" मानवाधिकारों पर लेशमात्र भी आँच आने पर मानवाधिकार आयोग सक्रिय हो जाता है, होना भी चाहिए । क्योंकि मामला भी तो दुनिया के सबसे होनहार, समझदार दो पैरो वाले जीव से जो जुड़ा है । मगर मानवाधिकार अब आत्यंतिक रहने लायक बचे नहीं है क्योंकि मानव अब मानव बचा नहीं है। संविधान ने वो दौर भी देखा जब जमींदारी के लिए भारतीयों को दिए मानवाधिकारों पर प्रश्न उठे, तो अब भी कई नए प्रश्न उठे है । जब व्यक्ति स्वयं से नहीं समझ रहा तो अब कानून का सहारा लेना ही पड़ेगा । "
सभ्यता का विकास भी क्या खूब अंदाज़ से हुआ । पहले समाज शिकारी था फिर पशुचारक और कृषक बना । और आज ज्ञान के गट्ठर ढो रहा है । क्या से क्या हो गए हम ?
मगर अब तो एक नया भाग जुड़ेगा या भाग 3 (क) बनेगा । और शीर्षक होगा - पशुओ के मूल अधिकार । तो क्या करे । संविधान तो बदलना पड़ेगा । वैसे पहले से एक कानून है बिलकुल अपाहिज शक्तिमान जैसा है , अरे वही शक्तिमान, जिसको उत्तराखंड के बी०जे०पी० विधायक के हाथों अपने पैर से हाथ धोना पड़ा ।
ऐसे मे कौन बचाएगा शक्तिमान को ? क्या कहा - कानून । कानून का नाम बता दू , बताता हूँ - पहला है, पशुओ पर अत्याचार रोकथाम अधिनियम, 1960 । लेकिन कानून तो कानून ही है। और दूसरा है ,आईपीसी सेक्शन 429 । आईपीसी मे तो बड़ी जबर्दस्त बात लिखी है, मैं मूल पंक्तिया ही छापे देता हूँ - https://indiankanoon.org/doc/3563/ इस लिंक पर जाकर जरूर पढ़े । क्योंकि देने को तो कुछ नहीं लेकिन धरे गए । जैसे की विधायक जी धरे गए है तो पाँच साल की सजा तक हो सकती है ।
ऐसो मे एक बात तो साफ है जानवर मारने - पीटने की चीज़ न है । उनको भी दर्द होता है । और वो भी रोतो है ।
लेकिन आज कल ये आम आदमी की दिल्ली सरकार मे जनवरन की खैर नहीं है । अभी विडियो शेयर हो रहा है की कोई ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन की सीढ़ी मे बैठकर कुत्तन को चाकू से घायल कर रहा है । और एक पिल्ला का तो उसने वध भी कर दिया । कुत्तो का सिरियल किल्लर पैदा हो गवा है । एक दम राक्षस हो गवा है। लेकिन पुलिस भी विडियो को खंगाल के उको पकड़ ही ली । लेकिन इतने मे काम नहीं बनने वाला । पता चला है दिल्ली का गौतम बुध नगर जनवरन की कब्रगाह बन गया है । सबसे ज्यादा बेजुबानों पर अपराध वही हो रहे हैं ।
ये हाल तो राजधानी का है । उसके बाद देश पर नजर डाले तो, खबरों की हैड लाइन कुछ ऐसी मिलती है - एक व्यक्ति कर रहा था, कुत्ते के साथ बलात्कार । प्यासे जानवर को इतनी बेदर्दी से मारा की चली गई उसकी जान । जानवरो को बूचड़खाने मे कितनी क्रूरता से मारा जाता है वो तो मुद्दा ही नहीं है, गाय को छोड़कर । हाँ ! अगर कोई नोनवेज खाने को दे तो एक बार ऐसे मे पूछना जरूर बनता है , ये क्या है ? क्योंकि आजकल सब कुछ उपलब्ध है ।
दुनिया मे ऐसे देश भी है जहा जानवरो से बेहतर बर्ताव किया जाता है लेकिन शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहा मांसाहार के नाम पर उनको न काटा जाता हो इसलिए मांसाहार को छोड़कर बचे जानवरो पर किए जा रहे बर्ताव को ध्यान मे रखकर देखते है तो पता चलता है लगभग ज़्यादातर पश्चमी देश जहा इंसान मजे से है वहा जानवर के भी मजे है । ऐसे मे नाम गिनने से कुछ खास मिलने वाला नहीं ।
क्योंकि जब रुस या अमेरिका लंबी दूरी की इंटेर्कोंटीनेंटल मिसाइल इराक या सीरिया पर दगता होगा तो क्या वहा के जानवर बच जाते होंगे। नहीं वो भी राख उनके मालिक भी राख । बिलकुल वैसे ही जैसे हड़प्पा कालीन कब्र की खुदाई मे मानव की अस्थियो के साथ कुत्ते के भी अस्थिपंजर मिले थे। मुसीबत मे गेंहू के साथ घुन भी पिस्ता है । अबे , जानवर आतंकवादी थोड़ी है । जानवर जिहादी थोड़ी है । गधा या बकरा इस्लामिक स्टेट का वफादार कब से हो गया ? लेकिन हो गया जानवर जो ठहरे । उनकी कौन सुनता है ?
सेंसरबोर्ड भी क्या बैन करता है ? घंटा । अच्छे अच्छे डाइलॉग मे बीप गुसा गुसा के उनकी बीप बीप एक कर देता है । लेकिन अगर डाइलॉग कुत्तो पर हो तो क्या बात । गोविदा बोलते है - " जब दस कमीने मरते है तो एक कुत्ता पैदा होता है , मैं पूछता हूँ गोविंदा को ये दिव्य ज्ञान कैसे हुआ ? नहीं पता । इसके बाद सुरवीन चावला बोलती है - पागल कुत्ता और आवारा हाथी दोनों बंदूक की गोली के लिए बने हैं । और अंतिम मे बसंती इन कुत्तो के सामने मत नाचना । एक और ये वाला पक्का अंतिम है - जगिरा जी बोलते है इंडिया गेट मे मेरे मन को भाया मैं कुत्ता काट के खाया । मैं पूछता हूँ ये सब क्या है , माइ लॉर्ड । यही इंसाफ है । कानून की देवी कब तक आंखो मे इसी तरह पट्टी बांध के रखेगी और उसके कुत्ते जुल्म सहते रहेंगे और हाँ ! घोडा और हाथी भी ।
इसके बाद डबल्यूडबल्यूएफ़ , पेटा , वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल वेलफ़ैर जैसी संस्थाए क्या कर रही है ? कुछ तो करनाल मे भैस का क्लोने पैदा कर रही , कुछ चीता पकड़ रही , कुछ बाघ की गिनती कर रही , गंगा की डॉल्फ़िन बचा रही , चंबल से डोलफिनो को निकाल के दूसरी नदी मे डाल रही । या गिद्ध बचाओ, गौरैया बचाओ , गाय बचाओ, शेर बचाओ । यही सब चल रहा है । लेकिन ऐसे मे घोडा , कुत्ता और गधे का हाल पूछने वाला कोई नहीं है । बिलकुल अकेले पड़ गए है ये ।
मैं पूछता हूँ आदमी का बच्चा किसके साथ खेलेगा , कुत्ते के साथ । आदमी का बच्चा किसकी सवारी करेगा , घोड़े की । और यही कष्ट मे है ।
इसलिए कुत्ते को भोकने दे क्योंकि कुत्ते तब ज्यादा भोकते है जब वो अकेलापन महसूस करते है । उनकी भावनाओ को समझे और उनपर अत्याचार करना बंद करे। और देश मे पशुओ के अधिकार की मांग जायज है इसका समर्थन करे। जानवरो से ही दुनिया गुलजार है क्योंकि इंसान जानवर बन गया है और बेजुबान इंसान ही काम के है और वो कम रह गए है ।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें