बुधवार, 19 नवंबर 2014

ये फूल जूठा है ।

ये फूल जूठा है ।
इसकी सुन्दरता और सुगंध झूठी है ।
पता नहीं, ये किसका है ?
इस पर किस-किस ने अधिकार किया ।
क्या तुमने सोचा,
क्यूँ सोचा तक नहीं ?
बस उठा लिया,
निस्तेज सुमन को पाकर भी,
क्या पा लिया ?
मिट जाने तक रंग, रूप और सुगंध,
ये बँटता जाता है।
पर कभी अपना हिस्सा मत माँगना,
जो मन से भी मांग लिया,
अधिकार किया,
कुछ ने सच में बलवश छीना ।
क्या पाया ?
ज्यादा बहुत ज्यादा,
अपना सब कुछ खो दिया ।
ये फूल झूठा है ।
जो जान गया,
क्या पाया ?
क्या बचा लिया ?

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