कुंजी विषय : वैश्विक स्तर की दो खबरें, भारत में कमजोर साइबर लॉ, आँखों की अभिवक्ति क्षमता और अभिवक्ति के सामान्य विषय, कवि बिहारी की पंक्तियाँ, नयनाभिराम के उपेक्षित स्त्रोत।
कुंजी विषयों से क्या लगता है क्या बात होगी ? वही कोई उलटी सीधी सी, मगर झन्नाटेदार। विगत दिनों नवीन तकनीकों पर आधारित दो खबरों को पढ़ने का अवसर मिला जिसमें से पहली खबर में बताया गया था की जल्दी ही इन्सान मष्तिस्क में विचारो को उत्पन्न करके एवं अभिलक्षित व्यक्ति तक तरंगो के माध्यम से संप्रेषित कर वार्तालाप कर सकेगा ,यानि की अब गूँगा भी गुड़ का स्वाद बता सकेगा । दूसरी खबर साइबर क्राइम से जुड़ी हुई थी जिसमें विकसित देशों में इंटरनेट की सहायता से हत्या की जाने सकने की सम्भावना पर चिंता व्यक्त की गई थी और इस सम्बन्ध में साइबर लॉ की कमी को भी उल्लेखित किया गया था ।
भारत में भी साइबर लॉ समकालीन अपराधो पर लगाम लगा सकने में असमर्थ रहा है । साइबर लॉ की कमजोरी और नयनाभिराम के उपेक्षित स्त्रोतों का युवाओं के बीच ख्याति घोर चिंता का विषय है । और आज की दिन तक सरकार का रवैया जस का तस बना हुआ है ।
इन्टरनेट पर आसानी से प्राप्य किन्हीं अर्थों में अश्लील दृश्य द्रव्यों ने न केवल आज के युवा के मन को गन्दा किया है अपितु उसकी आत्मा के अधोपतन का कारण भी रहा है । आँखे आत्मा का द्वार है, इन कदाचित नयनाभिराम के उपेक्षित स्त्रोतों ने आँखों की अभिव्यक्ति क्षमता को गलत तरीके से बढ़ा दिया है और अभिव्यक्ति के सामान्य विषयों को स्थिर रखते हुए उनके परिणामो को स्वयं के लिए एवं उससे ज्यादा दूसरो के जीवन के लिए खतरनाक बना दिया है ।
आँखों में गज़ब की बात होती है कवि ने कहा है नायक और नायिका लोगो से भरे भवन मे, एक दुसरे से दूर बैठे होने पर भी आँखों से बात कर रहे है ; "भरे भौनु मे करत है नयन सु हि बात "। आंखे वायर लेस कनेक्शन के जैसे है । पलकों का उठना-गिरना , आँखों की काली मोती का श्वेत सरोवर में मटकना सारे के सारे मनोभावों को सफलता पूर्वक व्यक्त कर सकने में सक्षम है। इसलिए ऐसा नहीं करना है ।
एक अंतिम बात एक सर्वलोकप्रिय पुस्तक का कथन है जिस चीज़ के बारे में ज्यादा सोचेंगे उसी तरह की चीजों से ही आप घिर जायेंगे ।
इतना सब तो उस बात को समझने के लिए लिखा गया है जो अब कहने वाला हूँ की यदि मात्र आँखों से घूर कर किसी छोटे से बच्चे को रुलाया जा सकता है तो इसकी पूरी संभावना बनती है कि किसी को आत्महत्या के लिए भी मजबूर किया जा सकता है । और तर्क भी दिए जायेंगे - की मैं तो ताजमहल को देख रहा था , उसके सामने कौन खड़ा था इससे मुझे क्या, मैं भला किसी और को क्यूँ देखूँगा ? भरोसा नहीं हो रहा न , मुझे भी नहीं हुआ था जब मैंने पूर्व वर्णित दोनो ही खबरों को पढ़ा था ।
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