गुरुवार, 8 मई 2025

बँधनों की दुनिया


था उसका सारा यह जहाँ,
खुला गगन, धरती महान।
फिर भी उसने घर बसाया,
चार दीवारों में मन को बाँधा।

पेड़ थे, छाँव थी, ज़मीन खाली,
पर उसने लगाई क़ीमत गाली।
जो था सबका, उसे अपना बनाया,
काग़ज़ों में नाम लिखवाया।

नदी थी, झरने थे गाते,
प्रकृति के संग दिन थे बीतते।
पर उसने नल में पानी बाँधा,
स्नानघर में जीवन को साधा।

आजादी थी, उड़ सकता था,
सपनों में दिन बिता सकता था।
पर उसने नौकरी को चुना,
समय को तनख्वाह में बाँटा।

था जीवन जीने को अपना,
पर बंध गया रिश्तों का सपना।
विवाह किया, साथ निभाया,
पर खुद को कहीं खो बैठा।

दिन में सोने की आज़ादी थी,
रात में जागने की तैयारी थी।
पर बिजली बनाई रात को दिन,
और खो दिया नींद का सुकून छिन।

आग जलाई रोटी पकाने को,
बस गया एक जगह जीने को।
पर खेती, घर और परिवार के संग,
खोई स्वतंत्रता, खो गया रंग।

सुविधा के पीछे भागते-भागते,
शांति छूटी, जंग लगते-लगते।
अब भी खुला है प्रकृति का द्वार,
पर क्या लौट पाना है अब सरल और स्वीकार?

जब भी जीवन लगे बंधन में,
जब भी घुटन हो इन बर्तनों में,
एक सवाल उठता है मन में—
क्या सच में खुले हैं रास्ते वन में?

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