" वे बड़े इतिहासकार और दूर दृष्टा तो थे ही, कुशल प्रशासक भी थे। नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने इतिहास और समाजविज्ञान की अनेक दुर्लभ और महत्वपूर्ण पुस्तकों का अनुवाद और प्रकाशन कराया। खासकर प्रवासी इतिहासकारों की पुस्तको को भारतीय भाषाओ में लाना उनका महत्वपूर्ण योगदान है ।"
अनुमान लगाइए ! लगाइए ! उपरोक्त बातें किसके सम्बन्ध में कही गई होगी ? मगर हमेशा की तरह इस बार भी इतने से में बात खत्म होने वाली नहीं है; ये तो महज शुरुआती मानसिक कसरत है और कही जाने वाली बात की प्रमाणिकता की तलाश भी ।
(1)
जयों का त्यों अपना लेने में क्या मजा है? जैसे चावल और गेहूँ को क्रमशः भात और रोटी में बदले बगैर खाने की आदत जब हमने खो दी है तो शेष विषयों में भी उसी आदत को क्यों न पा ले ? कही गई बात को निरपेक्ष मानने पर भी उसके एक से अधिक अर्थ और अभिप्राय तो निकाले ही जा सकते है; उदाहरणार्थ चिकित्सा पर्यटन की अवधारणा हमेशा से विद्यमान थी और किसी भी आयाम से अविश्वसनीय भी नहीं । मात्र जरुरत सही दृष्टिकोण और पहचान की थी। चीजों को देखने के कई तरीके होते हैं इसीलिए रुढ़िवादी हुए बगैर हर तरह से किये गए विश्लेषण को अपना सकने जितना लचीलापन हमारे स्वाभाव में होना चाहिए। जिस रंग का चश्मा पहनेगें दुनिया उसी रंग में रंग जाएगी । हमे न तो नितांत सैधांतिक और न ही नितांत व्यवहारिक होने की जरूरत है । महान विचारकों ने दोनी के ही सम्बन्ध में पर्याप्त कहा है । सैधांतिक शिक्षा के लिए कहा गया है की " There is nothing more practical than a good theory ."
(2)
इतिहास बीता हुआ जरुर हो सकता है मगर समय में परिवर्तन के गुण के कारण पुनः घटित होने वाला प्रतीत तो होता ही है। कमरे का चौकोर आकार छुपे हुए रूप में ही सही अपने अंदर सभी धारणीय वस्तुओं में अपने चौकोरपन का प्रक्षेपण कर देता है; कमरे के अंदर की टेबल और पलंग , पन्ने और किताब चौकोर है। इतिहास में भविष्य की कल्पना होती है, आगामी समस्याओं का हल और कारण-परिणाम: परिणामों के कारण होते है। कुल मिलाकर सीखने के लिए बहुत कुछ, बदलने के लिए कुछ भी नहीं मगर भविष्य को बदल देने की प्रेरणा होती है ।
(3)
जार्ज बर्नार्ड शॉ के शब्दों में " मै इतिहास को अंत: प्रज्ञा से जानता हूँ फिर लिखता हूँ और उसके बाद इतिहास को पढ़ता हूँ और पाता हूँ मैंने सही लिखा था । इस बात की अगली कड़ी ये हो सकती है कि " मैं भविष्य को अंत: प्रज्ञा से जानता हूँ, फिर कहता हूँ और सब देखते है जो मैंने कहा था बिलकुल वही हुआ।" उदाहरणार्थ: प्रथम विश्व युद्ध के परिणामों का सतर्क विश्लेषण द्वितीय विश्व युद्ध की सम्भावना को दर्शता था; तत्कालीन विद्वानों ने तो यहाँ तक कहा कि ये 20 वर्षों का युद्ध विराम मात्र है । मगर दूसरे कथन में अंत: प्रज्ञा इतिहास जनित है जबकि पहले कथन की अंत: प्रज्ञा का ठीक-ठाक आधार सामान्य समझ हो सकती है ।
(4)
सर्वप्रथम वर्णित कथन विपिन चन्द्र के सम्बन्ध में है। विपिन चन्द्र का मानना था की इतिहास प्रगतिशील विचारों का प्रसार का सशक्त माध्यम हो सकता है। उन्होंने आधुनिक भारत का इतिहास औपनिवेशिक और मार्क्सवादी विचारों की इन दोनों धाराओ से अलग राह बनाई । ऐसे निश्चल, जुझारू और उदारमना इतिहासकार को खो देना निश्चय ही एक बड़ी बौधिक क्षति है।
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