शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

रोऊँगा अब नहीं एकांत में जाकर

मैं क्यूँ कुछ कठिन कहूँ,
या छुपाऊँ पीड़ा छाती की ।
सामाजिक हूँ ।
पीड़ा को स्वीकार कर,
जिसे समाज ने नहीं दिया ।
मैं ने सबके लिए स्वयं को,
सर्व सदा उपलब्ध किया ।
तो क्यूँ छुपकर व्यक्त करू ,
वेदना सहू अपनी और सबकी,
पर अब नहीं एकांत में जाकर,
रोऊँगा समाज में,
और सुनना होगा सभी को मुझे ,
चाहे ऊब ही हो जाये ,
आकस्मिक मुझको पाकर।
जानकर नहीं, यू ही किसी को रुलाकर ।
मैं ने सब को अपना दर्द सुनाने को ,
सर दर्द लिया ,
पाला पोशा बढ़ा किया ।
अब इसका पान करूँगा,
सिर्फ मैं,
पर रोऊंगा अब नहीं एकांत में जाकर ।

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