शनिवार, 6 दिसंबर 2014

आशुओ के बादलो में

क्यूँ ऐसी हो ?
की तुम्हारे लिए और बदले भी
मैं ही रोया ।
दर्द भी मैंने दिया
और मैं ही रोया ।
यही तो बदलना है।
तुम में सब है ,
तभी तो मैं पास आने से हर बार कतराया ।
कभी भी दिल में ,
हमेशा के लिए नहीं समाया ।
तेरी यादों से तुझको बनाया ।
सबने मिट्टी से मूर्ती बनाई ।
मैंने तुझे अपने आशुओ से बनाया ।
एक बूंद आशू मेरे ,
मेरे स्टडी पैड पर मेरे नोट्स के साथ,
कितनो को नोट्स ने सोखा ।
एक जो खुद से बच गया ।
वाष्पित हो कर ,
मुझसे तुझ तक पहुचने के लिए ,
मैंने इस विश्वास में ,
आशुओ के बादलो में अपनी ,
संवेदनाओ से विदा लिया ।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें