शुक्रवार, 9 अगस्त 2019

नियति कितनी बलवान है ?

तुम हाँ ! तुम्ही से कह रहा हूँ ! इधर उधर क्या देखते हो ? तुम जो कभी ये सोच कर कि सफल हो , खुश हो गए । वही तुम कभी ये सोच कर कि असफल हो, दुखी हो गए । तुम्हारे जीवन में तुम्हारी यह स्थिति दयनीय से अधिक कुछ नहीं है । कभी भी बिना जड़ के पेड़ देखा है । बिना जड़ का पेड़ होगा भी तो पल भर में सूख जाएगा । बिना नींव कि इमारत गिर जाएगी । आधारहींन बातों को कोई नहीं सुनता वैसे ही जीवन में उन बातों को क्या महत्व देना जिनके होने न होने पर किसी का वश नहीं था । तुमने जन्म किस जाति में लिया तुम्हारे वश में नहीं था , और न ही तुम्हें माता पिता के चयन का अधिकार दिया गया । शिशु के रूप में जब तुम्हारा जन्म हुआ तो तुम इतने अबोध थे कि अपनी नियति से जुड़े फैसले नहीं कर सकते थे । यदि जन्म के बाद भोजन न कराया जाता तुम्हें तो तुम मर जाते । जन्म लेने के वर्षों तक तुम्हें सही गलत और अपना हित-अहित नहीं पता था । एक सेकेंड भर को रुककर अपनी स्थिति को देखो और सोचो आज जिस संसार में रह रहे हो उसमें जिन बातों और तर्कों को लेकर जी रहे हो उनमे से कितनों का निर्धारण योग्यता के आधार पर होता है । जाति, धर्म , रंग , धन , रूप , नागरिकता किसी को भी चुनने के लिए तुम्हें स्वतन्त्रता नहीं थी । तुम जन्म से परतंत्र प्राणी थे । यदि आज स्वतन्त्रता के लिए सोचते हो तो यह वही स्थिति है जिसमें बिना जड़ के पेड़ सूख जाता है । तुम किससे स्वतंत्र होना चाहते हो ? एक व्यवस्था है जिसमें से सभी को गुजरना पड़ा । 

जब कभी भी ये लगे कि जीवन में तुम स्वतंत्र हो । तुम जीवन के फैसले ले सकते हो तो उन बातों को याद करना कि  किस बारीक व अति भाग्यवाद के बीच से तुम्हारा निर्माण हुआ है । जिस स्थिति में तुम्हें किस किनारे लगा दिया जाता उसका कोई हिसाब लेने वाला नहीं था । एक नवजात शिशु कि पहचान नगण्य होती है । ऐसी भयानक स्थिति से निकलकर तुम्हें यह जीवन मिला है जिसमें यदि आँख , नाक , कान , हाथ , पैर  सलामत है तो मान लो बड़ी मेहरबानी कर दी पालने वाले ने जो वह इतना समय निकाल पाया और सोचा कि तुम सही सलामत रहों । यह आश्चर्य नहीं है कि दुनिया में ऐसे लोग दिखते है जिनके हाथ न हो या एक पैर से विकलांग हो । भगवान का दिया हुआ यह शरीर तुम्हारा घर है । जब कभी भी तुम इन बातों को पढ़कर इनकी तह तक पहुचना तुम पयोगे जीवन में जितना कुछ भी तुम्हें मिला है वो न भी मिल पाता तो कोई अदालत नहीं थी जंहा गुहार लगाकर अपने साथ हुये अन्याय का हिसाब मांग पाते । बल्कि तुम्हारी स्थिति ही न्याय के बाद कि स्थिति है । दुनिया तुम्हारे साथ हुये को तुम्हारे पुराने जीवन के कर्मों के मत्थे मढ़ देती और तुम सोचते रह जाते कौन सा पिछला जन्म ? 

असल में यह व्यवस्था है जिसमें अव्यवस्था भी है जैसे कि हर व्यवस्था में होती है । शुभ के साथ अशुभ भी होते है। बिना सोचे विचारे लोग हाहाकार करते रहते है । सीधी सी बात है जब , जिस दिन जिस वक्त यह समझ जाओ कि जिस स्थिति में उस स्थिति से भी बदतर स्थिति हो सकती थी तो उसी समय से अपनी गति बदल देना । निराशा का कोई स्थान नहीं है । निराशा किसलिए ? तुम्हारे हाथ में जब था ही नहीं कुछ तो तुम निराश होकर भी कुछ नहीं कर सकते । ऐसा भी नहीं है कि आगे तुम्हारी निराशा तुम्हें इस बात का भरोसा देगी कि तुम अपनी नियति चुन पाओगे। ब्रह्मांड में लटकती हुयी पृथ्वी को ध्यान करके इस बात को समझों । जो व्यक्ति इन बातों को समझ कर अपनी गति में सुधार कर लेता है उसी ने वास्तव में जीवन को जी पाया । ज़्यादातर जीव इस जगत में नियति के सहारे उड़ते , गिरते , बढ़ते , घटते है । कोई जन्म से अमीर या गरीब हो जाता है ।  किसी की जाति उसे पंडित घोषित कर देती है । कोई जाति से ही ग्वाला है और कोई जाति से ही सेवक है । नियति ने उन्हें अपने कर्म तक चुनने का अधिकार नहीं दिया । यह कोई आश्चर्य करने वाली बात नही है । समाज ऐसा भी होता है । 

दुनिया में कोई भी नहीं जो यह बात समझ लेने वाले व्यक्ति को जरा भी विचलित कर सके कि नियति कितनी बलवान है ?

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