत्पाद खरीदें, तो एक पल रुककर सोचिए—
क्या यह निर्णय वास्तव में आपका है, या आपके मन में पहले से बसे कुछ सीमित विकल्पों का परिणाम?

गुरुवार, 26 मार्च 2026

मनुष्य की चेतना : एक अपरिवर्तनीय यात्रा

1. प्रवृत्ति का परिवर्तन और उसका “Irreversible” होना

जब मनुष्य की समझ (awareness) और चेतना (consciousness) एक स्तर से ऊपर उठ जाती है, तो वह पुरानी अज्ञानता में वापस नहीं जा सकता।
• जैसे अंधेरे में रहने वाला व्यक्ति जब पहली बार प्रकाश देखता है, तो वह फिर अंधेरे को “सत्य” नहीं मान सकता
• उसी तरह, जब किसी को यह समझ आ जाती है कि सांसारिक सुख क्षणिक (transient) हैं, तो वह उनके पीछे पहले जैसा मोह नहीं रख पाता

यह विचार भगवद गीता के उस सिद्धांत से मेल खाता है जहाँ “ज्ञान” को अज्ञान से एक बार ऊपर उठने वाला बताया गया है।

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2. चेतना के स्तर (Levels of Consciousness)

मनुष्य अलग-अलग चेतना स्तरों पर कार्य करता है:
• निम्न चेतना (Lower consciousness) → वासना, क्रोध, अहंकार, तात्कालिक सुख
• उच्च चेतना (Higher consciousness) → शांति, सत्य, ईमानदारी (honesty), करुणा

और जब व्यक्ति उच्च स्तर पर पहुँचता है, तो उसे स्पष्ट दिखने लगता है कि:

“वास्तविक सुख बाहर नहीं, भीतर की शांति में है”

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3. पश्चाताप का कारण

“निम्न चेतना में किए गए कर्म, उच्च चेतना में पहुँचकर पीड़ा देते हैं।”

क्यों?
• क्योंकि अब हमारी समझ बढ़ चुकी होती है
• हम अपने ही पुराने कर्मों को एक नए नैतिक पैमाने (moral standard) से देखने लगते हैं

इसलिए पश्चाताप (regret) उत्पन्न होता है — जो वास्तव में एक संकेत है कि व्यक्ति का विकास हो चुका है।

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4. शिक्षा का महत्व

शिक्षा (education) यहाँ केवल किताबों का ज्ञान नहीं है, बल्कि:
• आत्मबोध (self-awareness)
• सही-गलत की समझ
• दीर्घकालिक सोच

यही शिक्षा व्यक्ति को धीरे-धीरे ऊपर उठाती है।

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5. कर्म और दिशा

• चेतना धीरे-धीरे ऊपर जाती है (even in decimals, जैसे आपने कहा)
• इसलिए हमें हमेशा सद्कर्म (good actions) करने चाहिए

ताकि:
• भविष्य में पश्चाताप न हो
• और कर्मों के फल से दुःख न मिले

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एक संक्षिप्त सार:

मनुष्य की चेतना एक एकतरफा यात्रा (one-way journey) है —
अज्ञान से ज्ञान की ओर, अशांति से शांति की ओर।

इसलिए बुद्धिमानी इसी में है कि:

“हम हर स्तर पर ऐसा कर्म करें, जिसे हमारा भविष्य का, अधिक जागरूक स्वरूप स्वीकार कर सके।”

बुधवार, 25 फ़रवरी 2026

बिना मन के भी मसल दिए जाओगे

मनुष्य ने शायद ही कभी
चींटियों को दाना उठाते देखकर
यह सोचा होगा
कि असंख्य चींटियों के खाने से
मनुष्य पर कोई खाद्य संकट आ सकता है।

उसी तरह ईश्वर ने भी
पृथ्वी इतनी विशाल बनाई है
कि असंख्य मनुष्य
और असंख्य चींटियाँ
एक साथ इसमें रह सकें।

ईश्वर की दृष्टि में
असंख्य मनुष्य और असंख्य चींटियाँ
एक समान हैं —
जैसे मनुष्य के लिए चींटी,
वैसे ही ईश्वर के लिए मनुष्य।

रविवार, 4 जनवरी 2026

तो क्या ईश्वर को सिमेट्री पसंद नहीं?

मनुष्य अक्सर यह मान लेता है कि सुंदरता का अर्थ सिमेट्री है—सब कुछ बराबर, संतुलित और एक-सा। लेकिन जब वह सृष्टि की ओर देखता है, तो यह धारणा बार‑बार टूटती है। मानो ईश्वर ने जानबूझकर मनुष्य के सौंदर्यबोध को चुनौती देने के लिए ही यह संसार रचा हो।

क्या ईश्वर ने कुछ भी सुंदर नहीं बनाया? अगर सुंदरता का अर्थ सिमेट्री है, तो शायद नहीं। नदियाँ सीधी नहीं बहतीं, वे टेढ़ी‑मेढ़ी रास्तों से गुजरती हैं। पहाड़ उबड़‑खाबड़ हैं, कहीं मैदान है तो कहीं पठार। पत्थर एक आकार के नहीं होते, एक ही पेड़ के पत्ते भी एक जैसे नहीं होते। हर जीव अलग है, हर देह में भिन्नता है।

मनुष्य का ही शरीर देख लें—बायाँ हिस्सा दाएँ जैसा नहीं है, केवल उसका आभास है। आँखें बराबर नहीं, हाथों की ताकत समान नहीं, दिल शरीर के बीच में नहीं है। फिर भी शरीर काम करता है, चलता है, जीता है।

तो फिर प्रश्न उठता है—सुंदरता क्या है? सुंदरता वह है जो काम करे। जो जीवित रखे। जो उपयोगी हो।

सूरज गरम है, चंद्रमा ठंडा। अगर दोनों एक जैसे होते, तो दिन‑रात का अर्थ ही नहीं बचता। कुछ ग्रह धीरे चलते हैं, कुछ तेज; कुछ में वलय हैं, कुछ में नहीं। केवल एक ही ग्रह—पृथ्वी—पर जीवन है। क्या यह असंतुलन है, या सटीक उपयोगिता?

ईश्वर ने सिमेट्री क्यों नहीं चुनी? क्योंकि पूर्ण सिमेट्री जड़ होती है। अगर पृथ्वी पूरी तरह गोल होती, तो मौसम नहीं बनते। अगर तापमान हर जगह समान होता, तो हवा नहीं चलती। अगर सब कुछ बराबर होता, तो परिवर्तन असंभव हो जाता।

ईश्वर ने सिमेट्री को नकारा नहीं, बल्कि उसे सीमित किया। जहाँ ज़रूरी था वहाँ संतुलन दिया, और जहाँ जीवन फूट सकता था वहाँ असमानता छोड़ दी।

तो मनुष्य सिमेट्री से इतना प्रेम क्यों करता है? क्योंकि सिमेट्री उसे नियंत्रण का भ्रम देती है। चौकोर घर, बराबर कमरे, सटीक टाइलें—सब कुछ अनुमान में रहता है। कारें चौकोर, इमारतें चौकोर, शहर चौकोर। अगर कहीं रेखा टेढ़ी हो जाए, तो उसे बदसूरत कह दिया जाता है।

लेकिन क्या जो दिखने में सुंदर है, वही उपयोगी भी होता है?

उपयोगिता बनाम सिमेट्री प्रकृति उपयोगिता को चुनती है, सौंदर्य को नहीं। नदी का काम पानी पहुँचाना है, सीधी दिखना नहीं। पेड़ का काम फल देना है, पत्तों का एक‑सा होना नहीं। आँखें बराबर हों या न हों, दिखना ज़रूरी है।

मनुष्य अक्सर किसी वस्तु, व्यक्ति या विचार को केवल उसके रूप से आँक लेता है। लेकिन जीवन रूप से नहीं, उपयोग से चलता है।

धर्मों का विरोधाभास भी इसी का उदाहरण है एक धर्म कुछ कहता है, दूसरा उसका उलटा। अगर सत्य पूरी तरह सिमेट्रिक होता, तो केवल एक ही धर्म होता। लेकिन सत्य बहुआयामी है, और मनुष्य सीमित। हर धर्म सत्य की उपयोगिता का एक पक्ष पकड़ता है, न कि उसकी संपूर्ण सिमेट्री।

तो असली प्रश्न क्या है? क्या हमें सुंदर दिखना है, या उपयोगी होना है? क्या बराबर होना ज़रूरी है, या सार्थक होना?

ईश्वर ने पृथ्वी को भी पूरी तरह गोल नहीं बनाया। थोड़ा सा झुकाव रखा—और उसी से ऋतुएँ बनीं, जीवन पनपा।

अंततः सृष्टि हमें यह सिखाती है कि सिमेट्री से अधिक महत्वपूर्ण उपयोगिता है। कोई कैसा दिखता है, इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह क्या करता है।

मनुष्य सिमेट्री को सुंदर कहता है क्योंकि वह उसे समझ सकता है। ईश्वर असिमेट्री रचता है क्योंकि उसी में जीवन संभव है।

बुधवार, 17 सितंबर 2025

सब खत्म

जेन मन थोड़ी दुनिया देखे हे,
वो पैसा, जमीन अउ सोना जानथे।
जेन मन ज्यादा देखे हे,
वो कमाथें, बचाथें अउ उड़ा देथें।
जेन मन इजराइल, गाजा, यूक्रेन देखे हे,
वो बस जीये बर चाहथें।
कमाय ले जादा खर्च करना चाहथें।

मार के बाद पैसा,
उधारी चुकाना नई हे।
जमीन काबर खरीदी?
घर काबर बनाय?

सब तो मिसाइल के निशाना मं हे।
जब हम खुद नई बचबो,
त पैसा का बचाबो?
पैसा हमन ला नई बचाही।

सोमवार, 8 सितंबर 2025

व्हाइट इज डर्टी

साफ–सुथरे शहर,
शहर के साफ–सुथरे लोग,
चूने से भी ज्यादा सफेद,
पुट्टी लगाए चेहरे— हू-ब-हू एक जैसे।

क्योंकि शहर में रहना मतलब—
वेल एजुकेटेड, वेल मैनर्ड और सबसे ज़रूरी—सफेद।
सफेद यानी साफ।

मगर पता नहीं क्यों,
एयर-कंडीशनर की ठंडी में
ये वेल एजुकेटेड लोग
जम गए हैं,
अपने लिए भी नहीं बोल पा रहे।
और वेल मैनर्ड लोग
बर्गर के नीचे कुचल गए हैं,
आस–पास की गंदगी तक साफ नहीं कर पा रहे।

सफेद से रिसते हैं—
बदबूदार,
टॉयलेट पेपर यूजर,
अर्बन व्हाइट कबूतर।

शनिवार, 6 सितंबर 2025

आज अंतिम छुट्टी पर

एक दिन दफ्तर जाते हुए
मैंने एक मुर्दे को देखा।
मुर्दा लेटा हुआ था,
लोग उसे लिए जा रहे थे।

दफ्तर जाने का समय था—
सोचने लगा, अगर यह ज़िंदा होता
तो शायद अभी मेरे साथ
दफ्तर ही जा रहा होता।

मगर आज यह दफ्तर नहीं जा रहा,
और न ही वे लोग,
जो इसके पीछे चल रहे हैं।

दफ्तर जाने के वक्त,
सड़क पर जो भी दिखता है—
सब दफ्तर जाते प्रतीत होते हैं...
यहाँ तक कि मुर्दा भी।
कभी-कभी लगता है
ज़िन्दगी और मौत के बीच
बस इतना ही फर्क है—
जीवित आदमी दफ्तर जाता है,
मुर्दा सीधा श्मशान।

हम दिन भर दफ्तर जाकर
थोड़ा-थोड़ा मरते हैं,
और एक दिन ऐसा आता है
जब हमें भी
दफ्तर नहीं जाना पड़ता।

तब लोग कहते हैं—
“आज वह छुट्टी पर है,
अंतिम छुट्टी।”

कितना अजीब है,
हम जीते-जी छुट्टियों के लिए तरसते हैं,
और मरने के बाद
लोग हमें छुट्टी पर बताते हैं।

शायद ज़िन्दगी भी
एक बड़ा दफ्तर है,
जहाँ हम सब नियुक्त हैं,
कोई स्थायी नहीं,
सब संविदा पर।

हर किसी का कॉन्ट्रैक्ट
किसी अदृश्य हस्ताक्षर से बँधा है।
कोई नहीं जानता
किसका कब समाप्त हो जाएगा।

और फिर एक दिन
“सेवा निवृत्ति” का आदेश आता है।
सिर्फ़ एक चुप्पी,
सिर्फ़ एक यात्रा—
श्मशान की ओर।

गुरुवार, 4 सितंबर 2025

छोटी वाली असंख्य खिड़कियाँ

सुबह के दस बजे ऑफिस के लिए राकेश जैसे-तैसे घर से निकला। उसके सामने दिनचर्या का वही दोहराव था, वही भीड़, वही घड़ी की सुई जो मानो आदेश देती हो—“दौड़ो, वरना छूट जाओगे।”

मेट्रो स्टेशन पर उतरते ही एक भारी-सी सांस निकली—लोगों की भीड़, शरीरों की धक्का-मुक्की, और चेहरों पर बसी उदासीनता। राकेश को लगा, यहाँ हर कोई खिड़की के पीछे खड़ा है।हर किसी की खिड़की की चाहत को पूरा करने के लिए ही शायद खिड़की खिंचते खिंचते इतनी बड़ी हो गई हैं । एक बड़ी खिड़की जिसमें सैकड़ो छोटी खिड़की समा गई हैं । बता पाना मुश्किल है कि सब बड़ी खिड़की को देख रहे है या उसमें से अपनी वाली छोटी खिड़की को । 

ट्रेन आई। भीड़ के साथ राकेश उसमें समा गया। सीट का सवाल ही नहीं था। बड़ी खिड़की से बाहर झांकते ही अनगिनत छोटी-छोटी खिड़कियाँ दिखीं। वह सोचने लगा—क्या हर खिड़की के पीछे कोई अपनी अधूरी इच्छा, अपनी असफल कामना, अपनी थकी हुई देह और मन को छुपाए बैठा है?

🎵 “जिंदगी कैसी है पहेली हाय, कभी ये हँसाए, कभी ये रुलाए…”

ट्रेन पुल पर धीमी हुई। यमुना का बहाव तीखा था। पुल ने जैसे ट्रेन से कहा—“बहन, धीरे चलना।” राकेश ने नदी की ओर देखा। नदी भी खिड़की-सी लगी—एक खिड़की, जिससे प्रकृति शहर को देख रही थी। नदी का जल था, पर ठहराव नहीं। शहर का जीवन था, पर शांति नहीं।

उसके भीतर महंगाई और ज़िम्मेदारियों की कड़वाहट गूंजती रही। तनख्वाह कितनी भी हो, ज़रूरतें बड़ी रहती हैं। घर के रिश्तों में भी अब वह अपनापन नहीं रहा—यौन इच्छाएँ भी कभी-कभी खिड़की की तरह ही बंद हो जाती हैं, भीतर से धुंधली और अनसुनी।

🎵 “तन्हाई, तन्हाई, दिल के रास्ते में कैसी ठंडी साया तन्हाई…”

छोटी-छोटी खिड़कियों के पीछे दौड़ती जिंदगियाँ राकेश को किसी थके हुए घोड़े-सी लगती हैं, जिन्हें यह भी नहीं पता कि मंज़िल कहाँ है। गाँव की धीमी लय को छोड़कर शहर को चुना था, यह सोचकर कि सब सही हो जाएगा। पर यह शहर तो केवल नई निराशाओं का बाज़ार निकला।

राकेश ने फिर नदी को देखा। सोचा—शायद जिस दिन नदी अपनी धार धीमी करेगी, उसी दिन यह शहर भी धीरे चलने लगेगा। और शायद उसी दिन वह इस बड़ी खिड़की से बाहर उतरकर मुक्त हो सकेगा।

मंगलवार, 19 अगस्त 2025

नशे की हालत में

सरकार और नशा

सरकारें न नौकरी देती हैं,
न नशा करने देती हैं।
तो फिर चाहती क्या हैं?

न जीने देती हैं,
न मरने देती हैं,
न भूलने देती हैं दुख।

अगर पूछें खुद से—
कौन करता है नशा? क्यों करता है नशा?
तो जवाब मिलेगा—
वही जिनके पास नौकरी है,
और वही जिनके पास नहीं है।

सरकार कहती है—
नौकरी दो या न दो,
नशा तो करेगा ही इंसान।
तो क्यों दें नौकरी?
क्यों दें नशा?

कहीं नशे में
ट्रैफिक इंस्पेक्टर न बन जाए,
कहीं मास्टर न बन जाए,
कहीं जागरूक नागरिक न बन जाए।

सरकार जानती है,
एक नशेड़ी भी
कुछ बनने का सपना देखता है।

गुरुवार, 8 मई 2025

बँधनों की दुनिया


था उसका सारा यह जहाँ,
खुला गगन, धरती महान।
फिर भी उसने घर बसाया,
चार दीवारों में मन को बाँधा।

पेड़ थे, छाँव थी, ज़मीन खाली,
पर उसने लगाई क़ीमत गाली।
जो था सबका, उसे अपना बनाया,
काग़ज़ों में नाम लिखवाया।

नदी थी, झरने थे गाते,
प्रकृति के संग दिन थे बीतते।
पर उसने नल में पानी बाँधा,
स्नानघर में जीवन को साधा।

आजादी थी, उड़ सकता था,
सपनों में दिन बिता सकता था।
पर उसने नौकरी को चुना,
समय को तनख्वाह में बाँटा।

था जीवन जीने को अपना,
पर बंध गया रिश्तों का सपना।
विवाह किया, साथ निभाया,
पर खुद को कहीं खो बैठा।

दिन में सोने की आज़ादी थी,
रात में जागने की तैयारी थी।
पर बिजली बनाई रात को दिन,
और खो दिया नींद का सुकून छिन।

आग जलाई रोटी पकाने को,
बस गया एक जगह जीने को।
पर खेती, घर और परिवार के संग,
खोई स्वतंत्रता, खो गया रंग।

सुविधा के पीछे भागते-भागते,
शांति छूटी, जंग लगते-लगते।
अब भी खुला है प्रकृति का द्वार,
पर क्या लौट पाना है अब सरल और स्वीकार?

जब भी जीवन लगे बंधन में,
जब भी घुटन हो इन बर्तनों में,
एक सवाल उठता है मन में—
क्या सच में खुले हैं रास्ते वन में?

बुधवार, 23 अप्रैल 2025

कारण और परिणाम


हरी घास पर पसरा सन्नाटा,
बहती नदी का पारदर्शी गान।
शांति और आनंद का आभास —
पर तभी जब लौटने को
एक घर हो।

हम घूमते हैं,
छुट्टियाँ मनाते हैं,
क्योंकि नौकरी है,
जिससे हम भागते हैं,
पर वही तो कारण है —
छुट्टी तो बस परिणाम।

हमें पर्वत अच्छे लगते हैं,
बर्फ की चादर पर चलना — रोमांच।
पर रहते कहाँ हैं हम?
मैदानी जीवन की सरलता में।
पर्वत दिखते हैं सुन्दर,
पर जीना वहाँ कठोर है।
मैदान जीने के लिए हैं,
पर्वत—सपनों के लिए।

हम जन्मे नहीं बस
खाली बैठने के लिए,
कुछ तो कारण है,
कुछ तो उद्देश्य।

क्या वो उद्देश्य
किसी क्षेत्र में उत्कृष्टता है?
नाम कमाना? धन अर्जित करना?
या फिर मानवता का हित?
प्रकृति का रक्षण?
पृथ्वी की पुकार सुनना?

अपने लिए जीना — एक विकल्प।
दूसरों के लिए जीना — दूसरा।
दोनों में असर है,
अगर असरदार हुए,
तो ये दुनिया याद रखेगी।

पर लोग सोचते हैं उल्टा,
कहते हैं — "प्रसिद्ध बनो",
मैं कहता हूँ —
"श्रेष्ठ बनो, प्रसिद्धि स्वयं आएगी।"
प्रसिद्धि कारण नहीं,
वो तो एक परिणाम है।

बुधवार, 9 अप्रैल 2025


तरु-शाखा पर बैठ विहगिनी बुनती थी निज स्वप्न-निकेतन,
कण-कण में बसती आशा, श्रम से सजा वह मृदु आलयन।
पर्ण-पुष्प से गूँथ बनाई, जीवन की वह मधुर छवि,
मानव-सा वह चातक भी, निज कुटुम्ब हेतु अनुरक्त सदा रवि।

नभ में विहारिणी, फिर भी बंधी अपने आलय से,
स्वच्छंद थी वह, पर थी सुधि निज नीड़ के प्रालय से।
सोचा — "यह कुटी ही मेरी शांति-शरण बन जायेगी,
जहाँ सहेज रख सकूँ कांति, जहाँ प्रीति मुस्कायेगी।"

परन्तु हाय! विधि का विधान कैसा,
निज श्रम पर व्याधि का आघात कैसा।
दुष्ट ने किया विध्वंस घोंसले का,
अंडों पर पड़ा अनर्थ का झोंका।

विहगिनी थी विकल, अश्रु-प्रवाह में लीन,
सारा सृजन हो गया, पलक झपकते ही क्षीण।
गूँज उठी पीड़ा उसकी इस निरभ्र अम्बर में,
जैसे चेतावनी हो सबको इस अस्थिर संसार में।

नर की कन्या भी कुछ वैसी ही गति पाती,
जब रीति-रिवाज, कुल-धर्म को तज जाती।
जो दिखता है सरल, वह सदा सहज नहीं होता,
जो दिखता है नूतन, उसमें स्थायित्व नहीं होता।

स्वातंत्र्य उत्तम है, पर संयम उसका मूल है,
परंपरा से जुड़ा जीवन ही निष्कलुष फूल है।
जहाँ धर्म, मर्यादा और नीति का हो संग,
वहीं सुरक्षित रहता है नारी का मंगल-अभंग।

अतएव हे सुबुद्ध मानव! यह सीख सदा धारण करना,
सुधि रखो – घोंसला वही सजाना, जो न सिर्फ सुंदर, अपितु हो अडिग, अचल, स्थिर —
धर्म-संरक्षित, प्रेम-संवलित, कुल-परंपरा में गुँथा।

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

संगीत, रेडियो और शफल फंक्शन

संगीत, रेडियो और शफल फंक्शन। रैनडम या बिना सोचे समझे जैसा कि इसे सरल शब्दों में समझ सकते हैं। खाली समय में या काम की व्यस्तता के बीच पसंदीदा गानों को सुनना आम है । संगीत लोगों के व्यवहार को तेजी से प्रभावित करता है । इतनी तेजी से की आप उम्मीद भी नहीं कर सकते हैं। 

सिर्फ सुगम संगीत लोगों को उनकी जेब से उनकी गाढ़ी कमाई निकालने के लिए मजबूर कर देता है। यह एक व्यवस्थित खोज का विषय रहा है कि मल्टी ब्रांड रिटेल स्टोर्स में गाने बजाकर कस्टमर्स के खरीददारी के अनुभव को कैसे बेहतर किया जा सकता है? 

एक धीमा-धीमा बजता हुआ गाना आपको सूकुन देता है और तनाव दूर करता है। जब आप हल्का और अच्छा महसूस करने लगते हैं तो आपको समान खरीदने कि इच्छा होती है।

लेकिन विषय ये नहीं है। यह तो संगीत के हमारे मन पर पड़ने वाले प्रभाव को दिखाती है। लेकिन विषय है जीवन में संगीत और खुद बनाई हुयी प्ले लिस्ट और रेडियो कि रैनडम प्ले लिस्ट में से किस प्ले लिस्ट को सुनना ज्यादा पसंद करते हैं। और यह जरूरत है इसी कारण संगीत को सुनने में रैनडम गानों का बजना हो सके इसके लिए म्यूजिक प्लेयर में शफल फंक्शन दिया जाता हैं। 

इससे जुड़ा एक मसला है। स्पाटीफ़ाई (spotify) जो कि एक म्यूजिक स्ट्रीमिंग एप्प है। इसका उपयोग करने वाले लोगों कि शिकायत थी कि स्पाटीफ़ाई गानों को शफल करने में बयास्ड है। यह ठीक से सांग्स को शफल नही करता हैं। यह बात इतनी बढ़ गयी कि स्पाटीफ़ाई के सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स को एप्प के शफल फंक्शन के एल्गॉरिथ्म को बदलना पड़ गया। 

इससे तो यह पता चला कि जीवन में संगीत जरूरी है और संगीत में रैनडम होना जरूरी है । ऐसा नहीं है कि लोगों कि अपनी प्ले लिस्ट नहीं होती है। मगर किसी दूसरे कि प्ले लिस्ट सुनना और रेडियो से गाने सुनना हमेशा खुद कि बनाई प्ले लिस्ट से बेहतर है। यह एक तरह से हमें खुद से अलग कुछ बेहतर कि तलाश कि उम्मीद को पूरा करती है। 

रेडियो सुनते हुये जो अनुभव करते हैं। वह मोबाइल पर डाउनलोड किए हुये सांग्स को सुनने से काफी बेहतर है । लोगों ने शेयर किया है कि जब रेडियो में कभी भी कोई सांग्स बजने लगता है जिससे उनकी पुरानी यादें ताजा हो जाती है । उन्हें अपने दिमाग पे अपने जीवन के यादगार लम्हों को याद करने के लिए ज़ोर नहीं देना पड़ता है जैसे रेडियो पर वह सांग बिना सोचे समझे या रैंडम प्ले हुआ वैसे ही दिमाग में आए जीवन के यादगार लम्हों कि याद एक दम रैंडम है। रेडियो में बजने वाले गाने बज कर चले जाते है उनको लेकर हमारे दिमाग में यह सोच उसे कीमती बनती है कि जो मिल रहा है उसे एंजॉय करे क्योंकि हो सकता है ये गाना फिर न मिले या आसानी से न मिले या ये तो मेरे पास नहीं होगा इसके बाद । 

यह सोच जीवन के लिए एक सीख है कि हमें रेंडम या बयास्ड फ्री चीजें पसंद है। और खुद कि बजाय किसी टॉपिक पर एक्सपर्ट कि राय मानना बेहतर होता है। यह सोच वही है जो आपको खुद कि प्ले लिस्ट के प्रति बोरियत पैदा कर देती हैं । जीवन में चयन कि स्वतन्त्रता अपेक्षित है लेकिन यह चयन को लेकर ऊब पैदा कर देती है। यह हमेशा स्वयं के प्रति लगाव को कम करके दूसरे के पसंद को पसंद करने की ओर धकेलता है।

बुधवार, 9 अक्टूबर 2019


छोटे से यह सवाल पूछने लगते हैं कि बड़े होकर क्या बनना चाहते हो ? और यह सवाल इसलिए नहीं पूछा जाता है कि बच्चे ने बहुत सोच विचार के किसी निष्कर्ष पर पहुँच गया है बल्कि ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि उसके अवचेतन मन में एक उद्देश्य फीड किया जा सके । यह सिखाने का एक तरीका है ।

इस पद्धति को गलत नहीं कहा जा सकता है । जीवन में लक्ष्य होने से आगे बढ्ने में आसानी रहती है । लेकिन बच्चे को जीवन में स्वयं फैसले लेने कि स्वतन्त्रता देनी चाहिए ?

यदि यह स्वतन्त्रता हो कि जीवन में चुनने कि तुम क्या बनना चाहते हो तो जवाब तक कैसे पहुचेंगे ? इसका एक आसान तरीका है ।

एक उक्ति है “आपको यह स्वीकारना पड़ेगा कि आप सब कुछ ठीक नहीं कर सकते है “

सरकारी तंत्र में बहुत कार्य करने के बाद भी जो टीस मन में उठती है कि अभी भी बहुत से लोग ऐसे है जो वंचित है जिनके लिए मैं अपेक्षित कार्य नहीं कर पाया ।

अब इससे यह बात सामने आती है कि आप क्या बनना चाहते है इसका निर्णय इस बात से होता है कि समाज में क्या बदलाव देखना चाहते है ?

बहुत से लोग जिनसे यह पूछा गया कि वे भविष्य में क्या बनना चाहते है ? और वे लोग प्रबुद्ध है तो वे कहते है कि उनके जीवन में अमुक अमुक घटना घटी इसलिए उनके विचार में बदलाव आया और इसलिए वे अमुक पद पर जाना चाहते है ।

इस बात को सपोर्ट करती कई कहानियाँ है जिनसे कई नए पक्ष भी सामने आते हैं ।

एक लड़की बड़े होकर पुलिस अधिकारी बनना चाहती है क्योंकि जब उसके साथ एक छेड़खानी कि घटना हुयी थी तो पुलिस ने सही तरह से कार्य नहीं किया । वह चाहती है कि वह पुलिस अधिकारी बनकर इस व्यवस्था को ठीक करे ।

इसके अतिरिक्त एक व्यक्ति डॉक्टर इसलिए बनना चाहता है क्योंकि उसके बड़े भाई कि मृत्यु इसलिए हो गयी क्योंकि उसके बड़े भाई को सही इलाज सही समय पर नहीं मिला ।

व्यक्ति को जीवन में जो वह बदलाव समाज में देखना चाहता है यदि उसके लिए ही प्रयास करता है तो एक संतुष्टि का अनुभव करता है । यह काम हॉबी के तौर पर भी लोग करते है क्योंकि हमेशा यह संभव नहीं होता जो नौकरी हम करते है और जैसा समाज हम देखना चाहते है वे एक हो ।

शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

नियति कितनी बलवान है ?

तुम हाँ ! तुम्ही से कह रहा हूँ ! इधर उधर क्या देखते हो ? तुम जो कभी ये सोच कर कि सफल हो , खुश हो गए । वही तुम कभी ये सोच कर कि असफल हो, दुखी हो गए । तुम्हारे जीवन में तुम्हारी यह स्थिति दयनीय से अधिक कुछ नहीं है । कभी भी बिना जड़ के पेड़ देखा है । बिना जड़ का पेड़ होगा भी तो पल भर में सूख जाएगा । बिना नींव कि इमारत गिर जाएगी । आधारहींन बातों को कोई नहीं सुनता वैसे ही जीवन में उन बातों को क्या महत्व देना जिनके होने न होने पर किसी का वश नहीं था । तुमने जन्म किस जाति में लिया तुम्हारे वश में नहीं था , और न ही तुम्हें माता पिता के चयन का अधिकार दिया गया । शिशु के रूप में जब तुम्हारा जन्म हुआ तो तुम इतने अबोध थे कि अपनी नियति से जुड़े फैसले नहीं कर सकते थे । यदि जन्म के बाद भोजन न कराया जाता तुम्हें तो तुम मर जाते । जन्म लेने के वर्षों तक तुम्हें सही गलत और अपना हित-अहित नहीं पता था । एक सेकेंड भर को रुककर अपनी स्थिति को देखो और सोचो आज जिस संसार में रह रहे हो उसमें जिन बातों और तर्कों को लेकर जी रहे हो उनमे से कितनों का निर्धारण योग्यता के आधार पर होता है । जाति, धर्म , रंग , धन , रूप , नागरिकता किसी को भी चुनने के लिए तुम्हें स्वतन्त्रता नहीं थी । तुम जन्म से परतंत्र प्राणी थे । यदि आज स्वतन्त्रता के लिए सोचते हो तो यह वही स्थिति है जिसमें बिना जड़ के पेड़ सूख जाता है । तुम किससे स्वतंत्र होना चाहते हो ? एक व्यवस्था है जिसमें से सभी को गुजरना पड़ा । 

जब कभी भी ये लगे कि जीवन में तुम स्वतंत्र हो । तुम जीवन के फैसले ले सकते हो तो उन बातों को याद करना कि  किस बारीक व अति भाग्यवाद के बीच से तुम्हारा निर्माण हुआ है । जिस स्थिति में तुम्हें किस किनारे लगा दिया जाता उसका कोई हिसाब लेने वाला नहीं था । एक नवजात शिशु कि पहचान नगण्य होती है । ऐसी भयानक स्थिति से निकलकर तुम्हें यह जीवन मिला है जिसमें यदि आँख , नाक , कान , हाथ , पैर  सलामत है तो मान लो बड़ी मेहरबानी कर दी पालने वाले ने जो वह इतना समय निकाल पाया और सोचा कि तुम सही सलामत रहों । यह आश्चर्य नहीं है कि दुनिया में ऐसे लोग दिखते है जिनके हाथ न हो या एक पैर से विकलांग हो । भगवान का दिया हुआ यह शरीर तुम्हारा घर है । जब कभी भी तुम इन बातों को पढ़कर इनकी तह तक पहुचना तुम पयोगे जीवन में जितना कुछ भी तुम्हें मिला है वो न भी मिल पाता तो कोई अदालत नहीं थी जंहा गुहार लगाकर अपने साथ हुये अन्याय का हिसाब मांग पाते । बल्कि तुम्हारी स्थिति ही न्याय के बाद कि स्थिति है । दुनिया तुम्हारे साथ हुये को तुम्हारे पुराने जीवन के कर्मों के मत्थे मढ़ देती और तुम सोचते रह जाते कौन सा पिछला जन्म ? 

असल में यह व्यवस्था है जिसमें अव्यवस्था भी है जैसे कि हर व्यवस्था में होती है । शुभ के साथ अशुभ भी होते है। बिना सोचे विचारे लोग हाहाकार करते रहते है । सीधी सी बात है जब , जिस दिन जिस वक्त यह समझ जाओ कि जिस स्थिति में उस स्थिति से भी बदतर स्थिति हो सकती थी तो उसी समय से अपनी गति बदल देना । निराशा का कोई स्थान नहीं है । निराशा किसलिए ? तुम्हारे हाथ में जब था ही नहीं कुछ तो तुम निराश होकर भी कुछ नहीं कर सकते । ऐसा भी नहीं है कि आगे तुम्हारी निराशा तुम्हें इस बात का भरोसा देगी कि तुम अपनी नियति चुन पाओगे। ब्रह्मांड में लटकती हुयी पृथ्वी को ध्यान करके इस बात को समझों । जो व्यक्ति इन बातों को समझ कर अपनी गति में सुधार कर लेता है उसी ने वास्तव में जीवन को जी पाया । ज़्यादातर जीव इस जगत में नियति के सहारे उड़ते , गिरते , बढ़ते , घटते है । कोई जन्म से अमीर या गरीब हो जाता है ।  किसी की जाति उसे पंडित घोषित कर देती है । कोई जाति से ही ग्वाला है और कोई जाति से ही सेवक है । नियति ने उन्हें अपने कर्म तक चुनने का अधिकार नहीं दिया । यह कोई आश्चर्य करने वाली बात नही है । समाज ऐसा भी होता है । 

दुनिया में कोई भी नहीं जो यह बात समझ लेने वाले व्यक्ति को जरा भी विचलित कर सके कि नियति कितनी बलवान है ?

बुधवार, 10 जुलाई 2019

लग सकता है !
ये तो फूल सरीखे कोमल है ।
गंधइले , जंगली लोमड़ है ।
बेरंग असमय खिला करते ,
आंखों में खुजली के कारण ये ।
नजदीक अगर गए आप,
छींक छींक के लाल नाक ।
तीखे नुकीली जहरीले पराग ,
बिखरे बिखरे मैले दाग,
कभी नहीं देखा हिलते ,
खिलते जितना खलते उतना ।

सड़े गले दलदल में भी ,
पड़े सड़े कचड़े में भी ,
आसानी से न मिल पाते ,
खिलते हिलते मुरझाते ।
सोते भौरे , कीड़े कीट ,
उड़ते पंक्षी , चमगादड़ ढींठ ।

सोमवार, 20 मई 2019

चूंकि आपका एक वोट अकेले मायने नहीं रखता !

हाल ही में देश के आम चुनाव खत्म हुए है । लगभग आधे से ज्यादा देश की जनता इसमें शामिल हुई । यह दुनिया के किसी भी दूसरे लोकतांत्रिक देश की तुलना में बेहद बड़ा चुनाव था । हालांकि चुनाव आयोग आम चुनाव को लोकतंत्र के त्योहार के रूप में प्रोजेक्ट करता है । यह त्योहार हर पांच साल बाद गर्मी के मौसम में आता है । चूंकि भारत उत्तरी गोलार्द्ध में स्थित है इसलिए अप्रैल - मई का मौसम भीषण गर्मी का होता हैं । इतनी भीषण गर्मी के बीच सैकड़ों की संख्या में विशाल रैलियां, हेलीकाप्टर का शोर, लगातार थका देने वाली यात्रा पूरे अभ्यास को कई गुना कठिन बना देती है । चुनाव के दौरान होने वाली हिंसा, अव्यवस्था और चुनाव संबंधी अन्य अपराध प्रमुख चुनौतियाँ है । लेकिन जब यह सब इतना ही कठिन और दुस्साध्य है तो चुनाव होते ही क्यों है ?
चुनाव इसलिए होते है क्योंकि चुनाव देश की सत्ता की चाभी है । चुनाव यह सुनिश्चित करते हैं कि अगले पांच वर्ष किस प्रकार की नीतियां विभिन्न क्षेत्रों में लागू होंगी और जनता के लिए कौन से मुद्दे जरूरी है ।

देश में चुनाव तीन स्तर पर होते हैं । पहला राष्ट्रीय, दूसरा राज्य और तीसरा स्थानीय निकाय । मुख्यतः सत्ता की शक्ति केंद्र और राज्य के बीच बटती है ।

क्या हर चुनाव एक समान जरूरी होता है ? राष्ट्रीय चुनाव ज्यादा महत्व के होते हैं । राष्ट्रीय चुनाव जिन्हें आम चुनाव या लोकसभा चुनाव कहा जाता है राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों को प्रभावित करते है इसीलिए ये अन्य चुनावों से ज्यादा महत्वपूर्ण है ।

राष्ट्रीय चुनावों के अतिरिक्त राज्य स्तर के चुनाव, स्थानीय स्तर के चुनाव भी होते हैं ।

हर प्रकार का चुनाव जीतने के लिए सर्वाधिक मत प्राप्त करना पड़ता है । सबसे ज्यादा मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार जीत जाता है । किसी भी पार्टी के किसी भी उम्मीदवार की जीत-हार का निर्णय मतदाता के द्वारा डाले गए मत से होता है। 

क्या हर चुनाव में मतदाता की भूमिका एक समान होती है ?  नहीं ! हर स्तर के चुनाव में मतदाता की भूमिका , उसके मत की ताकत एक समान नहीं होती है । मतदाता के मुद्दे भी हर चुनाव में एक समान नहीं होते हैं ।

आखिर व्यक्ति तो वही रहता है तो फिर चुनाव के अनुसार उसके मत का मूल्य क्यों घट जाता है ? ऐसा निर्वाचन क्षेत्र के बढ़ते आकार, जातिगत व धार्मिक लामबंदी के कारण होता है ।

स्थानीय पंचायत चुनाव में ग्रामीण निर्वाचन क्षेत्र एक गाँव या शहरी निर्वाचन क्षेत्र में एक मुहल्ला होता है । छोटा निर्वाचन क्षेत्र होने के कारण प्रत्येक वोट का मूल्य अधिक होता है । और यह बात ऐसे भी सिद्ध होती है कि स्थानीय चुनावों में जीत या हार का अंतर लगभग 100-200 वोट का होता है । पंचायत स्तर पर कभी-कभी बराबर मत भी मिल जाते हैं । ऐसे में स्थानीय स्तर पर एक-एक मत बहुत कीमती होता है । लेकिन जब कि मतदाता के एक मत का मूल्य अधिक होता है लेकिन मुद्दे अत्यंत सीमित महत्व के होते हैं ।

इसीप्रकार राज्य स्तर पर विधानसभा का निर्वाचन क्षेत्र स्थानीय निर्वाचन क्षेत्र से थोड़ा और बड़ा होता है । एक विधानसभा क्षेत्र में औसतन  लाख से दो लाख वोट होते हैं । दो लाख वोट वाले विधानसभा क्षेत्र में जीत का अंतर आमतौर पर 40 से 50 हजार तक रहता है लेकिन बहुत टाइट मुकाबले में यह अंतर 1000 से 500 वोट तक भी गिर जाता है । इसप्रकार विधानसभा चुनाव में मतदाता के एक मत का मूल्य थोड़ा कम हो जाता है ।

असल में किसी चुनाव में जीते हुए उम्मीदवार और दूसरे नम्बर पर आए उम्मीदवार के बीच के मत अंतर से उस निर्वाचन क्षेत्र में एक मत के मूल्य का आकलन किया जाता है । यदि यह अंतर स्थानीय चुनाव में 1 वोट का है तो एक-एक वोट कीमती है लेकिन यदि यही अंतर लोकसभा चुनाव या विधानसभा चुनाव में 1 लाख वोट या 50 हजार का है तो मतदाता के मत का मूल्य गिर जाता है ।

इसी प्रकार लोकसभा चुनाव में भी होता है । एक लोकसभा क्षेत्र लगभग 10 विधानसभा क्षेत्र से मिलकर बनता है । उसमें लगभग 10 लाख से लेकर 20 लाख तक वोट होते हैं । और जीत का मार्जिन भी 1 लाख से 2 लाख वोट का होता है ।

इसप्रकार के आकलन से तो ऐसा प्रतीत होता है कि मतदाता को पंचायत चुनाव में जरूर वोट करना चाहिए लेकिन विधानसभा और लोकसभा चुनाव में वोट नहीं भी करेगा तो चलेगा ।

लेकिन पूरा-पूरा मामला ऐसा नहीं है । हालांकि भारतीय चुनाव प्रणाली में सुधार की भारी जरूरत है लेकिन तब पर भी जो वर्तमान व्यवस्था है वह भी काफी हद तक ठीक है ।

एक मतदाता के रूप में पंचायत व नगरीय निकाय के चुनाव में अपने वोट का मूल्य समझने वाला मतदाता लोकसभा चुनाव व विधानसभा चुनाव में अपने मत को निर्मूल्य क्यों समझने लगता है ? इस प्रश्न का जवाब छिपा है वोट बैंक में ।

आखिर वोट बैंक क्या होते है ? कैसे बनते हैं ? हम जानते है चुनाव जनता को मौका देते हैं अपने अनुसार नीतियाँ राजनीतिक पार्टियों से लागू करवाने का । इसप्रकार जनता के हित व मुद्दों में स्वतः समानता  स्थापित हो जाती है । यह समानता उन्हें लामबंद कर देती हैं । और चुनाव के आने तक एक वोट केवल एक वोट न होकर वोट बैंक में तब्दील हो चुकता है । स्थानीय स्तर व कुछेक विधानसभा को छोड़ दे तो लगभग हर चुनाव वोट बैंक पर निर्भर करता हैं । कुछ वोट बैंक वर्ग आधारित, जाति आधारित, धर्म आधारित आदि होते हैं । दलित वोट बैंक, ब्राह्मण वोट बैंक जाति आधारित वोट बैंक के उदाहरण है जबकि किसान वोट बैंक वर्ग आधारित वोट बैंक का उदाहरण है । वोट बैंक के फायदे भी है और नुकसान भी है ।

वोट बैंक कैसे काम करते है ? एक उदाहरण लेकर इस बात को और स्पष्ट करते हैं । जनगणना के आंकड़ों के अनुसार देश की आबादी का लगभग 8% जनजाति व 16% दलित है । चूंकि 1931 के बाद  2011 में जाकर जाति आधारित जनगणना हुई और उसके आंकड़े सरकार ने साझा नहीं किये है । लेकिन तब पर भी ओबीसी जनसंख्या का प्रतिशत कम से कम 52% से ज्यादा है । ऐसे में कुल आबादी का 25% या उससे भी कम सवर्ण आबादी है ।

25% आबादी का देश भर में वितरण भी असमान है । इसलिए सवर्ण किसी भी लोकसभा सीट में निर्णायक भूमिका अदा नहीं कर सकते हैं । अपवाद हो सकते हैं लेकिन आमतौर पर यह मुश्किल है ।

बात को आगे बढ़ाया जाए तो एक विधानसभा क्षेत्र के मामले में भी सवर्ण निर्णायक भूमिका तभी अदा करते है जबकि या तो जनजाति या दलित वोट या ओबीसी वोट का कुछ हिस्सा उनके साथ वोट करें ।

लेकिन पंचायत स्तर पर सवर्ण वोट बैंक हो सकता है । आज भी ग्रामीण भारत जाति के आधार पर बसा है । ऐसे में संभव है कि एक गांव केवल सवर्ण जाति की बहुसंख्या का हो ।

अब बात आती है कि जबकि सवर्ण आबादी बड़े स्तर पर चुनाव में अपने मुद्दों को नहीं उठा सकती है तो क्या उसे वोट करना चाहिए ? ज्यादातर मामलों में यदि सवर्ण जाति आधारित मुद्दे उठाएंगे तो को एक वोट बैंक के रूप में वे असफल सिद्ध होंगे इसलिए जाति के आधार पर सवर्ण वोट बैंक अकेले अक्षम है । जबकि वे इसलिए लामबंद हो कि उन्हें अपनी जाति आधारित मुद्दों संबंधी नीतियाँ लागू करवानी है । इसका बहु प्रचलित उदाहरण है आरक्षण व्यवस्था को हटाना । सवर्ण वोट बैंक आरक्षण व्यवस्था को हटाने के मुद्दे पर लामबंद हो सकता है लेकिन उसके वोट करने से फर्क नहीं पड़ेगा ।

इसलिए सवर्ण स्वयं के जाति आधारित मसलों के लिए वोट बैंक नहीं है । इसप्रकार सवर्ण वोट बैंक कोई चीज नहीं है । सवर्ण वोट बैंक और विभाजित होकर ब्राह्मण वोट बैंक में टूटता है और कई अन्य मुद्दों के लिए ओबीसी, जनजाति के साथ मिलकर एक वोट बैंक का निर्माण करता है ।

अतः पूरी चर्चा का निष्कर्ष यह है कि सवर्ण अपवाद की स्थिति में पंचायत स्तर के चुनाव में वोट कर सकते है लेकिन विधानसभा व लोकसभा के स्तर पर उनके मत का मूल्य नगण्य है ।

एक सवर्ण वोट किसान वोट बैंक, क्षेत्रीय आधार पर बने वोट बैंक का हिस्सा बनकर वोट करता हैं । वह न जानते हुए भी एक वोट बैंक का हिस्सा बन जाता है क्योंकि अकेले उसके मत की कोई कीमत नहीं होती है ।

इसप्रकार जो आबादी जिस क्षेत्र में अल्पसंख्या में रहती है उसका उस निर्वाचन क्षेत्र में स्वयं के मुद्दे पर वोट न करके उसका वोटअन्य मुद्दों के आधार पर बने वोट बैंक का हिस्सा माना जाता है ।

इससे लाभ वोट बैंक बाने वाले प्रभावशाली वर्ग को होता है जबकी कमजोर वर्ग उसके मुद्दों को उठाने के लिए सहायक का काम करता है ।