शनिवार, 6 सितंबर 2025

आज अंतिम छुट्टी पर

एक दिन दफ्तर जाते हुए
मैंने एक मुर्दे को देखा।
मुर्दा लेटा हुआ था,
लोग उसे लिए जा रहे थे।

दफ्तर जाने का समय था—
सोचने लगा, अगर यह ज़िंदा होता
तो शायद अभी मेरे साथ
दफ्तर ही जा रहा होता।

मगर आज यह दफ्तर नहीं जा रहा,
और न ही वे लोग,
जो इसके पीछे चल रहे हैं।

दफ्तर जाने के वक्त,
सड़क पर जो भी दिखता है—
सब दफ्तर जाते प्रतीत होते हैं...
यहाँ तक कि मुर्दा भी।
कभी-कभी लगता है
ज़िन्दगी और मौत के बीच
बस इतना ही फर्क है—
जीवित आदमी दफ्तर जाता है,
मुर्दा सीधा श्मशान।

हम दिन भर दफ्तर जाकर
थोड़ा-थोड़ा मरते हैं,
और एक दिन ऐसा आता है
जब हमें भी
दफ्तर नहीं जाना पड़ता।

तब लोग कहते हैं—
“आज वह छुट्टी पर है,
अंतिम छुट्टी।”

कितना अजीब है,
हम जीते-जी छुट्टियों के लिए तरसते हैं,
और मरने के बाद
लोग हमें छुट्टी पर बताते हैं।

शायद ज़िन्दगी भी
एक बड़ा दफ्तर है,
जहाँ हम सब नियुक्त हैं,
कोई स्थायी नहीं,
सब संविदा पर।

हर किसी का कॉन्ट्रैक्ट
किसी अदृश्य हस्ताक्षर से बँधा है।
कोई नहीं जानता
किसका कब समाप्त हो जाएगा।

और फिर एक दिन
“सेवा निवृत्ति” का आदेश आता है।
सिर्फ़ एक चुप्पी,
सिर्फ़ एक यात्रा—
श्मशान की ओर।

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