ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
शनिवार, 15 नवंबर 2014
क्षणिकाएँ
दृष्टिपात इधर भी कर दॊ,
मैं यू ही कुम्हला क्यूँ जाऊँ ?
रूप अपना निहार के मैं ,
खुद ही कब तक शरमाऊँ ।
तुमने देखा और सबने देखा
भेद कैसे बताऊँ ?
आखियाँ फेरैगो जिधर भी ,
उधर उधर ही मंडराऊ ।
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