अब जब कि मनुष्य होने की सीमा कुछ हद तक खिंच गई है तो क्यों न इसे और स्पष्ट किया जाये । इस स्पष्टीकरण की प्रक्रिया में बुद्ध, महावीर, सुकरात, प्लूटो, अरस्तु, अरिस्टिपस, चर्वाक, सेरेनैक, स्टोइक, स्पेंसर, कांट, मिल, बेंथम, गांधी, टॉलस्टॉय आदि ने अपनी बारी आने पर योगदान दिया । ऐसे प्रयासों से थोड़ा-थोड़ा करके नैतिकता के प्रतिमान ईंट दर ईट जुड़ते गए और आज की आँखों से अतीत के इस प्रकल्प को देखने पर बोझा भर किताबें, परम्पराएँ, सीख, नियम, बंदिशे, कर्मकांड आदि दिखते हैं । ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016
सुखों का परित्याग
अब जब कि मनुष्य होने की सीमा कुछ हद तक खिंच गई है तो क्यों न इसे और स्पष्ट किया जाये । इस स्पष्टीकरण की प्रक्रिया में बुद्ध, महावीर, सुकरात, प्लूटो, अरस्तु, अरिस्टिपस, चर्वाक, सेरेनैक, स्टोइक, स्पेंसर, कांट, मिल, बेंथम, गांधी, टॉलस्टॉय आदि ने अपनी बारी आने पर योगदान दिया । ऐसे प्रयासों से थोड़ा-थोड़ा करके नैतिकता के प्रतिमान ईंट दर ईट जुड़ते गए और आज की आँखों से अतीत के इस प्रकल्प को देखने पर बोझा भर किताबें, परम्पराएँ, सीख, नियम, बंदिशे, कर्मकांड आदि दिखते हैं । गुरुवार, 17 नवंबर 2016
मेरे आसपास
शहरों के बसने की,
एक शर्त क्या हैं ?
यही तो है न,
कि घर के घर टूटते जाये ।
क्योंकि,
आधुनिकीकरण का प्रसिद्ध मुहावरा है ।
नौकरी करें, कमाए और खाय ।
ऐसे में
घरों के आकार घट रहे हैं ।
कुछ ही एक दम बहुत बड़े बचे हैं ।
अन्यथा,
डिब्बे के डिब्बे ताजा इंसान सड़ रहे हैं।
तो,
आज घर क्या हैं मात्र ?
एक या दो कमाने वाले हैं,
एक पकाने वाला है ।
चार खाने वाले जहाँ हैं ।
और घरों में बाहर से आयात,
हो रही है सेंसर्ड आवाजें ।
टी.वी है, मोबाईल है ।
लेकिन जब सब बंद है रात में।
तब सुनों,
सड़क में रगड़ खाते ट्रक के पहियों की आवाज ।
पटरी पर दौड़ती रेल गाड़ी का मद्धिम शोर,
घर के शांत कोनों में,
चूहों और छिपकलियों की खिट-पिट।
या एकदम भोर में सुने,
कपड़ों में इस्त्री करते हुए,
हाथों की चूड़ियों की खनखनाहट।
पानी में भीगे,
पानी के लिए हड़बड़ाए पैरों से आती
चप्पलों की चूँ- चूँ की आवाज।
खाली बाल्टियों की पहली गपशप ।
भरी बाल्टियों से पानी का छलकना,
न्यूज़पेपर का गिरना ।
बाहर तो बमुश्किल कभी-कभी,
यहाँ तो घर में भी,
धीमी धुनें कम ही सुनाई देती है ।
या तो रात में,
या एक दम भोर में,
या जब दमित मन चिल्ला रहा हो ।
पूरे जोर में ।
सोमवार, 14 नवंबर 2016
पूछोगे नहीं किसका ?
सुख में कैसे आनन्द हो सकता है ?
मुझे समझाओं,
खीर खाने तक,
मुँह मीठा रहता हैं ।
खिलौने के लिए बच्चा रोता हैं ।
दूसरे पल ही तोड़कर,
हँसता है ।
शाश्वत मिलन में ,
किसी सम्बन्ध की निष्ठा की
कैसी परीक्षा हो सकती है ?
ये मन तो,
वियोग की कामना में रमता हैं ।
रुक-रुक कर सीने में,
वेदना उठती है ।
मन घुटने टेककर निहत्था होता है जब,
तब शूलों से खरोंच के,
स्याही लाता हूँ ।
और मिलन की कटु यादों,
को लिखता जाता हूँ ।
मुझे समझाओं,
सुख में कैसे आनन्द हो सकता है ?
जो मिलता है,
वो खोता है ।
हंसने वाला,
रोता हैं ,
देख-देख कर मन के भीतर जो होता हैं ।
जब-जब जोर-जोर से,
हंसने वाला रोता है ।
नियति के चक्कर में पड़कर ।
मन को घायल करने को,
आमादा पागल,
चाले रच-रच चलता हैं ।
रोज बिछुड़ता है मिलने को,
मिलता है बिछुड़ने को,
कुछ भी कह लो,
दिल तो टूट ही गया ।
पूँछोगे नहीं किसका ?
पागल की प्रेमिका का ।
शनिवार, 12 नवंबर 2016
सच की समझ
सच जानने के लिए ,
दुःख , पीड़ा और त्याग,
मिलके आग से देखो,
सब है राख ।
रेत में अंगुलियां फेरते थे ।
जो कभी गीली मिट्टी को ,
अँगुलियों का स्पर्श हो गया ।
क्या बन गया ?
ये क्या बना दिया ?
जैसा न पहले कभी किसी ने देखा था ।
केवल कुछ की सोच में आया होगा ।
इसी के जैसा कुछ मिलता जुलता ,
मगर ये नहीं ।
व्यवस्था में मत ढलो ।
लड़ो, भोगों, बदल सको ,
तो बदलों ,
मत भागों ,
जीवन सीमित है ।
मन का है तो भी,
मन का नहीं है तो भी ,
नहीं पता पहले क्या था ।
आगे नहीं पता क्या होगा ?
जब जीवन नहीं होगा ,
मैं नहीं होगा ।
किस-किस के लिए ,
मगर मरने के बाद,
खुद के लिए खुद का ,
क्या होता है ?
मरने के बाद क्या कभी ,
किसी ने देखा ,
मरने वाला रोता है ?
जेब भरती है ,
जेब से पेट भरता ,
फिर बुद्धि मोटी होती है ।
आकांक्षाएँ दुहराने लगती है ।
लोग अपना बोया काटने से डरने लगते है ।
नैसर्गिक मौत के आने से पहले ,
लाइन लगा के पैसे देकर ,
मरने लगते है ।
एक नहीं, दो
मैं जीतते जी दो हो गया,
उसकी क्या हस्ती ?
जो खुद में बँट गया ।
एक तुम्हारा एक तुम्हारे लिए ,
एक डरपोक एक साहसी,
एक उच्छङ्खल एक शांत,
एक मैं और दूसरा भी मैं ही ।
फ़र्क़ इतना किसने बोया ?
इस तरह कपडे को किसने धोया ?
और फाड़ दिया ,
एक मुँह उठाता ,
एक को जीते जी गाड़ दिया ।
तुम्हारे लिए ,
सोमवार, 3 अक्टूबर 2016
क्षणिकाएं
सहने को,
कि कैसे निर्बल, निर्भर, निर्धन का
अहित सुनिश्चित न हो ।
सम्मान है
क्या नहीं है ?
और क्या चाहिए ?
पर क्या सोचा ?
उनके लिए कभी जिनके जीवन में,
लाइलाज मर्ज है,
नाम पर कर्ज है ।
गवाने को कुछ नहीं ,
कमाने को रोटी है ।
रहने को टिन की टपकती छत है,
और सर पर तपता सूरज है ।
संभलकर हँस,
इतने उलझे हुए मामलों में न फँस,
क्योंकि
बड़े होने के बाद ,
हालात एक से होते हैं ।
और ,
बड़ा हर बच्चा होता है ।
तकलीफ होती हैं ।
इसलिए कहता हूँ ।
तेरे बड़े होने पर ,
बड़ा मैं भी हो जाऊँगा ।
देख लेना तू ,
फिर हँसी न निकलेगी ,
फिर रोना न आएगा,
तब देखूँगा कैसी हँसी निकलती है ?
गुरु बना ले ,
क्या पहुँची चीज़ है ये,
हमारे बड़े होने भर में ,
ये भी बड़े हो गए ,
बखूबी ये ,
बाल अबोध मन को ,
समझ गए ।
शुक्रवार, 30 सितंबर 2016
चिठ्ठी : अंतःकरण से

शनिवार, 24 सितंबर 2016
ये क्या कर दिया ?
नहीं सहा गया ,
सो चुन लिया ।
एक को ,
छोड़ दिया एक को ।
विकल्पों के द्वंद्व में हमेशा ,
कभी इस पाले।
कभी उस पाले ।
लड़ने का काम तो था ।
जीने का काम तो था ।
मगर विकल्पों के द्वन्द्व का ,
समाधान न था ।
किसे न बोल देता ?
सब समझ के परे था ।
ये क्या कर दिया ?
फिर जान गवाने को ,
क्यों मना नहीं कर दिया ?
प्रतीक्षा के प्रत्युत्तर में
मौन से प्रहार किया ।
कितनी आसानी से कर्तव्य के
स्तरीकरण की पहेली को
बूझ लिया ।
क्या आज पीछे हट नहीं सकता ?
घर फ़ोन करना था आज ,
क्या एक बार फ़ोन नहीं कर सकता ?
सामने से चल रही गोलियों को ,
रोकने का काम कल तक नहीं टाला जा सकता ?
मेरे असहाय परिवार के लिए,
क्या दुश्मनों को थोड़ा कब्ज़ा नहीं दे सकता ?
मैं अपनी जान के बदले ,
अपने कुँवारे अनाथ साथी को ,
नहीं मरवा सकता ?
क्या मैं भाग नहीं सकता ?
समय कम है ।
और उत्तर देने नहीं चुनने है ।
इसलिए मर सकता हूँ ,
घर फ़ोन कर नहीं सकता ।
पर पिछले महीने तो किया था ।
इसलिए मर सकता हूँ ।
गोलियों को मुझसे अच्छा कौन रोक सकता है ?
इसलिए मैं मर सकता हूँ ।
मेरा परिवार असहाय है ,
पर मैं गद्दार, कमजोर और नालायक नहीं ,
इसलिए मैं मर सकता हूँ ।
मुझसे पहले मेरा कोई साथी जान दे ,
ये नहीं हो सकता ,
मैं भाग कर यहाँ आया हूँ,
यहाँ से भागने नहीं ,
इसलिए मर सकता हूँ ।
हर जवान वर्दी में ,
बिना वर्दी के ,
बंदूक के साथ ,
बिना बन्दूक के खाली हाथ ,
सवाल हल कर रहे होते हैं ।
जान देना ,
सिर्फ मर जाना नहीं है ।
तौला हुआ फैसला है ।
सोचा हुआ फैसला है ।
जाँच परखा हुआ फैसला है ।
जो,
दिमाग और आत्मा में ,
गहराई तक धँसा हुआ है ।
जो बदलने वाला नहीं है ।
सिर्फ सुपुर्दे खाक हो जाना नहीं है ।
उनके लिए जो मरने के पहले सोचते हैं ,
और जो नहीं सोचते ।
वो आत्मनिर्णय है ।
जिसमें हानि-लाभ,
शुभ-अशुभ को ध्यान में रखकर ,
सर्वकालिक नैतिक शुभ के लिए ,
लिया गया ।
केवल घर के लिए ।
इतना सोच कर भी ।
शनिवार, 17 सितंबर 2016
अपनी असफलता को देखना !!!
गुरुवार, 8 सितंबर 2016
इंद्रधनुष
एक कोना भारत का,
कुछ उठा-सा हुआ ।
श्रृंखलाएं पर्वत की,
इन श्रृंखलाओ के ऊपर,
रंग बिरंगा इंद्र धनुष बना ।
खेत में खड़े किसान की आँखों,
की पुतलियों के भीतर झलकती परछाई में ।
मजदूर के कारखाने की चिमनियों,
के धुएं में ।
बाबू के लिए ।
बड़े बाबू के लिए ,
अफसर के लिए ,
और अफसर के भी सर के लिए ,
और उनके चेलो चापलूसों के लिए ।
ढलुआ टेड़े मेढे रास्तों ,
के किनारे बने किसी घर ,
कि नई दुल्हन के लिए ।
महीन कारीगरी से तराशे गए ,
मेज और कुर्सियों से भरे किताब घर ,
में बैठी हुयी नवयुवती के लिए ।
के लिए ।
स्कूल जाते बच्चों के लिए ,
घाटी के नवजवानों के लिए ,
वृधो के लिए ।
जवान के लिए ,
इंसान के लिए ।
घाटी के हर बाशिंदे के लिए ,
अंगीठी को बुझाते हुए ,
थकी आँखों से ,
सूजी हुयी आँखों से ,
हस्ती हुयी आँखों से ,
रोती हुयी आँखों से ,
किसी मंदिर से ,
किसी मस्जिद से ,
किसी गुरुद्वारे से ,
किसी गिरजाघर से ,
किसी इबादत खाने से ,
भगवान के घर से ,
इन श्रृंखलाओ के ऊपर ,
रंग बिरंगे इंद्र धनुष के मायने ,
सब के लिए एक नहीं है ।
देख सकने की क्षमता ,
सब में नहीं है ।
कुछ के लिए ये बेरंग है ।
या एक रंगी है ।
सभी ने इसमें से अपने निकट का रंग चुना है ।
सफ़ेद तो बिल्कुल गायब हो चुका है ।
घाटी में शांति के सफ़ेद रंग की कमी ।
की कहानी को आखिर किसने बुना है ?
मजदूरों ने देखा ,
इंद्रधनुष में नया रंग काला ।
ये प्रकृति का चमत्कार था ,
उन्होंने इसके बनने का कारण जानना चाहा।
बच्चे भी उत्साह में थे ,
कुछ एक चौके हुए से ,
ध्यान से मास्टर जी की बातों को सब ने सुना ।
नवजवान मौसम की करवट को देख ,
नव उद्यम के लिए तैयार है ।
वृद्ध ने जीवन का आज एक और नया पाठ ,
इंद्रधनुष से भी सीखा ।
और मस्जिद से सारा हरा ,
पर भगवान ने तो सात रंगों को ,
आसमान में एक लाइन में पोता था ।
पर फिर ये कैसे ? एक रंगी हो गया ।
के लिए बलिदान होने की ठानी ।
इंद्रधनुष से कुछ न सीखने की ठानी ।
उनमें से कईयों को तो पता भी नहीं
कि उनकी घाटी में इंद्रधनुष बना था ,
वो अपनी दिमाग को ,
आँख को ,
चेहरे को ,
एक विशेष रंग में रंगने को पगलाये हुए है ।
घाटी के परिंदे और ,
घाटी के बाशिंदे ,
सभी ने बढ़िया मन से दिन को जिया ।
जिसने भी इंद्रधनुष को देखा ,
बस उसी का होकर रह गया ।
रविवार, 14 अगस्त 2016
द साइन्स ऑफ डिजायर्स : पार्ट वन
6) इच्छाओं कि उत्पत्ति और उनका बलवती होना लगभग एक अनुत्क्रमणीय प्रक्रिया है : इच्छाओं के निर्माण और उनका बलवान होना एक दिशा में जाने वाली प्रक्रिया है उसकी दिशा को पलटा नहीं जा सकता है।
7) इच्छाएँ इंद्रियों से जुड़ी हुयी होती हैं : इच्छाओं के इन्द्रियों से जुड़े होने से आशय इच्छाओं के उद्गम का स्थान बताना नहीं है। इच्छाएँ शरीर से भिन्न और मन के सहारे जीवित रहती है। मगर इच्छाएँ इन्द्रियों के सहारे शरीरी का भोग करती है। ज्यादा से ज्यादा इन्द्रियों से जुड़ी इच्छाएँ ज्यादा आनंद देती है। एक इंद्रि से जुड़ी इच्छा प्रायः दो या तीन इंद्री से जुड़ी इच्छा से ज्यादा बलवती और सुखदायक होती है। उदाहरणार्थ सूखे मुँह फिल्म देखने में और पॉपकॉर्न के साथ फिल्म देखने के फ़र्क़ को लेकर समझा जा सकता है।
रविवार, 19 जून 2016
जलवायु परिवर्तन : मेरे और आपके के लिए
शनिवार, 18 जून 2016
गिव एंड टेक : टू सिम्पल टु लर्न
रविवार, 15 मई 2016
मिसमैनेजड वीमेन एम्पावरमेंट :अ अपकमिंग थ्रेट
रविवार, 8 मई 2016
क्योंकि बच्चों ने देखा है माँ किस तरह पिता जी से बात करती है !!!!
मंगलवार, 19 अप्रैल 2016
लेटैस्ट ट्रेंड इन सोसाइटी : द पावर ऑफ मनी
रविवार, 17 अप्रैल 2016
अब समय आ गया है कि !!!
" मानवाधिकारों पर लेशमात्र भी आँच आने पर मानवाधिकार आयोग सक्रिय हो जाता है, होना भी चाहिए । क्योंकि मामला भी तो दुनिया के सबसे होनहार, समझदार दो पैरो वाले जीव से जो जुड़ा है । मगर मानवाधिकार अब आत्यंतिक रहने लायक बचे नहीं है क्योंकि मानव अब मानव बचा नहीं है। संविधान ने वो दौर भी देखा जब जमींदारी के लिए भारतीयों को दिए मानवाधिकारों पर प्रश्न उठे, तो अब भी कई नए प्रश्न उठे है । जब व्यक्ति स्वयं से नहीं समझ रहा तो अब कानून का सहारा लेना ही पड़ेगा । "
इसलिए कुत्ते को भोकने दे क्योंकि कुत्ते तब ज्यादा भोकते है जब वो अकेलापन महसूस करते है । उनकी भावनाओ को समझे और उनपर अत्याचार करना बंद करे। और देश मे पशुओ के अधिकार की मांग जायज है इसका समर्थन करे। जानवरो से ही दुनिया गुलजार है क्योंकि इंसान जानवर बन गया है और बेजुबान इंसान ही काम के है और वो कम रह गए है ।
रविवार, 10 अप्रैल 2016
यह एक सामान्य व्यवहार है !!!
सुअर धरती में रहने वाले,
कुछ होशियार जानवरो में से है।
यहाँ तक की उन कुत्तों और बिल्लियों से भी ज्यादा, जिनके साथ हम रहते हैं ।
डॉल्फ़िन और हाथियों की तरह,
सुअर समझते है कि दर्पण कैसे काम करता है ?
और उन्हें कुछ सरल वीडियो गेम,
खेलना भी आता है ।
जब रात में वो सोते है ,
तो उन्हें सपने आते हैं ।
और उसके बच्चे अपना नाम जानते है,
और उत्तर देते हैं, जब उन्हें पुकारा जाता है ।
कुत्तों की तरह ही,
सुअर भी वफादार और स्नेही होते हैं ।
उन्हें उनका पेट अच्छे से रगड़े जाना पसंद है ।
बाड़ भले ही उनके और बच्चों के लिए भयानक था ।
लेकिन इसने उनकी जान बचाई ।
एक फैक्ट्री फॉर्म में,
अपना जीवन,
एक छोटे से धातु के पिंजड़े में बिताते हैं।
जिसमेँ वो बड़ी मुश्किल से हिल डुल पाते हैं ।
वो ऐसे तंग परिस्थितियों में रखे जाते हैं,
जहाँ तनाव और मानसिक उतेजना की कमी
उनको पागल कर देती है ।
उनके बच्चे उनसे जन्म के बाद ही,
दूर कर दिए जाते हैं।
और बिना दर्द नाशक के ,
उन्हें बधिया बनाया जाता है।
और उनकी पूँछ भी काट दी जाती है।
वो बीमार होते, या
वो काफी तेजी से विकसित नहीं होते,
तो उनका सर ज़मीन पर पटक कर,
मर दिया जाता है ।
या उन्हें डिब्बे में फेंककर,
गैस देकर मर दिया जाता है।
यह सब आम है।
पुराने सुअरों के बच्चे गंदे बाड़े में ठूस दिए जाते हैं।
वो एक भी दिन बाहर नहीं बिताते हैं।
उन्होंने कभी भी अपनी पीठ पर,
सूरज को महसूस नहीं किया ।
और न ही अपने पैरों के नीचे घास को ।
सिर्फ छह महीने की उम्र में,
उन्हें परिवहन ट्रको में भरकर,
उनका वध करने वाले करखानों में,
उन्हें भेज दिया जाता है ।
जहाँ उन्हें उल्टा लटका कर रखा जाता है।
बिजली के चिमटे से छेद किया जाता है,
और गले को काट दिया जाता है ।
सभी फार्म सुअरों के साथ,
अविश्वसनीय क्रूरता के साथ पेश आते हैं।
यह एक सामान्य व्यवहार है ।
सोमवार, 4 अप्रैल 2016
अनगिनत छेद है ।
बीते सालों में,
ज्यादातर घर पर ही रहा ।
घर की अपनी महिमा होती है।
घर निजता प्रदान करते हैं,
और निजी मामले भी तैयार करते हैं।
जो हर मामले को,
निजी करके टालता हो,
उसे व्यक्तिगत विषयोँ पर टिप्पणियॉ,
कम ही मिलती है ।
समाज और व्यक्तिगत जीवन में,
कुछ तो अन्तर होना चाहिए,
और सारा जीवन ही,
व्यक्तिगत नहीं होना चाहिए।
जैसे दीवारों के कान होते है ।
वैसे ही घर की दीवारों में,
एक और भी बात होती है,
तोड़ने और जोड़ने की,
क्यों कि जब बात,
हद से ज्यादा बढ़ जाती है तो,
ये ऐसे ही समाज से हमें जोड़ती है ।
अब जब मौके आए है,
महसूस करने को कि,
क्या क्या गलत किया था, मैंने?
ताकि सुधार,
गलतियों के आदत में ,
तब्दील होने से पहले,
पहल हो जाए।
तो मालूम होता है कि ,
ऐसे दल-दल में फंसे हुए को देखकर,
जिंदगी कि नई सीख समझाईस यही है ।
कि अम्मा की हर बात का तपाक से ,
जवाब न देकर, मौन हो जाये ।
वैसे भी अपनी ग़लतियाँ खुद को कहाँ दिखती है ?
वो तो दूसरों में नुक्स और नखरे गिना रहे थे तो,
याद आया ऐसा तो कुछ हमारे पास भी है ।
मगर अब जब समझ ही गए है ।
तो बात को क्यों इतना घुमाना,
जो जब समझा सो तब सुधरा ।
