शनिवार, 7 फ़रवरी 2015

हरि नाम महामंत्र माहात्म्य

पहले 'हरे कृष्ण' दो बार पुनः 'कृष्ण' दो बार तदन्तर 'हरे' की दो बार आवृति करे । 'हरे राम' दो बार पुनः 'राम' दो बार तदन्तर 'हरे ' की दो बार आवृति करे । इस प्रकार महामंत्र पूर्ण हुआ ऐसा श्री सनत्कुमार संहिता में कहा गया है ।

हे हरे ! मेरे चित्त को हरकर भवबंधन से मुक्त कर दीजिये ।

हे कृष्ण ! मेरे चंचल चित्त को अपनी ओर आकर्षित कर लीजिये ।

हे हरे ! अपने स्वाभाविक माधुर्य से मेरे चित्त को हर लीजिये ।

हे कृष्ण ! भक्तितत्ववेत्ता अपने भक्त द्वारा अपने भजन का ज्ञान देकर मेरे चित्त को शुद्ध कर दीजिये ।

हे कृष्ण ! अपने नाम-रूप-गुण-लीला आदि में मेरी निष्ठा उत्पन्न कर दीजिये ।

हे कृष्ण ! अपने नाम-रूप-गुण-लीला आदि में मेरी रूचि उत्पन्न कर दीजिये ।

हे हरे ! मुझे अपनी सेवा के योग्य बना दीजिये।

हे हरे ! मुझे अपनी सेवा के योग्य बनाकर अपनी सेवा का आदेश दीजिये ।

हे हरे ! अपने प्रियतम सहित की गई अपनी अभीष्ट लीलाओं का मुझे श्रवण कराइये ।

हे राम ! हे राधिकारमण अपनी प्रियतमा राधिका जी सहित की गई अपनी अभीष्ट लीलाओं का श्रवण कराइये ।

हे हरे ! हे श्रीमति राधिके आप अपने प्रियतम श्री कृष्ण के साथ अपनी अभीष्ट लीलाओं का दर्शन कराइये ।

हे राम ! हे राधिकारमण आप अपनी प्रियतमा सहित अपनी अभीष्ट लीलाओं का दर्शन कराइये ।

हे राम ! आप मुझे कृपया अपने नाम-रूप-गुण-लीला एवं स्मरण आदि में नियुक्त कर लीजिये ।

हे राम ! उस लीला में मुझे अपनी सेवा योग्य बना दीजिये ।

हे हरे ! मुझे अंगीकार कर मेरे साथ रमण कीजिये अर्थात मुझे आनंदित कीजिये ।

हे हरे ! मेरे साथ रमण कीजिये । मेरे साथ विहार कीजिये ।

रविवार, 21 दिसंबर 2014

Richard Hamming "You and Your research"

प्रथम कड़ी

( यह हिंदी अनुवाद है रिचर्ड हैमिंग के साथ बातचीत का, जो २०० बेल लैब के कोर सदस्यों और आगन्तुकों के साथ मोरिस रिसर्च और इंजीनियरिंग सेंटर में       मार्च ७ , १९८६ में किया गया था । इस बातचीत को श्रृंखलाबध्द तरीके से आपके सामने लाने के लिए मैं उनका आभारी हूँ जिनके द्वारा यह मुझे प्राप्त हुआ है ।)
   
      मुझे यह आवश्यक लगा कि रिचर्ड हैमिंग का परिचय आपसे पहले करा दिया जाए । रिचर्ड हैमिंग , एक प्रोफेसर नवल पोस्टग्रेजुएट स्कूल, मॉनटेरे (कैलिफ़ोर्निया ) में एवं एक सेवानिवृत बेल लैब वैज्ञानिक थे। यह बातचीत रिचर्ड हैमिंग के द्वारा एक प्रश्न के निरिक्षण एवं रिसर्च पर केन्द्रित है और वह प्रश्न है " क्यों कुछ वैज्ञानिकों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया और क्यों कुछ इस लम्बी दौड़ मे ही खो गए ? " उनके चालिस साल के कार्यानुभव में, जिसमें से तीस साल उन्होनें बेल लैब में बिताए । वहॉ उन्होने कई प्रत्यक्ष निरिक्षण किए , वैज्ञानिकों के बारे में अनसुलझे प्रश्न कि   वे क्या , कैसे और क्यों करते हैं ? महान वैज्ञानिकों के जीवन का अध्ययन और उनके योगदान का अध्ययन किया और आत्म निरिक्षण भी किया और रचनात्मकता के सिध्दांत का अध्ययन भी किया। यह बातचीत इस बारे में है कि उन्होंने वैज्ञानिकों के व्यक्तिगत विशेषताओं , उनकी क्षमताओं , गुण , कार्य करने की रूचि , अभिरूचि और दर्शन का अध्ययन करने के पश्चात् क्या पाया ?
      इसी पूरी बातचीत की शुरुआत ऐलन जी. चयनोवेथ के द्वारा रिचर्ड हैमिंग के श्रोताओं के साथ परिचय के साथ शुरू होती है ।
      ऐलन जी. चयनोवेथ कहते है कि रिचर्ड हैमिंग या डिक हैमिंग हमेशा से गणित और कंप्यूटर साइंस में अच्छे थे । उनकी आरंभिक शिक्षा यूनिवर्सिटी ऑफ़ शिकागो और नेब्रास्का में हुई और उन्होंने पी.एच.डी. इलेनॉइस से प्राप्त की । उसके बाद वे लड़ाई के दौरान लोस एलामोस प्रोजेक्ट से जुड़ गए । उसके बाद 1946 में वे बेल लैब से जुड़ गए और वही हम दोनों मिले। रिचर्ड ने गणित और कंप्यूटर साइंस से जुडी 7 बेहतरीन किताबें भी लिखी । ऐलन इस अवसर पर रिचर्ड का एक कथन याद दिलाते है कि " यहाँ वेव लेंथ है जिसे लोग देख नहीं सकते, यहाँ साउंड है जिसे लोग सुन नहीं सकते और शायद कंप्यूटर के भी विचार होते है जिसके बारे में लोग सोच नहीं सकते ।"
         

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

आशुओ के बादलो में

क्यूँ ऐसी हो ?
की तुम्हारे लिए और बदले भी
मैं ही रोया ।
दर्द भी मैंने दिया
और मैं ही रोया ।
यही तो बदलना है।
तुम में सब है ,
तभी तो मैं पास आने से हर बार कतराया ।
कभी भी दिल में ,
हमेशा के लिए नहीं समाया ।
तेरी यादों से तुझको बनाया ।
सबने मिट्टी से मूर्ती बनाई ।
मैंने तुझे अपने आशुओ से बनाया ।
एक बूंद आशू मेरे ,
मेरे स्टडी पैड पर मेरे नोट्स के साथ,
कितनो को नोट्स ने सोखा ।
एक जो खुद से बच गया ।
वाष्पित हो कर ,
मुझसे तुझ तक पहुचने के लिए ,
मैंने इस विश्वास में ,
आशुओ के बादलो में अपनी ,
संवेदनाओ से विदा लिया ।

बुधवार, 26 नवंबर 2014

क्षणिकाएँ

मेरा मुख कंकड़ सदृश्य है,
हर बार जो कुचला गया है ।
कभी अहं में,
कभी स्वार्थ में,
कभी सुख की तलाश में,
चेचक वाले चेहरे-सा,
दानेदार हो गया है ।
मेरे व्यवहार का प्रतिबिम्ब है जो,
चप्पलों और जूतों की मार से,
देखो कैसा चमक गया है ?
मेरा मुख कंकड़ सदृश है,
हर बार जो कुचला गया है ।
मेरे खुद के पैरों तले पड़कर,
गालों में पदचिन्ह उपट गया है,
मेरा मुख कंकड़ सदृश है,
हर बार जो कुचला गया है।

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

रोऊँगा अब नहीं एकांत में जाकर

मैं क्यूँ कुछ कठिन कहूँ,
या छुपाऊँ पीड़ा छाती की ।
सामाजिक हूँ ।
पीड़ा को स्वीकार कर,
जिसे समाज ने नहीं दिया ।
मैं ने सबके लिए स्वयं को,
सर्व सदा उपलब्ध किया ।
तो क्यूँ छुपकर व्यक्त करू ,
वेदना सहू अपनी और सबकी,
पर अब नहीं एकांत में जाकर,
रोऊँगा समाज में,
और सुनना होगा सभी को मुझे ,
चाहे ऊब ही हो जाये ,
आकस्मिक मुझको पाकर।
जानकर नहीं, यू ही किसी को रुलाकर ।
मैं ने सब को अपना दर्द सुनाने को ,
सर दर्द लिया ,
पाला पोशा बढ़ा किया ।
अब इसका पान करूँगा,
सिर्फ मैं,
पर रोऊंगा अब नहीं एकांत में जाकर ।

बुधवार, 19 नवंबर 2014

ये फूल जूठा है ।

ये फूल जूठा है ।
इसकी सुन्दरता और सुगंध झूठी है ।
पता नहीं, ये किसका है ?
इस पर किस-किस ने अधिकार किया ।
क्या तुमने सोचा,
क्यूँ सोचा तक नहीं ?
बस उठा लिया,
निस्तेज सुमन को पाकर भी,
क्या पा लिया ?
मिट जाने तक रंग, रूप और सुगंध,
ये बँटता जाता है।
पर कभी अपना हिस्सा मत माँगना,
जो मन से भी मांग लिया,
अधिकार किया,
कुछ ने सच में बलवश छीना ।
क्या पाया ?
ज्यादा बहुत ज्यादा,
अपना सब कुछ खो दिया ।
ये फूल झूठा है ।
जो जान गया,
क्या पाया ?
क्या बचा लिया ?

इतिहासकार और दूरदर्शिता

" वे बड़े इतिहासकार और दूर दृष्टा तो थे ही, कुशल प्रशासक भी थे। नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने इतिहास और समाजविज्ञान की अनेक दुर्लभ और महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद और प्रकाशन कराया। खासकर प्रवासी इतिहासकारों की पुस्तको को भारतीय भाषाओ में लाना उनका महत्वपूर्ण योगदान है ।"

   अनुमान लगाइए ! लगाइए ! उपरोक्त बातें किसके सम्बन्ध में कही गई होगी ? मगर हमेशा की तरह इस बार भी इतने से में बात खत्म होने वाली नहीं है; ये तो महज शुरुआती मानसिक कसरत है और कही जाने वाली बात की प्रमाणिकता की तलाश भी ।

                                                                    (1)

   जयों का त्यों अपना लेने में क्या मजा है? जैसे चावल और गेहूँ को क्रमशः भात और रोटी में बदले बगैर खाने की आदत जब हमने खो दी है तो शेष विषयों में भी उसी आदत को क्यों न पा ले ? कही गई बात को निरपेक्ष मानने पर भी उसके एक से अधिक अर्थ और अभिप्राय तो निकाले ही जा सकते है; उदाहरणार्थ चिकित्सा पर्यटन की अवधारणा हमेशा से विद्यमान थी और किसी भी आयाम से अविश्वसनीय भी नहीं । मात्र जरुरत सही दृष्टिकोण और पहचान की थी। चीजों को देखने के कई तरीके होते हैं इसीलिए रुढ़िवादी हुए बगैर हर तरह से किये गए विश्लेषण को अपना सकने जितना लचीलापन हमारे स्वाभाव में होना चाहिए। जिस रंग का चश्मा पहनेगें दुनिया उसी रंग में रंग जाएगी । हमे न तो नितांत सैधांतिक और न ही नितांत व्यवहारिक होने की जरूरत है । महान विचारकों ने दोनी के ही सम्बन्ध में पर्याप्त कहा है । सैधांतिक शिक्षा के लिए कहा गया है की " There is nothing more practical than a good theory ."

                                                                    (2)

  इतिहास बीता हुआ जरुर हो सकता है मगर समय में परिवर्तन के गुण के कारण पुनः घटित होने वाला प्रतीत तो होता ही है। कमरे का चौकोर आकार छुपे हुए रूप में ही सही अपने अंदर सभी धारणीय वस्तुओं में अपने चौकोरपन का प्रक्षेपण कर देता है; कमरे के अंदर की टेबल और पलंग , पन्ने और किताब चौकोर है। इतिहास में भविष्य की कल्पना होती है, आगामी समस्याओं का हल और कारण-परिणाम: परिणामों के कारण होते है। कुल मिलाकर सीखने के लिए बहुत कुछ, बदलने के लिए कुछ भी नहीं मगर भविष्य को बदल देने की प्रेरणा होती है ।

                                                                    (3)

   जार्ज बर्नार्ड शॉ के शब्दों में " मै इतिहास को अंत: प्रज्ञा से जानता हूँ फिर लिखता हूँ और उसके बाद इतिहास को पढ़ता हूँ और पाता हूँ मैंने सही लिखा था ।  इस बात की अगली कड़ी ये हो सकती है कि " मैं भविष्य को अंत: प्रज्ञा से जानता हूँ, फिर कहता हूँ और सब देखते है जो मैंने कहा था बिलकुल वही हुआ।" उदाहरणार्थ: प्रथम विश्व युद्ध के परिणामों का सतर्क विश्लेषण द्वितीय विश्व युद्ध की सम्भावना को दर्शता था; तत्कालीन विद्वानों ने तो यहाँ तक कहा कि ये 20 वर्षों का युद्ध विराम मात्र है । मगर दूसरे कथन में अंत: प्रज्ञा इतिहास जनित है जबकि पहले कथन की अंत: प्रज्ञा का ठीक-ठाक आधार सामान्य समझ हो सकती है । 

                                                                    (4)

   सर्वप्रथम वर्णित कथन विपिन चन्द्र के सम्बन्ध में है। विपिन चन्द्र का मानना था की इतिहास प्रगतिशील विचारों का प्रसार का सशक्त माध्यम हो सकता है। उन्होंने आधुनिक भारत का इतिहास औपनिवेशिक और मार्क्सवादी विचारों की इन दोनों धाराओ से अलग राह बनाई । ऐसे निश्चल, जुझारू और उदारमना इतिहासकार को खो देना निश्चय ही एक बड़ी बौधिक क्षति है।

शनिवार, 15 नवंबर 2014

क्षणिकाएँ

दृष्टिपात इधर भी कर दॊ,
मैं यू ही कुम्हला क्यूँ जाऊँ ?
रूप अपना निहार के मैं ,
खुद ही कब तक शरमाऊँ ।
तुमने देखा और सबने देखा
भेद कैसे बताऊँ ?
आखियाँ फेरैगो जिधर भी ,
उधर उधर ही मंडराऊ ।

गुरुवार, 6 नवंबर 2014

दो आयामी दृष्टि - दोष

कुंजी विषय : वैश्विक स्तर की दो खबरें, भारत में कमजोर साइबर लॉ, आँखों की अभिवक्ति क्षमता और अभिवक्ति के सामान्य विषय, कवि बिहारी की पंक्तियाँ, नयनाभिराम के उपेक्षित स्त्रोत।

कुंजी विषयों से क्या लगता है क्या बात होगी ? वही कोई उलटी सीधी सी, मगर झन्नाटेदार। विगत दिनों नवीन तकनीकों पर आधारित दो खबरों को पढ़ने का अवसर मिला जिसमें से पहली खबर में बताया गया था की जल्दी ही इन्सान मष्तिस्क में विचारो को उत्पन्न करके एवं अभिलक्षित व्यक्ति तक तरंगो के माध्यम से संप्रेषित कर वार्तालाप कर सकेगा ,यानि की अब गूँगा भी गुड़ का स्वाद बता सकेगा । दूसरी खबर साइबर क्राइम से जुड़ी हुई थी जिसमें विकसित देशों में इंटरनेट की सहायता से हत्या की जाने सकने की सम्भावना पर चिंता व्यक्त की गई थी और इस सम्बन्ध में साइबर लॉ की कमी को भी उल्लेखित किया गया था ।
  भारत में भी साइबर लॉ समकालीन अपराधो पर लगाम लगा सकने में असमर्थ रहा है । साइबर लॉ की कमजोरी और नयनाभिराम के उपेक्षित स्त्रोतों का युवाओं के बीच ख्याति घोर चिंता का विषय है । और आज की दिन तक सरकार का रवैया जस का तस बना हुआ है ।
  इन्टरनेट पर आसानी से प्राप्य किन्हीं अर्थों में अश्लील दृश्य द्रव्यों ने न केवल आज के युवा के मन को गन्दा किया है अपितु उसकी आत्मा के अधोपतन का कारण भी रहा है । आँखे आत्मा का द्वार है, इन कदाचित नयनाभिराम के उपेक्षित स्त्रोतों ने आँखों की अभिव्यक्ति क्षमता को गलत तरीके से बढ़ा दिया है और अभिव्यक्ति के सामान्य विषयों को स्थिर रखते हुए उनके परिणामो को स्वयं के लिए एवं उससे ज्यादा दूसरो के जीवन के लिए खतरनाक बना दिया है ।
आँखों में गज़ब की बात होती है कवि ने कहा है नायक और नायिका लोगो से भरे भवन मे, एक दुसरे से दूर बैठे होने पर भी आँखों से बात कर रहे है ; "भरे भौनु मे करत है नयन सु हि बात "। आंखे वायर लेस कनेक्शन के जैसे है । पलकों का उठना-गिरना , आँखों की काली मोती का श्वेत सरोवर में मटकना सारे के सारे मनोभावों को सफलता पूर्वक व्यक्त कर सकने में सक्षम है। इसलिए ऐसा नहीं करना है ।
  एक अंतिम बात एक सर्वलोकप्रिय पुस्तक का कथन है जिस चीज़ के बारे में ज्यादा सोचेंगे उसी तरह की चीजों से ही आप घिर जायेंगे ।
  इतना सब तो उस बात को समझने के लिए लिखा गया है जो अब कहने वाला हूँ की यदि मात्र आँखों से घूर कर किसी छोटे से बच्चे को रुलाया जा सकता है तो इसकी पूरी संभावना बनती है कि किसी को  आत्महत्या के लिए भी मजबूर किया जा सकता है । और तर्क भी दिए जायेंगे - की मैं तो ताजमहल को देख रहा था , उसके सामने कौन खड़ा था इससे मुझे क्या, मैं भला किसी और को क्यूँ देखूँगा ? भरोसा नहीं हो रहा न , मुझे भी नहीं हुआ था जब मैंने पूर्व वर्णित दोनो ही खबरों को पढ़ा था ।

बुधवार, 5 नवंबर 2014

थी राख बची और रक्त बहा ।

थी राख बची और रक्त बहा ।
करूँ लाख जतन ,
पर कह न सकूँ , मैं वो कथा ।
जिसमें था अतीत में तीत घुला ।
जिसमें थी राख बची और रक्त बहा ।

मैं तो भूल चुका था ,
जब देखा तुमको याद किया ।
देवी ! पर तुम न वो क्षण याद करो ।
मुझको अब तो माफ़ करों।

तब जली, मेरे कारण
अब कारण मैं होऊँ, मैं नहीं चाहता ।
इतने पर भी यही चाहता ।
समझो ! हो अंत कथा का ,
वैसा ही ,
जैसा कभी हुआ था ।
जिसमें थी राख बची और रक्त बहा ।

देवी विस्मय में , उत्तर की आस में पूछा ?
कहो न तुम दीर्घ कथा , बता दो बस इतना ।
हे आर्यपुत्र ! तुमने आज भी मुझको कैसे पहचाना ?
ये प्रेम ही है न , नहीं ये छल ,
क्यों स्वप्न तुम्हें ही आया ?
हे देवी ! यह अविरल कृपा युगल किशोर की
क्या होता है ?
जो बलिदान का फल पहले मैं चख पाया ।
आखिर याद करों ,
पहले तुमने ज्वाला को अपनाया।
फिर था मेरा शीश कटा ।
और तब ज्वाला ने था तुमको अपनाया।
उतने पर भी जो मुझमे प्राण बचे थे।
उनकी आड़ में ,
तुम्हारी काया को प्रकाशित होते देखा था।
आज भी जब वही स्वर्ण रूप आँखों में आया,
तो पहचान लिया ।

और कथा को याद किया ।
जिसमें थी राख बची और रक्त बहा ।