शुक्रवार, 9 दिसंबर 2016

सुखों का परित्याग

       
       बंदरों के मनुष्य बनने की कहानी में एक बात छुपी है । और वह बात यह है कि बंदरों ने न केवल अपने चलने के ढंग में बदलाव लाया बल्कि वे अब सीधे खड़े भी हो सकते थे । सीधी रीढ़ की हड्डी हमेशा से कुछ कमाल करने के लिए होती है । अब बन्दर सोच पा रहे थे कि चार पैरों के बजाय दो पैरो पर चलना बेहतर है; और बचे दो पैरों से कुछ नया किया जाये । ये सोचने की कला ही थी कि बंदर से मनुष्य का बदलाव एक बड़ा बदलाव बनकर रह गया । इसके बाद मनुष्य लंबे समय से मनुष्य ही है । 

         लेकिन प्रश्न ऐसे में उठना लाज़मी है कि मनुष्य होने का क्या अर्थ है ? वास्तव में मनुष्यता मानवता के ज्यादा नजदीक की चीज़ है या व्यक्तिवाद के । हम जब बहुत ध्यान से सोचते है तो व्यक्तिवादी हो जाते हैं लेकिन हमारा आखिरी लक्ष्य हमेशा मानवता के लिये जीने की आकांक्षा को समर्पित होता हैं । ऐसे में मार्क्स की बातें भी सच लगती है कि मनुष्य का 80 प्रतिशत तक संतोष स्वा को समर्पित हो सकता है लेकिन बाकि 20 प्रतिशत समाज का हित करने के बाद आता है । 


        अब जब कि मनुष्य होने की सीमा कुछ हद तक खिंच गई है तो क्यों न इसे और स्पष्ट किया जाये । इस स्पष्टीकरण की प्रक्रिया में बुद्ध, महावीर, सुकरात, प्लूटो, अरस्तु, अरिस्टिपस, चर्वाक, सेरेनैक, स्टोइक, स्पेंसर, कांट, मिल, बेंथम, गांधी, टॉलस्टॉय आदि ने अपनी बारी आने पर योगदान दिया । ऐसे प्रयासों से थोड़ा-थोड़ा करके नैतिकता के प्रतिमान ईंट दर ईट जुड़ते गए और आज की आँखों से अतीत के इस प्रकल्प को देखने पर बोझा भर किताबें, परम्पराएँ, सीख, नियम, बंदिशे, कर्मकांड आदि दिखते हैं । 


         इन्हीं सब नैतिकता के पूर्वजों के बीच एक संप्रदाय सिनिक का भी था । जैसे सब कह रहे थे इन्होंने ने भी कुछ कहने के लिए एक विचार की स्थापना के उद्देश्य से जीवन में मानवता के उद्भव के लिए परिवर्तन किये । ये सड़कों पर लोटते, दुःख का कारण ढूंढते । इन्हें ऐसा लग रहा था मानों वैराग्य की अवस्था जो कि इन्द्रियों के शिथिल हो जाने की अवस्था होती है, दुःख की मनः स्थिति के समतुल्य है । ये इस बात को साबित करने के लिए अपने समय में पगलाये हुए थे । 


        लेकिन इनके लिए मेरे पास एक जवाब है। जब इनके बारे में जाने बगैर मैं अपने अनुभव के आधार पर दुःख को नैतिकता के लिए आवश्यक मान बैठा था तब मुझे ये अंदाजा नहीं था कि दुःख वास्तव में सीमित और क्षणिक प्रकार की मनः स्थिति में ले जाकर छोड़ देगा । दुःख के साथ मन सुधरता है। दुःख मन को मांजता है और कुछ करने लायक बनाता भी है । लेकिन जो मैं कहता हूँ उस पर भरोसा कीजिये दुःख आपको कभी भी बड़ी देर तक संघर्ष करने लायक नहीं बना पाता है । अंततः आप देखते है कि यह निराशा तो पंचर नाँव के भाँति हो गयी है, और अपने लक्ष्य को पाने के लिए आप असीम आशा की ओर बढ़ते है । आप एकाएक यह समझ जाते हैं कि दुःख से एक निश्चित दूरी तक ही यात्रा की जा सकती है जैसे कि गाड़ी का तेल ही ख़त्म हो गया हो वैसे ही दुःख भी अब जीवन में अपना महत्त्व खो चुका है । दुःख गाड़ी को स्टार्ट करने के लिए पहले गियर का काम करता हैं; उसके बाद गियर बदलना होगा । 


         मैं यह पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि दुःख को जीवन में अपना जितना आप सम्भले है उससे ज्यादा आप जीवन में सुख को छोड़ कर संभल सकते हैं । शायद यदि सिनिको कि कोई मार्गदर्शिका होती तो उसका दूसरा अध्याय सुखों का परित्याग होता न कि पहले अध्याय दुखों के स्वांगिकरण का वृहद् पैमाने पर दोहराव । 


        मैं यह नहीं कहता कि मुझे दुखों के अपनाने के दौरान लाभ नहीं हुआ, लाभ हुआ है । लेकिन अब दुःख सर दर्द बन गए है और संतरे के ऐसे गुझ्झे के समान हो गए है जिनमें नैतिकता को पोषित करने लायक रस एकदम बचा ही न हो । इसलिए रणनीति को बदलना पड़ रहा है । और दुखों को अपनाने के बजाय सुखों को छोड़ने की रणनीति को वरीयता देना पड़ रहा है । जब आप कोई कठिन लक्ष्य साधना चाहते हैं तो आपकों उस स्तर के व्यक्तित्व का भी निर्माण करना होता हैं । ऐसे में एक दृढ़ इच्छा शक्ति की भी जरुरत होती है और एकाग्र मन की भी । ये तीनों एक सशक्त व्यक्तित्व, दृढ़ इच्छा शक्ति और एकाग्र मन केवल दुःख के स्वार्थपूर्ण स्वांगीकरण से नहीं आ सकता है। इसके लिए जीवन में सुखों का भी नियमन उतना ही अनिवार्य है ।
         

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

मेरे आसपास

शहरों के बसने की,
एक शर्त क्या हैं ?
यही तो है न,
कि घर के घर टूटते जाये ।
क्योंकि,
आधुनिकीकरण का प्रसिद्ध मुहावरा है ।
नौकरी करें, कमाए और खाय ।
ऐसे में
घरों के आकार घट रहे हैं ।
कुछ ही एक दम बहुत बड़े बचे हैं ।
अन्यथा,
डिब्बे के डिब्बे ताजा इंसान सड़ रहे हैं।
तो,
आज घर क्या हैं मात्र ?
एक या दो कमाने वाले हैं,
एक पकाने वाला है ।
चार खाने वाले जहाँ हैं ।

और घरों में बाहर से आयात,
हो रही है सेंसर्ड आवाजें ।
टी.वी है, मोबाईल है ।

लेकिन जब सब बंद है रात में।
तब सुनों,
सड़क में रगड़ खाते ट्रक के पहियों की आवाज ।
पटरी पर दौड़ती रेल गाड़ी का मद्धिम शोर,
घर के शांत कोनों में,
चूहों और छिपकलियों की खिट-पिट।

या एकदम भोर में सुने,
कपड़ों में इस्त्री करते हुए,
हाथों की चूड़ियों की खनखनाहट।
पानी में भीगे,
पानी के लिए हड़बड़ाए पैरों से आती
चप्पलों की चूँ- चूँ की आवाज।
खाली बाल्टियों की पहली गपशप ।
भरी बाल्टियों से पानी का छलकना,
न्यूज़पेपर का गिरना ।

बाहर तो बमुश्किल कभी-कभी,
यहाँ तो घर में भी,
धीमी धुनें कम ही सुनाई देती है ।
या तो रात में,
या एक दम भोर में,
या जब दमित मन चिल्ला रहा हो ।
पूरे जोर में ।

सोमवार, 14 नवंबर 2016

पूछोगे नहीं किसका ?

सुख में कैसे आनन्द हो सकता है ?
मुझे समझाओं,

खीर खाने तक,
मुँह मीठा रहता हैं ।
खिलौने के लिए बच्चा रोता हैं ।
दूसरे पल ही तोड़कर,
हँसता है ।
शाश्वत मिलन में ,
किसी सम्बन्ध की निष्ठा की
कैसी परीक्षा हो सकती है ?
ये मन तो,
वियोग की कामना में रमता हैं ।

रुक-रुक कर सीने में,
वेदना उठती है ।
मन घुटने टेककर निहत्था होता है जब,
तब शूलों से खरोंच के,
स्याही लाता हूँ ।
और मिलन की कटु यादों,
को लिखता जाता हूँ ।
मुझे समझाओं,
सुख में कैसे आनन्द हो सकता है ?
जो मिलता है,
वो खोता है ।
हंसने वाला,
रोता हैं ,
देख-देख कर मन के भीतर जो होता हैं ।

जब-जब जोर-जोर से,
हंसने वाला रोता है ।
नियति के चक्कर में पड़कर ।
मन को घायल करने को,
आमादा पागल,
चाले रच-रच चलता हैं ।
रोज बिछुड़ता है मिलने को,
मिलता है बिछुड़ने को, 
कुछ भी कह लो,  
दिल तो टूट ही गया ।

पूँछोगे नहीं किसका ?
पागल की प्रेमिका का ।

शनिवार, 12 नवंबर 2016

सच की समझ

सच जानने के लिए ,
दुःख , पीड़ा और त्याग,
मिलके आग से देखो,
सब है राख ।

रेत में अंगुलियां फेरते थे ।
जो कभी गीली मिट्टी को ,
अँगुलियों का स्पर्श हो गया ।
क्या बन गया ?
ये क्या बना दिया ?
जैसा न पहले कभी किसी ने देखा था ।
केवल कुछ की सोच में आया होगा ।
इसी के जैसा कुछ मिलता जुलता ,
मगर ये नहीं ।

व्यवस्था में मत ढलो ।
लड़ो, भोगों, बदल सको ,
तो बदलों ,
मत भागों ,
जीवन सीमित है ।
मन का है तो भी,
मन का नहीं है तो भी ,
नहीं पता पहले क्या था ।
आगे नहीं पता क्या होगा ?

जब जीवन नहीं होगा ,
मैं नहीं होगा ।
किस-किस के लिए ,
मगर मरने के बाद,
खुद के लिए खुद का ,
क्या होता है ?
मरने के बाद क्या कभी ,
किसी ने देखा ,
मरने वाला रोता है ?

जेब भरती है ,
जेब से पेट भरता ,
फिर बुद्धि मोटी होती है ।
आकांक्षाएँ दुहराने लगती है ।
लोग अपना बोया काटने से डरने लगते है ।
नैसर्गिक मौत के आने से पहले ,
लाइन लगा के पैसे देकर ,
मरने लगते है ।

एक नहीं, दो

मैं जीतते जी दो हो गया,
उसकी क्या हस्ती ?
जो खुद में बँट गया ।

एक तुम्हारा एक तुम्हारे लिए ,
एक डरपोक एक साहसी,
एक उच्छङ्खल एक शांत,
एक मैं और दूसरा भी मैं ही ।

फ़र्क़ इतना किसने बोया ?
इस तरह कपडे को किसने धोया ?
और फाड़ दिया ,
एक मुँह उठाता ,
एक को जीते जी गाड़ दिया ।
तुम्हारे लिए ,

सोमवार, 3 अक्टूबर 2016

क्षणिकाएं

समर्थ सक्षम है ।
जीवन जैसा है उसको वैसे ही ,
सहने को,
पर क्या कभी सोचा ?
कि कैसे निर्बल, निर्भर, निर्धन का
अहित सुनिश्चित न हो ।

ज्ञान है, धन है
सम्मान है
क्या नहीं है ?
और क्या चाहिए ?
पर क्या सोचा ?
उनके लिए कभी जिनके जीवन में,
लाइलाज मर्ज है,
नाम पर कर्ज है ।
गवाने को कुछ नहीं ,
कमाने को रोटी है ।
रहने को टिन की टपकती छत है,
और सर पर तपता सूरज है । 











***
सुन बच्चे !
संभलकर हँस,
इतने उलझे हुए मामलों में न फँस,
क्योंकि
बड़े होने के बाद ,
हालात एक से होते हैं ।
और ,
बड़ा हर बच्चा होता है ।

तेरे हँसने से ,
तकलीफ होती हैं ।
इसलिए कहता हूँ ।
तेरे बड़े होने पर ,
बड़ा मैं भी हो जाऊँगा ।
देख लेना तू ,
फिर हँसी न निकलेगी ,
फिर रोना न आएगा,
तब देखूँगा कैसी हँसी निकलती है ?

तब लगेगा इन महाशय को
गुरु बना ले ,
क्या पहुँची चीज़ है ये,
हमारे बड़े होने भर में ,
ये भी बड़े हो गए ,
बखूबी ये ,
बाल अबोध मन को ,
समझ गए ।

शुक्रवार, 30 सितंबर 2016

चिठ्ठी : अंतःकरण से


मेरे प्रिय साथियों ,

आज संघर्ष कहीं ज्यादा स्पष्ट है । इसमें जिनके मध्य प्रतिस्पर्धाएं हैं वे तुम्हारे संगी-साथी ही मात्र नहीं है । यह वर्चस्व, संसाधन, शक्ति और प्रतिष्ठा के लिए; कुछ के लिए कुछ के द्वारा रचा गया है । जो चिरकालीन-सा लगातार विभत्स होता जा रहा हैं । यह स्वाभाविक, भेदभावपूर्ण, विवादास्पद, कठिन और असंतुलित भी है । इसमें सभी के बराबर भागीदारी का स्पर्श तो है लेकिन ऐसा सचमुच में नहीं है। 

दुनिया में जितने ज्यादा दिन बचे रह जाओगे उतना अधिक इस बात को सच पाओगे कि संघर्ष को स्थगित करना मेरी सबसे बड़ी गलती थी । मुसीबतें, आकाँक्षाओं से बल लेती है और आकांक्षाएँ समय से बंधी हुयी है । हम समय से नहीं लड़ सकते ; केवल समय पर, समय के अनुकूल व्यवहार कर सकते हैं । 

यह विचार करने योग्य है कि संघर्ष के क्षण कितने कठिन हो सकते हैं ? और किसके-किसके लिए कठिन हो सकते हैं ? 

यह कैसे भी स्वयं से स्वयं की लड़ाई तक सीमित नहीं हैं । इसमें परिस्थितियों के मूल्यहीन होने का सवाल ही पैदा नहीं होता । यह अलग-अलग दशाओं के मध्य पले बढ़े नवजवानों का संघर्ष हैं । जिन खूबियों  पर वे इतराते हैं , वे कमियाँ जिनका वे रोना रोते है ; नतमस्तक से कमजोर कृशकाय से बर्ताव करते हैं और वे अभाव जिन्हें वे लिस्टगत करके अपनी बदहाली के मूल कारण मानकर जपते रहते हैं, उनके लिए और ऐसे रोने धोने वालों के लिए यहाँ कोई जगह नहीं हैं । 

यहाँ नाम मात्र को कुछेक वर्गगत सुविधायें है जो वर्गगत समस्याओं से घिरी हुयी है । इनमें भी सरकार की मैली नीतियों की छाप पड़ गयी है । जो कागजी तौर पर मैला धोने के बराबर हैं । 

यहाँ वे आगे खड़े हैं । सुविधा के भोगी है, जिनकी पूछ है समाज में । वे तुमसे ज्यादा खूबियों से भरे हुए हो सकते हैं और उनपर वे इतराते भी नहीं हैं । उनके पास कमियों को गिनने का समय नहीं रहा ,और ज्यादातर को उन्होंने पिछले ही सप्ताह निपटा लिया हैं । वे जन्म से अभाव के दंश से बचे हुए है और शायद बचे भी रह जायेंगे । और इन सब के बाद भी उनकी कहानी का यथार्थवाद सुखों के मध्य मंडराता रहता है ।

ऐसे में बहुत ज्यादा संकरी गली में चलने में की दशा में पिसना तो तय है । यह पिसने का हिस्सा हमारा है पर गली की दीवारों पर पोस्टर नहीं । 



संक्षेप में , ऐसे में एकदम बदलाव के इरादे से हम आगे नहीं बढ़ सकते । हमें योजनागत तरीके से परिस्थिति को समझ कर लक्ष्य बनाने होंगे । और कैसे भी करके उनकी हालत का ताज़ा और सटीक अंदाज़ा लगाकर उनसे आगे निकलना  होंगा। उनकी गतिविधियाँ झुण्ड के झंझट के जैसी है जिससे उलझे बिना उनसे आगे निकलना होगा। यही समय की जरुरत और हमारा नैतिक उतरदायित्व भी ।

शेष शुभ !!!

आपका अपना ,
postimage

शनिवार, 24 सितंबर 2016

ये क्या कर दिया ?

नहीं रहा गया ,
नहीं सहा गया ,
सो चुन लिया ।
एक को ,
छोड़ दिया एक को ।
विकल्पों के द्वंद्व में हमेशा ,
कभी इस पाले।
कभी उस पाले ।
लड़ने का काम तो था ।
जीने का काम तो था ।
मगर विकल्पों के द्वन्द्व का ,
समाधान न था ।
किसे छोड़ देता ?
किसे न बोल देता ?
सब समझ के परे था ।
ऐसे में,
ये क्या कर दिया ?

बोला था घर आने को ,
फिर जान गवाने को ,
क्यों मना नहीं कर दिया ?
प्रतीक्षा के प्रत्युत्तर में
मौन से प्रहार किया ।
कितनी आसानी से कर्तव्य के
स्तरीकरण की पहेली को
बूझ लिया ।

घर पैसा भेजना था आज ,
क्या आज पीछे हट नहीं सकता ?
घर फ़ोन करना था आज ,
क्या एक बार फ़ोन नहीं कर सकता ?
सामने से चल रही गोलियों को ,
रोकने का काम कल तक नहीं टाला जा सकता ?
मेरे असहाय परिवार के लिए,
क्या दुश्मनों को थोड़ा कब्ज़ा नहीं दे सकता ?
मैं अपनी जान के बदले ,
अपने कुँवारे अनाथ साथी को ,
नहीं मरवा सकता ?
क्या मैं भाग नहीं सकता ?

कितने सारे प्रश्न है ?
समय कम है ।
और उत्तर देने नहीं चुनने है ।
घर पैसे तो पहुँच ही जायेंगे ।
इसलिए मर सकता हूँ ,
घर फ़ोन कर नहीं सकता ।
पर पिछले महीने तो किया था ।
इसलिए मर सकता हूँ ।
गोलियों को मुझसे अच्छा कौन रोक सकता है ?
इसलिए मैं मर सकता हूँ ।
मेरा परिवार असहाय है ,
पर मैं गद्दार, कमजोर और नालायक नहीं ,
इसलिए मैं मर सकता हूँ ।
मुझसे पहले मेरा कोई साथी जान दे ,
ये नहीं हो सकता ,
मैं भाग कर यहाँ आया हूँ,
यहाँ से भागने नहीं ,
इसलिए मर सकता हूँ ।

हर बार ड्यूटी पे ,
हर जवान वर्दी में ,
बिना वर्दी के ,
बंदूक के साथ ,
बिना बन्दूक के खाली हाथ ,
सवाल हल कर रहे होते हैं ।
इसलिए,
जान देना ,
सिर्फ मर जाना नहीं है ।

ये अनुमानित फैसला है ।
तौला हुआ फैसला है ।
सोचा हुआ फैसला है ।
जाँच परखा हुआ फैसला है ।
जो,
दिमाग और आत्मा में ,
गहराई तक धँसा हुआ है ।
जो बदलने वाला नहीं है ।
इसलिए एक जवान का मर जाना ,
सिर्फ सुपुर्दे खाक हो जाना नहीं है ।
उनके लिए जो मरने के पहले सोचते हैं ,
और जो नहीं सोचते ।

यह त्वरित आवेग पूर्ण ,
वो आत्मनिर्णय है ।
जिसमें हानि-लाभ,
शुभ-अशुभ को ध्यान में रखकर ,
सर्वकालिक नैतिक शुभ के लिए ,
लिया गया ।

यह निर्णय बदलता नहीं ,
केवल घर के लिए ।
इतना सोच कर भी ।

शनिवार, 17 सितंबर 2016

अपनी असफलता को देखना !!!

क्यूँ ? अजीब सा शीर्षक है न । भला अपनी असफलता को कोई क्यों देखना चाहेगा ? और यही कारण है कि लोग असफलता के भय से पलायनवादी हो जाते हैं । लेकिन सच-मुच में जीवन के प्रबंधन का सुंदर-सा सूत्र है अपनी असफलता को देखना । मगर कैसे ? 

इस लेख में हम मुख्यतः इन्ही दो प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा करेंगे कि पहला , अपनी असफलता को देखना क्यों आवश्यक है ? और दूसरा ऐसा हम कैसे कर सकते है ? 


मुझे इस तरह के जीवन जीने की कला के माला के कुछ मोतियों से जब भी स्पर्श होता है मैं उन्हें आप सबसे बाँटने चला आता हूँ । इस लेख का श्रेय मैं उन हज़ारो लोगोँ को देना चाहूँगा जो फेल होने के लिए लड़ते है और अंततः साक्षी भाव से स्वयं का आत्म मूल्यांकन करके अपनी कमियों को दूर करते हैं । ये लोग सच-मुच के आम इंसान है जिन्होंने एक सच-मुच के गलत तरीके से शुरू करके सचमुच के सही तरीके से मन माफ़िक सफलता हासिल कि । ये लोग इतने आम और साधारण होते है कि इनकी शुरुआत बिलकुल कछुए की भांति धीमी और आंधी में उड़ते पत्तों की तरह दिशाहीन होती है । लेकिन इन लोगों में दिवार पर चढ़ने वाली मकड़ी की तरह बार-बार प्रयास करने की क्षमता भी होती है। बस यही वो बात है जो साधारण से झारखंडी को धोनी और एक बिहारी को मनोज बाजपेयी बना देती है। इसके आगे ये हाल उन सभी का होता है जो प्रतिस्पर्धा के भवर में फँस जाते हैं। ऐसे में हम भी कैसे जीरो से हीरो बन जाये यही तो सीखना है ? और यह लेख भी इसी उद्देश को लेकर अनसुलझे प्रश्नों का आम सी लगने वाली रोजमर्रा के अनुभव से हल खोजने का अथक प्रयास करता है। 

ऐसे में मुझे वह क्षण याद आता है जब मैं सिविल सर्विसेज की परीक्षा में पास हुए दो प्रतिभागियों के व्यूज यूट्यूब पर देख रहा था। उनमें से एक प्रतिभागी ने अपने आखिरी प्रयास अर्थात् छठवे प्रयास में उच्च पद प्राप्त किया और ऐसा ही कुछ दूसरे प्रतिभागी की भी सफलता का हाल था । परन्तु इन दोनों में एक और बात कॉमन थी । और वो बात ये थी कि दोनों ने अपने वक्तव्य के दौरान कहा कि हमने अपना पहला प्रयास यूँ ही हल्के में गवाँ दिया मगर दूसरे प्रयास में हमने जम कर मेहनत कि, पर फिर भी सिफर ही हाथ लगा ऐसे में यह जानना यहाँ रोचक होगा कि दूसरे प्रयास में दोनों ने अपने असफल होने की बात बताते हुए जो कहा वो बेहद शिक्षाप्रद और रोचक क्यों था ? और जो इस लेख का शीर्षक भी हैं । तो आप समझ ही गए होंगे कि उन्होंने क्या कहा - उन दोनों ने ही कहा कि हम पहले प्रयास की तुलना में अपनी असफलता को दुसरे प्रयास में ज्यादा करीब से देख पाये ।

 ऐसे में यहाँ पर अपने पहले प्रश्न को लेने का सही समय आ गया है कि अपनी असफलता को करीब से देखने का अर्थ क्या है ?

देखिये जीवन एक ही है और उसी में जीना भी है उसी में प्रयोग भी करना है। ऐसे में ये स्वाभाविक ही है कि या तो आपके पास या किसी के भी पास जीवन जीने के कुछ मूलभूत फ़ॉर्मूले होंगे। मगर जीवन गणित या भूगोल नहीं है जीवन पहेली है जिसे सुलझाना पड़ता है। यह एक मैट्रिक्स है। यह दर्शन की प्रयोगशाला है और कुछेक का पसंदीदा खेल भी। इसलिए हमेशा एक फ़ॉर्मूला बहुत काम का होता नहीं हैं । कठिन परिस्थितियों में बेहतर यही होता है कि हम कुछेक समस्याओं का हल रटने के बजाय अपनी प्रॉब्लम सोल्विंग स्किल्स को ही शार्प कर ले ताकि किसी भी रैंडम प्रॉब्लम को झट से सॉल्व कर सके। हम सभी इस तथ्य को जानते हैं की जब हम छोटे थे तो परीक्षा के लिए किंचित प्रश्न मात्र रट कर अंक ला लेते थे मगर हम जैसे बड़े हुए प्रश्नों को रटने के बजाय उस मूल अवधारणा या कांसेप्ट को समझने पर जोर देने लगे जिस पर बहुत सारे प्रश्न आधारित होते हैं। और इसप्रकार हम कम समय में ज्यादा सटीक तैयारी कर लेते हैं। लेकिन इसके आगे की स्थिति में जब हमारे कांसेप्ट भी किसी समस्या को हल करने में कमतर साबित हो तो एक मात्र रास्ता बचता हैं ट्रायल एंड एरर मेथड। अब तो आप सभी समझ ही गए होंगे की मेरा इशारा किस ओर हैं। हम जब भी कोई परीक्षा देते हैं तो उसे हमें एक ट्रायल की तरह लेना चाहिए और यदि हम असफल हो जाते हैं तो एरर को पहचान कर कुछ लिमिट्स और कंडीशन स्वयं ही तय कर लेनी चाहिए।  इसतरह हम कई तरह के फायदे मिलेंगे जैसे एक तो हमारी गलती की रेपितिसन बंद हो जाएगी और हम निरंतर स्वयं में सुधार कर पाएंगे। ऐसे में हम हो न हो एक दिन सफल भी जरुर हो जायेंगे। इसलिए हमारे दोनों सिविल सेवा के सफल अभ्यर्थियों ने अपने दोनों शुरूआती प्रयास में असफल होने के बाद भी यही कहा की हम अपनी असफलता को ज्यादा अच्छी प्रकार से देख पा रहे हैं।  

और हमारा दूसरा प्रश्न जो था की हम अपनी असफलता को कैसे देख सकते हैं अब उसपर भी लगे हाथ थोड़ी चर्चा कर लेते हैं।  जैसी ही हम इस बात को समझ जाते हैं कि असफलता को देखना क्यों जरुरी है हम स्वतः ही आत्म मूल्यांकन की प्रक्रिया से गुजरने लगते हैं और अपने दोषों को देख पाते हैं।  यह कोई राकेट साइंस नहीं हैं।  व्यक्ति को अपने आत्म मूल्यांकन के बाद हर उस कार्यविधि में परिवर्तन के लिए तत्पर होना होता है जिससे उसे लगता है उसने उसकी सफलता को उससे दूर कर दिया। ऐसे में केवल गधे की तरह मेहनत ही बस करना अनिवार्य नहीं होता बल्कि उसके साथ मेहनत को ज्यादा कारगर बनाने के लिए नित्य निरंतर नए तरीके भी अपनाने होते हैं ।  

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

इंद्रधनुष

हरी भरी धरा,
एक कोना भारत का,
कुछ उठा-सा हुआ ।

श्रृंखलाएं पर्वत की,
इन श्रृंखलाओ के ऊपर,
रंग बिरंगा इंद्र धनुष बना ।

किसी के घर की खिड़की से,
खेत में खड़े किसान की आँखों,
की पुतलियों के भीतर झलकती परछाई में ।
मजदूर के कारखाने की चिमनियों,
के धुएं में ।

दफ्तर में फाइलो के पन्ने पलटे ,
बाबू के लिए ।
बड़े बाबू के लिए ,
अफसर के लिए ,
और अफसर के भी सर के लिए ,
और उनके चेलो चापलूसों के लिए ।

बारिश से लबरेज तंग गलियों में,
ढलुआ टेड़े मेढे रास्तों ,
के किनारे बने किसी घर ,
कि नई दुल्हन के लिए ।
महीन कारीगरी से तराशे गए ,
मेज और कुर्सियों से भरे किताब घर ,
में बैठी हुयी नवयुवती के लिए ।

स्कूल जाती बच्चियों ,
के लिए ।
स्कूल जाते बच्चों के लिए ,
घाटी के नवजवानों के लिए ,
वृधो के लिए ।

घाटी के दहसतगर्द के लिए ,
जवान के लिए ,
इंसान के लिए ।

परिंदे के लिए ,
घाटी के हर बाशिंदे के लिए ,

सुबह-सुबह रात भर जलती ,
अंगीठी को बुझाते हुए ,
थकी आँखों से ,
सूजी हुयी आँखों से ,
हस्ती हुयी आँखों से ,
रोती हुयी आँखों से ,

किसी शमसान से ,
किसी मंदिर से ,
किसी  मस्जिद से ,
किसी गुरुद्वारे से ,
किसी गिरजाघर से ,
किसी इबादत खाने से ,
भगवान के घर से ,

श्रृंखलाएं पर्वत की ,
इन श्रृंखलाओ के ऊपर ,
रंग बिरंगे इंद्र धनुष के मायने ,
सब के लिए एक नहीं है ।
इंद्रधनुष के सारे रंगों को ,
देख सकने की क्षमता ,
सब में नहीं है ।
कुछ के लिए ये बेरंग है ।
या एक रंगी है ।

सभी ने इसमें से अपने निकट का रंग चुना है ।
सफ़ेद तो बिल्कुल गायब हो चुका है ।
घाटी में शांति के सफ़ेद रंग की कमी ।
की कहानी को आखिर किसने बुना है ?

किसान के लिए ये मौका ,
मौसम का हाल परखने का ।
मजदूरों ने देखा ,
इंद्रधनुष में नया रंग काला ।

स्कूल जाती बच्चियों के लिए ,
ये प्रकृति का चमत्कार था ,
उन्होंने इसके बनने का कारण जानना चाहा।
बच्चे भी उत्साह में थे ,
कुछ एक चौके हुए से ,
ध्यान से मास्टर जी की बातों को सब ने सुना ।

नवजवान मौसम की करवट को देख ,
नव उद्यम के लिए तैयार है ।
वृद्ध ने जीवन का आज एक और नया पाठ ,
इंद्रधनुष से भी सीखा ।

मगर घाटी का इंद्रधनुष मंदिर से सारा नारंगी है ।
और मस्जिद से सारा हरा ,
पर भगवान ने तो सात रंगों को ,
आसमान में एक लाइन में पोता था ।
पर फिर ये कैसे ? एक रंगी हो गया  ।

घाटी के जवान ने सातों रंगों ,
के लिए बलिदान होने की ठानी ।

मगर घाटी के दहसतगर्दों ने ,
इंद्रधनुष से कुछ न सीखने की ठानी ।
उनमें से कईयों को तो पता भी नहीं
कि उनकी घाटी में इंद्रधनुष बना था ,
वो अपनी दिमाग को ,
आँख को ,
चेहरे को ,
एक विशेष रंग में रंगने को पगलाये हुए है ।

इंद्रधनुष के मायने सब के लिए थे ।
घाटी के परिंदे और ,
घाटी के बाशिंदे ,
सभी ने बढ़िया मन से दिन को जिया ।
जिसने भी इंद्रधनुष को देखा ,
बस उसी का होकर रह गया ।






रविवार, 14 अगस्त 2016

द साइन्स ऑफ डिजायर्स : पार्ट वन

यह एक लेख शृंखला है। जिसके इस भाग में मानव मन से संबन्धित विषय की चर्चा की गई है। मनुष्य के जीवन में विजय का वास्तविक अर्थ स्वयं पर विजय से लगाया जाता है और स्वयं पर विजय अर्जित करने वाले को स्वामी कहते हैं जैसे स्वामी विवेकानंद । ऐसा हम अक्सर सुनते हैं कि यदि किसी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करनी है तो पहले स्वयं पर नियंत्रण करों। यहाँ स्वयं पर नियंत्रण से अर्थ अपनी अनावश्यक इच्छाओं पर नियंत्रण से है। जिसके लिए इच्छाओं का विज्ञान समझना जरूरी है । इच्छाओं के गुण-धर्मों को जानकार हम आत्मनियंत्रण के लक्ष्य को आसान बना सकते हैं । 

आगे इच्छाओं के कुछ समान्यतः प्रदर्शित होने वाले लक्षण दिये गए है। और इसके साथ ही उनका विस्तृत विवरण भी दिया गया है । ऐसे में इस जटिल विषय को समझने में सामने आने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए इस लेख का विस्तार अधिक हो जाने के कारण इसे एक लेख में न समेटकर एक लेख शृंखला के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है । यह लेख श्रृंखला का पहला भाग है जिसमें इच्छाओं के पहले सात गुणधर्मों की विस्तार से चर्चा की गई है। आप से अपेक्षा की जाती है कि आप निश्चय ही स्वा अनुभव से अधोलिखित बातों को आसानी से समझ पाएंगे। चूँकि विषय भिन्न प्रकार का है इसलिए किसी बिंदु पर शंका होने पर आपके सुझाव एवं राय सम्मानीय और ध्यात्व है जिस पर प्रत्युत्तर अवश्य दिया जायेगा। आप अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं। उम्मीद है ये लेख आपको बाकि लेखों की तरह पसंद आएगा और जीवन जीने की कला का एक नया पायदान आप झट से चढ़ जायेंगे।  

इच्छाओं के सामान्यतौर पर देखी जा सकने वाली विशेषताएँ निम्नलिखित है : 

1) मानवीय इच्छाएँ अनंत होती है । 
2) मानवीय इच्छाओं का एक निश्चित जीवन चक्र होता है ।
3) बड़ी इच्छा छोटी इच्छाओं का आच्छादन कर लेती है । 
4) मानवीय इच्छाओं कि उत्पत्ति बुद्धि को शिथिल कर देती है । 
5) इच्छाओं में बल होता हैं। 
6) इच्छाओं कि उत्पत्ति और उनका बलवती होना लगभग एक अनुत्क्रमणीय प्रक्रिया है । 
7) इच्छाएँ इंद्रियों से जुड़ी हुयी होती हैं । 
8) प्रायः एकल इंद्रि से संबन्धित इच्छा बहुल इंद्रि से संबन्धित इच्छा से कम प्रबल होती है। 
9) इच्छाओं कि संतुष्टि संभव है। 
10) इच्छाओं को नियंत्रित किया जा सकता है । 
11) इच्छाओं कि व्युत्पत्ति कि एक पृष्ठभूमि होती है । 
12) इच्छाएँ मानवीय आदत में तब्दील हो सकती है । 
13) इच्छाएँ विरोधाभाषी होती है । 
14) मानवीय इच्छाएँ प्रायः शुरू में सुखदायक और बाद में दुख दायक होती है आदि। 

हम एक-एक कर इच्छाओं कि उपरोक्त लिखित विशेषताओं को विस्तार से देखते हैं । इस भाग में हम शुरू कि विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे जबकि शेष पर चर्चा लेख के अगले भाग में किया जायेगा।  

1) मानवीय इच्छाएँ अनंत होती है : इसका अत्यन्त सरल-सा अर्थ है कि एक इच्छा के पूर्ति के पश्चात वही इच्छा या दूसरी इच्छा मन में जन्म ले लेती हैं। इच्छाओं की उत्पत्ति मन में ही होती हैं या ये मन से परे विषय हैं इस बात से अलग इच्छाएँ निरंतर जन्म लेती रहती हैं। इनके विकास का एक निश्चित चक्र होता है। ये जन्म लेती हैं , नियंत्रण कर सकने तक मन में रहती है और अंततः परिपक्व  होकर सतुष्ट हो जाती है।  

2) मानवीय इच्छाओं का एक निश्चित जीवन चक्र होता है : इनके विकास का एक निश्चित चक्र होता है।  ये जन्म लेती हैं , नियंत्रण कर सकने तक मन में रहती है और अंततः परिपक्व होकर सतुष्ट हो जाती है।  और या तो पुनः जन्म लेती है या इनका स्थान कोई और इच्छा ले लेती है।  इसप्रकार ये चक्र निरंतर चलता रहता है।  जैन दर्शन के अनुसार इन इच्छाओं के कारण ही मनुष्य मुक्त अर्थात निर्वाण को प्राप्त नहीं कर पता है।  

3) बड़ी इच्छा छोटी इच्छाओं का आच्छादन कर लेती है : मनुष्य के दैनिक कार्यकलाप के कारण बिना किसी कारण के स्वतः ही कुछ इच्छाएँ वरीयता क्रम में पहले आ जाती है और कुछ बाद में । ऐसे में जब तक वरीयताक्रम में पहले कि इच्छा संतुष्ट नहीं होती तब तक बाद वाली इच्छा बलवती नहीं हो पाती है और इच्छाओं का जीवन चक्र बाधित हो जाता है। ऐसे में कई लाभ होते है। व्यक्ति को जीवन में कुछ परिवर्तन करने का अवसर मिल जाता है। कभी-कभी वरीयता क्रम में ऊपर की इच्छा सामान्य सी होती है पर उसके नीचे की इच्छा हानिकारक होती है।  ऐसे में  चक्र के बाधित होने से व्यक्ति बाद वाली इच्छा के नुकसान से बच जाता है।  लेकिन ये तब तक ही चल पता है जब तक व्यक्ति स्वयं इस वरीयताक्रम को नहीं तोड़ता या बाह्य सहायता से वरीयताक्रम के नीचे की इच्छा को स्वयं ही उत्तेजित नहीं करता है। 

4) मानवीय इच्छाओं कि उत्पत्ति बुद्धि को शिथिल कर देती है : इच्छाओं की उत्पत्ति बुद्धि को एकाएक शिथिल तो नहीं कर देती है पर प्रबल होने के साथ बुद्धि को शिथिल करती जाती है। बुद्धि के शिथिल होने से मनुष्य सही और गलत का निर्णय नहीं कर पता है।  और ऐसे में उसे कई बार भयानक नुकसान सहना पड़ता है। बुद्धि  के शिथिल होने पर मनुष्य स्वयं पर से नियंत्रण खो देता है जिसके दूरगामी हानिकारक परिणाम सामने आते हैं। 

5) इच्छाओं में बल होता हैं  : इच्छाएँ अत्यंत बलवती होती है और निरंतर बलवती होती जाती है।  इच्छाओं को कुछ देर तक तो रोक जा सकता है परंतु उनके बल को कम नहीं किया जा सकता। इच्छाओं के पूर्ण होने को विलम्ब किया जा सकता है परन्तु कदापि स्थगित नहीं  किया जा सकता है।

6) इच्छाओं कि उत्पत्ति और उनका बलवती होना लगभग एक अनुत्क्रमणीय प्रक्रिया है  : इच्छाओं के निर्माण और उनका बलवान होना एक दिशा में जाने वाली प्रक्रिया है उसकी दिशा को पलटा नहीं जा सकता है।

7) इच्छाएँ इंद्रियों से जुड़ी हुयी होती हैं : इच्छाओं  के इन्द्रियों से जुड़े होने से आशय इच्छाओं के उद्गम का स्थान बताना नहीं है। इच्छाएँ शरीर से भिन्न और मन के सहारे जीवित रहती है। मगर इच्छाएँ इन्द्रियों के सहारे शरीरी का भोग करती है। ज्यादा से ज्यादा इन्द्रियों से जुड़ी इच्छाएँ ज्यादा आनंद देती है।  एक इंद्रि से जुड़ी इच्छा प्रायः दो या तीन इंद्री से जुड़ी इच्छा से ज्यादा बलवती और सुखदायक होती है। उदाहरणार्थ सूखे मुँह फिल्म देखने में और पॉपकॉर्न के साथ फिल्म देखने के फ़र्क़ को लेकर समझा जा सकता है।






रविवार, 19 जून 2016

जलवायु परिवर्तन : मेरे और आपके के लिए

मैं आज भी सुबह उठता हूँ । उसके बाद दन्त मंजन, स्नान के बाद दिन की शुरुआत करता हूँ । धीरे-धीरे ये सब कुछ आदत में शामिल हो गया हैं । यदि दिनचर्या में थोड़ा भी अंतर आता है तो अजीब-सी बेचैनी मन को घेर लेती है । लेकिन ये मेरे या आपके व्यक्तिगत जीवन तक सीमित है, जिसे ठीक किया जा सकता है और हम कर भी लेते हैं पर जब बात हमारे वश के बाहर होने लगे तो उसे ही आज कल लोग जलवायु परिवर्तन कहते हैं। 

हम इतनी विशाल पृथ्वी के बहुत-ही छोटे अंश है, लगभग नाममात्र के। यदि हम पृथ्वी को अपने छोटे-छोटे कृत्यों से प्रभावित नहीं कर सकते तो प्रभावित हुये बिना बच भी नहीं सकते हैं उसी प्रकार यदि पृथ्वी के प्राकृतिक कार्यप्रणाली में बदलाव आता है तो हम भी उस बदलाव के शिकार होते हैं । प्रायः हम पृथ्वी के प्रभाव में रहते हैं । पृथ्वी हमारे प्रभाव से कुछ ज्यादा समय तक बची रह सकती है, परंतु हम उससे अलग होकर जीवन की कल्पना नहीं कर सकते । फ़िलहाल ये दो तरफा नहीं बल्कि एक तरफा रिश्ता है । 

मेरे और आपके कितने पास समुद्र है ? क्योंकि समय के साथ ये दूरी घट रही हैं । भारतीय प्रायद्वीप के बीच में रहने वाले कब समुद्री लहरों का दीदार कर पाएंगे ये कहा नहीं जा सकता है। लेकिन ऐसा कुछ होगा इसकी गारंटी तो पक्का है। समुद्र के मैदान से ज्यादा गरम हो जाने के कारण बारिश कम होती है अगर यही हाल रहा तो हमारी जीवन का वो पहलू जिसमें बारिश का रोल होता था बिलकुल फीका ही हो जाएगा। मुझे एक सामान्य जीवन की झलक सभी में दिखती है । बारिश को कोसता हर कोई है, पर प्रेम जितना बारिश में है उतना न तो सर्दी से है और न गर्मी से । मगर लोग कहते हैं अब पहले जैसे बारिश नहीं होती और अब होगी भी नहीं क्योंकि बारिश को बुलाने वाले मेढक, गौराया, कौए और पेड़ नहीं रहे । जहाँ बारिश होती भी है वहाँ पीली बौछारों की खबरें आई है या इतनी बारिश हुयी की लोग चिड़ कर उन इलाकों से पलायन कर रहे है । ये सब मेरे , आप और समुद्र के बीच की बात है । इसे हमें ही सुलझाना होगा । 

सागर की मछलियाँ कूद-कूद कर बाहर आ रही है। कोई तो कारण होगा कि मछलियों को जमीन अब ज्यादा साफ और रहने लायक लग रही है। बहुत ज्यादा लंबी जिंदगी जीने वाले कछुओं ने मछलियों को तड़पते देखा है इसलिए जीवन के प्रति अब वे  काफी उदास हो गए हैं और प्रजनन के मौसम में तटों पर आने से बचते हैं या घबराकर बहुत ज़्यादा अंडे दे देते हैं । डॉल्फ़िन और आक्टोपस इंसान के साथ ताल मेल बैठाने में लगे हुये है । इनके अतिरिक्त सागर के सदाबहार जंगल गल रहे हैं । उन पर एसिड अटैक हुआ है । सागर का नमकीन पानी लगातार खट्टा होता जा रहा है । ये खट्टास हमारे और सागर के संबंधों में किसी दूसरे या तीसरे ने नहीं घोली है । 

बर्फ़ीले पहाड़ पिघल रहे हैं । पत्थरों के ढेर ढह रहे हैं । मैदानों में सूखे कि मार से हाल बेहाल हो रखा हैं । नदियाँ रास्ता भटक गई है । पिता पर्वत और पुत्री नदी के संबंधों का यह नया दौर है । मनचली और राह से भटकी नदियाँ जल्दी सूखने भी लगी हैं । नदियाँ उधार के बरसाती पानी से मौसमी उफान तक सीमित हो चली हैं । ये इनके सदाप्रवाही से मौसमी होने और अंततः लुप्त होने कि कहानी है। 

गाँव मासूम नहीं रहे । गाँव में ठगने वाली गलियाँ नहीं हुआ करती थी । पहले कोई गाँव में भटका नहीं था । सभी अपने-अपने होते थे लेकिन आज रोजी रोटी के लिए सभी गाँव छोड़ के चले गए और झोपड़ियाँ , खुफिया वीरान इमारतों मे तब्दील हो गई हैं । सड़क के किनारें के आम के बगीचों के गुमनाम मालिक पता नहीं कहाँ से आ गए है ? जिसे न तो हम और पेड़ पहचानते है । इसलिए गाँव अब पिछड़े तो हैं पर मासूम नहीं है।

शहरों का विस्तार हुआ है । ये कुपोषित मोटे वयस्क के समान अपना वजन स्वयं उठा पाने में असमर्थ हो गए है और डैबिटीज़ , कैंसर, एड्स जैसे घातक रोगों से ग्रस्त हो गए है। शहरों में नहाना जरूरी होता है, यहाँ लोग जल्दी गंदे हो जाते हैं । शहरों में नहाने के लिए पानी गाँव कि नदियों, तालाब से जाता है। गाँवों से शहरों में कच्चा माल, मज़दूर, नयापन, भोलापन, संस्कार और मैं या आप जाते हैं। हम शहरों को अपने खून पसीने से सींचते हैं । सिकुड़कर सोते है जबकि गाँव में हमारें खेत के खेत पड़े हैं । जब हम शहरों में रम जाते हैं तो बिजली के कारखाने हमारी खेती कि ज़मीनों पर खड़े हो जाते हैं ।

    

शनिवार, 18 जून 2016

गिव एंड टेक : टू सिम्पल टु लर्न

लेन-देन तो लगा ही रहता है । जन्म के समय पैदा करने वाले को दर्द देते हैं । फिर दुनिया में आकर भी लेने-देने में लगे रहते हैं । मनुष्य होने के नाते हम आमतौर पर दर्द, दुख, कष्ट, धोखा, रोग आदि देने से किसी को भी बचते हैं और सुख, धन, स्वास्थ्य, ज्ञान, शांति, प्रेम देने की इच्छा रखते हैं । हम शुरू में सभी को वही देते हैं जो उनसे अपने लिए चाहते हैं या जो उनके लिए अच्छा होता है । लेकिन फिर हम जैसे-जैसे बड़े होते जाते हैं । लेन-देन से पहले सोचने लगते हैं । हम संबंधों का स्तरीकरण कर उनके लिए व्यवहार सुनिश्चित कर लेते हैं । निश्चय ही ऐसा करने से जीवन आसान हो जाता है परंतु हम पूर्वाग्रहों से ग्रसित हो जाते हैं ।  

पूर्वाग्रहों से ग्रसित जीवन सीमित, संकुचित सोच वाला और बेहद आसान होता है । ऐसे जीवन में निर्णय का सर्वाधिक अधिकार हम अपने पास संजोकर रखते हैं । ये किसी कंपनी के अधिकतम शेयर अपने पास रखने जैसा हैं जबकि ऐसा करना किसी खास फ़ायदे और कायदे का काम होता नहीं है । 

परंतु फिर भी दुनिया भर के लोग लेने कि अपेक्षा देने के लिए ज्यादा इच्छुक दिखते हैं । वो ऐसा इसलिए भी कर सकते हैं क्योंकि वो ऐसा मानते हैं कि देने से लेन-देन शुरू होता हैं । आज हम दे रहे हैं कल हमें भी कोई देगा । देना भले ज्यादा लेने जितना सुखप्रद न हो पर उसमें कुछ बेहतर मिलने कि आशा होती हैं  इसलिए हर देने वाला व्यक्ति आशावादी तो होता है । लेकिन कुछ ऐसे भी होते हैं जो सिर्फ देने के लिए देते हैं उनको बदले में कुछ बेहतर या बदतर कि अपेक्षा नहीं होती है ।  

हम प्रायः लेन-देन में दूसरों के लिए मानवीय भावनाओं या सुखदायक काया कि कामना करते हैं और अपने लिए रखते भी हैं। ऐसा अक्सर बुद्धिजनों के मुख से सुनने को मिल जाता हैं कि मनुष्य कि वास्तविक संपत्ति तो उसका स्वस्थ शरीर हैं और स्वस्थ शरीर में चंगे मन का वास होता है । लेकिन हम इनके इतर धन-दान को ज्यादा लालायित रहते हैं । ऐसा शायद धन के सर्वसुलभ साधनों के पर्याय के रूप में स्वीकार हो सकने की खूबी के कारण है । धन हमारे पास समान्यतः इतना होता है कि हम दे सके इसलिए लोग खुलकर देते भी है । 

लेकिन धन आधारित समाज में धन-दान सिर्फ पुण्य का मामला नहीं रह जाता है । ऐसा लोग अन्य विविध कारणों से भी करते हैं जैसे टैक्स से बचने के लिए , समाज में नाम के लिए , काला धन छुपाने के लिए और समग्रता में देखे तो दिखावे के लिए भी धन-दान करते हैं । 

शास्त्रों में लिखा है क्षमा देने वाले को बड़े हृदय का माना गया है । ऐसा व्यक्ति महामना होता है । ऐसे ही दान और दानी के अन्य गुणगान किए गए है। इसलिए दान एक प्राचीन कालीन कार्य है। फिर भी लोग दान कर कैसे पाते हैं ? अर्थात क्या वे दान इसलिए करते हैं कि उनकी संपत्ति दिन दूनी रात चौगनी बढ़े या वे इसलिए धन-दान करते हैं ताकि अपने पाप कम कर सके। क्योंकि धन का दान सबसे बेहूदा किस्म का दान है । जिसका कोई आधार नहीं होता है । एक दिन दुनिया में लोगों के देने के लिए पैसा बचेगा क्योंकि वे तब न तो अपने किए के लिए माफी मांग सकेंगे और न ही स्थितियों को बदल सकेंगे । गिनती के छपे हुये नोट एक हाथ से दूसरे हाथ होकर जब जरूरतमन्द तक पहुँचते है तब तक उनकी कीमत में बट्टा लग चुका होता है । 

दान, अमीर गरीब को देता है । ये एक उपभोगी के द्वारा एक कम खर्चीले और संयमी को दिया जाने वाला रॉयल्टी है । चूँकि मैंने तुम्हारे हिस्से के भी संसाधनों का मजा लिया है इसलिए तुम कुछ पैसे लेलों और चुप रहो । 

धन-दान गरीबी के कुचक्र का कारण है । ये ऐसा ऋण है जिससे जीते जी उऋण नहीं हुआ जा सकता । ये दमित के शोषण का मुलायम तरीका है । मजबूर, मालिक के रहम तले दबा रहता है । मालिक अक्सर कहता है जब पैसे होंगे तब दे देना, इतनी जल्दी भी क्या है ? ये शोषक - शोषित के संबंधों को पोषित और दीर्घजीवी बनाने का प्रयास है। 

संसाधनों के अकाल के काल में जमीन को छेद के सोना मंदिरों में दान दिया गया है। साफ पानी , साफ जमीन , साफ हवा , हरे-भरे जंगल उजाड़ के जो पैसा मिला उससे आनंद उठाने के बाद कुछ हिस्सा दान किया तो क्या किया ? अगर आज भी असमानता है तो ये क्यों है ? 

वास्तव में जो दे रहा हैं उसकी बैलेन्स शीट खुद नेगेटिव में है । शुरुआत में समाज जब कबीलाई था, संपत्ति का अधिकार नहीं था । सभी के हिस्से बराबर थे । तो आज मैं पूछता हूँ तुम्हारे पास मुझसे ज्याद कैसे ? इसकी प्रश्न की कोई सशक्त व्याख्या होती नहीं है । क्योंकि सभी के अपने-अपने कारण है ।  

कोई मुझे या किसी को क्यों दान देता है या याचक कि तरह हमें किसी से मांगना क्यों चाहिए ? आमतौर पर हक़ मागने वाली आवाज़ को दबा दिये जाने का चलन है और जब तक ऐसा है तो जिनके पास ज्यादा है वो चोर है, क्योंकि दान अधिकार है भीख नहीं ।



रविवार, 15 मई 2016

मिसमैनेजड वीमेन एम्पावरमेंट :अ अपकमिंग थ्रेट

" एक समय था जब भारत में जैविक रूप से पुरुष के रूप मे जन्मना मजे की बात होती थी और त्राश का कारण भी । लेकिन अधिकांश पुरुष आबादी ने तो मजे ही किए थे । अब भी यही हाल है "

    (पिछले दो दशक से भारतीय समाज मे लिंगानुपात में काफी सुधार आया है। जनसांख्यिकीय ढाँचे में भी बदलाव आया है। मानव विकास सूचकांक में भी भारत साल दर साल कुछ पायदान ऊपर चढ़ रहा है। मातृ मृत्युदर और फलतः शिशु मृत्युदर को कम करने के लिए हम कटिबद्ध है। केंद्रीय सरकारी योजनायें जैसे ' बेटी बचाओ  , बेटी पढ़ाओ  ' , 'जननी सुरक्षा योजना ', ' सबला योजना ' , 'समन्वित बाल विकास योजना'  जारी है। हम पिछले कुछ पंचवर्षीय से डेटा डिफिसीएंट से नियमनिष्ठ डेटा मैनेजमेंट की ओर बढ़ रहे हैं। अब ये बात कहना पुरानी और सुनी सुनाई बात लगने लगी है कि महिलाओं ने किसी विशेष क्षेत्र में सर्वजन अपेक्षित सर्वोच्च सफलता को हासिल कर लिया है।  )
       
     इतने प्रपंच के बाद महिलाओं की स्थिति सुधर रही है। ठीक है ! मान लेते है लेकिन क्या बालिकाओं  के पक्ष में झुकते लिंगानुपात की पूर्व शर्त यह हो गई है कि उनको सफल होना ही है ? 

      मतलब अतीत में कभी भी बच्चों के लिंगनिर्धारण में पुरुषों को वरीयता देने के पीछे इतने अधिक कठिन और उच्च मापदण्ड नहीं रखे गए थे। पुरुषों के सम्बन्ध में तो बस इतना कहा जाता था कि ये कुल दीपक है , परिवार की मर्यादा की गंगा और वंश वृद्धि कि शक्ति का एकमात्र स्त्रोत ये ही है। कभी बच्चों के जन्म में ये पूर्वशर्त नहीं रखी गई कि तुम्हे भी पहाड़ ही तोड़ना है अन्यथा तुम्हारा जन्म निरर्थक माना जायेगा. वो तो अनलिमिटेड वैलिडिटी वाला वीज़ा लेके आये थे। लेकिन 
      आज के सामाजिक परिवर्तन की ये छुपी शर्त सी महसूस हो रही है कि देखो लड़कियों ! तुम्हे जन्म तो लेने दे रहे हैं लेकिन अगर कुछ करके नहीं दिखाया तो जानती हो कितने निर्दयी थे हम ? अपनी सलामती चाहती हो तो कुछ तमाशे और हुनर के कुछ कारनामे दिखाओ। तुम निरपेक्ष नहीं हो ,तुम्हे हमने किसी के नुकसान पर कमाया है। ऐसे में ये कैसा दबाव थोपा रहे  है आप मुझ पर  ? ये दबाव नहीं , तुम्हारे बचे रहने की पूर्वशर्त है, यही हमारी मर्जी है।  

     अभी तो शहर बसना ही शुरू हुआ था कि एक रात एक अंजान आंधी आई और सब सपाट कर गई।  ये हर लड़की के बस में नहीं है कि वो अपने जन्म को सार्थक ही साबित कर के दिखा पाए। इसलिए मानवीय जाति की इस अपरिष्कृत और अनंवेषित शक्ति के प्रति सहज व्यवहार की अपेक्षा है। लड़कियां, लड़को की अस्थाई स्थानापन्न नहीं अपितु उनका एक समरूप और सशक्त विकल्प है।  और मार्क्सवाद और गांधीवाद भी ऐसा ही कुछ मिलाजुला कहते है कि व्यक्ति के निर्माण में उसकी परिस्थितियों की पर्याप्त भूमिका होती है। ऐसे में केवल लिंग के रूप में एक जैविक परिवर्तन मात्र हो जाने से सत्चरित्र का ही निर्माण हो जायेगा भरोसे  लायक बात बहुत लगती नहीं है। लेकिन वैधानिक और प्रशाशनिक रूप से सरकार के काम इस दिशा में शून्य भी नहीं कहे जा सकते। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे निर्णय सुनाए है जिनमें घर में बालिका को बालको सदृश ही मानने की प्रेरणा मिलती है। 
     
    भारत में वैचारिक बदलाव हो रहा है। शैक्षिक और स्वास्थ्य के मामले में चेतना जागृत हो रही परन्तु पता नहीं किन अदृश्य हाथों ने भारत सरकार को सामाजिक क्षेत्र में खर्च करने से पूर्व रोक रखा है।और इनके दुष्परिणाम भुगतने के लिए हमें असहाय छोड़ देते हैं। 
      ऐसा हो सकता है सामाजिक इंजीनियरिंग के इस एक्सपेरिमेंट में सभी के हाथ उम्मीदों के अनुरूप फल हाथ न लगे और कुछ को ये डर भी हो सकता है कि महिलाओं की यह अनियंत्रित और गैरजवाबदेह संख्या समाज के हित में नहीं है। ऐसी स्थिति में सभी करे कराये पर पानी फिर जायेगा, क्योंकि ईमारत बनाने में साल और महीने लग जाते है पर गिराने को एक झटका ही काफी होता है। यही प्रकृति का नियम भी रहा है क्रमिक विकास चुटकी भर समय में न होकर कई वर्षो तक चलने वाली घटना श्रृंखला के बाद ही एक प्रजाति दूसरे का स्थान लेती पाती है।  

     फिर भी क्यों भारत में महिलाओं के शक्ति में इजाफा और इस शक्ति के कुप्रबंधन के दुष्परिणाम देखने को मिल सकते है  ? 

    ऐसा क्या नहीं देखा भारतीय नारियों ने ? जौहर करती रानियाँ , मंदिरों में नाचती देवदासियां, अवैध मानवतस्करी के रूप में बालिकाओं का घृणित कामकाजों में नियोजन और भी बहुत कुछ। इन सब के पीछे कल तक पुरुष के होने का विश्वास था। धीरे-धीरे ये विश्वास शक में बदलता गया क्योंकि एक महिला ही दूसरी की दुश्मन बन बैठी और अब ये विश्वास एक अन्धविश्वास में तब्दील हो जाने की चौखट पर है क्योंकि  निरंतर उत्कृष्ट प्रदर्शन, सामजिक प्रतिष्ठा और वर्चस्व के लोभ में भारतीय नारी किसी भी हद तक जा सकती है, इसमें संदेह नहीं है। इतिहास में उसे इतना पतित कर दिया गया था कि वर्तमान में वैसे जीवन को विकल्प के रूप में चुनने में उसे तनिक भी संकोच नहीं होना चाहिए। 

      

      
     

रविवार, 8 मई 2016

क्योंकि बच्चों ने देखा है माँ किस तरह पिता जी से बात करती है !!!!

किसी भारतीय महानगर के एक प्रगतिशील परिवार के घर के भीतर का हाल लेकर आया हूँ आपके लिए । परिवार में सिर्फ दो और उनके दो है । विपिन , रिंकि से छोटा है । विपिन और रिंकि कि माँ एक वर्किंग वुमन है और पापा घर संभालते है ।  मतलब पापा कुछ नहीं करते है ।  (अब आगे )


बच्चो ने अपनी आंखों से देखा है अपने प्यारे पापा को दिन भर घर का काम करते हुये । झाड़ू, पोंछा करते-करते उनकी तो कमर ही टूट जाती होगी । उसके बाद खाना भी तो बनाना पड़ता है । सुबह जल्दी उठकर दूध लेने जाना होता है और मम्मी के लिए चाय भी बनानी पड़ती है क्योंकि तभी मम्मी कि नींद खुल पाती है । थोड़ी सी भी अगर देर हो गई तो मम्मी तो पापा पर बहुत गुस्सा होती है । इन सबके बाद भी मम्मी तो कितना घूमती है पर पापा दिन भर घर के काम मे लगे रहते हैं । ऐसे में विपिन, हमने जो मदर्स डे के गिफ्ट के लिए पैसे सेव किए है उन पैसों से हम फाथर्स डे पर पापा को गिफ्ट देंगे । मजे की बात ये है कि फथर्स डे ,मदर्स डे के बाद आता है । ( बच्चों  ने  तो मदर्स डे कि हवा ही निकाल दी )

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बहुत पढ़ा भैया और खूब पढ़ा । क्या चातुर औलाद पाई है, तूने माँ । तेरे एहसानों को तुझको ही गिना-गिना के तेरे ही एहसानों में तुझे कैसा बंधा है ? वैसे तो कहने को पक्के दोस्त को थैंक यू नहीं बोलती हमारी ये पीढ़ी और मदर्स डे पर कैसे कृतज्ञता से लहूलुहान हो रही है । 
ये सब कुछ नहीं चोचले है इनके। डर गए है । ये आज कि औरत को कल कि माँ वाली कड़ुवाहट भरी जिंदगी थोपने के प्रपंच रचे जा रहे हैं । देखो आज कि लड़कियों  घर में रहकर चूल्हा चौका करना कितना महानता का काम है। गोल-गोल मकई कि रोटी बनाओगे तो एक दिन साल मे तुम्हारा बेटा तुमको शाबासी देगा ।
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जी जल जाता है, साहब ऐसे कपटी षडयंत्रो से । माँ को माँ बने रहने में  किसका हित है ये सब जानते हैं । उसके ऐसे घूचू बने रहने से खाने, धोने का टेंशन दूर रहता है माथे से । घर का काम करने वाला कोई तो चाहिए होता है न की नहीं । 
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मार्क्स ने सच ही कहा था, पूंजीवादी समाज के पनपने कि एक अनिवार्य शर्त है कि नारी को उसके शोषण का बोध न होने पाये। और भारत जिस पूंजीवादी समाज के रास्ते पर चल रहा है उसमें ऐसा बिलकुल होते दिख रहा है 

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गली के चलताऊ भाषा में  बोलू तो माँ कसम ये पुरुष वादी मानसिकता का खेल है, मायाजाल है और साहब एक और बात है नारीवादी चिल्ला-चिल्ला के कहते हैं  कि स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है । क्योंकि कि मैं ने आज तक एक दिन ऐसा नहीं सुना जब भारत में ये कहता हो कोई कि " वर्किंग मदर्स डे " मनाएंगे । ऐसा तो हो नहीं सकता न , क्योंकि ऐसे में इन रूढ़िवादियों कि जान चली जाती। मुझे आश्चर्य नहीं है कि बजरंगदल के जोशीले नवजवान मदर्स डे का विरोध क्यो नहीं करते, कारण साफ है ऐसा कर पाने के लिए उनको समझ में भी तो आना चाहिए कि गलत क्या है ? और सही क्या है ? ,वो तो  भेड़ चाल चलने के माहिर है । 
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ऐसे में एक शानदार स्लोगन याद आता है कि स्त्री वो सब करने के लिए नहीं बनी है जो पुरुष करते हैं बल्कि वो तो वो सब भी करने के लिए बनी है जो पुरुष नहीं कर सकते हैं  ।  ऐसा क्या हो गया कि पुरुषों के रिकॉर्ड बनाने  का इंतज़ार करें  , और फिर उन रिकॉर्ड को तोड़ने वाला बने। 
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लेकिन मजे कि बात ये है कि इतने प्रपंचो के बाद भी बदलाव कि लहर तो चल चुकी है। विदेशों में और कुछ भारतीय महानगरों में अब ये चलन बढ़ रहा है जब परिवार में पिता घर संभालते हैं और माता काम पर जाती है। ऐसे परिवारों मे फथर्स  डे ज्यादा दिलचस्पी से मनाया जाता है, न कि मदर्स डे क्योंकि बच्चों ने देखा है माँ किस तरह पिता जी से बात करती है।

मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

लेटैस्ट ट्रेंड इन सोसाइटी : द पावर ऑफ मनी

लगभग सब कुछ ठीक ही था। जिस समय की बात है उस समय एक बेटा और दो बेटियाँ होना शायद कोई बड़ी बात नहीं थी। घर भी नौकरो से गुलजार था। प्रेमचंद लिखते है निर्मला के लिए  शादी का रिश्ता आया है। रिश्ता एक अच्छे परिवार से आया है, लड़का काफी पढ़ा लिखा और परिवार भी खानदानी है। लेकिन ये क्या? विवाह की तैयारियों के बीच निर्मला के पिताजी की हत्या हो जाती है। अब निर्मला का विवाह उस परिवार मे न हो सकेगा क्योंकि वो बड़े खानदानी है और उनकी नजर लड़की के साथ-साथ लड़की के पिता की दौलत पर भी थी ।

(आर्थिक कारकों को व्यक्ति इतना महत्व क्यों देता है? क्या आर्थिक कारक सचमुच मे महत्वपूर्ण है ? समाज के द्वारा पैसो को महत्व देने पर व्यक्ति भी पैसो को महत्व देने लगता है या व्यक्ति के द्वारा पैसो को महत्व देने पर समाज भी उसी अनुसार चलने लगता है । दोनो मे से कोई भी बात पूरी तरह सही नहीं है । आंशिक रूप से दोनों का ही प्रभाव रहता है। ये एक दूसरे के समानार्थक नहीं अपितु पूरक है।)

अंततः निर्मला का विवाह वहाँ नहीं हो पाया जहा उसके पिता स्वर्गवासी होने के पहले तय करके गए थे , ये केवल नारी के शोषण की गाथा नहीं है, ये उसके अभावग्रस्त और निर्धन होने की मजबूरी है। निर्मला जैसी सुकुमारी का विवाह एक अधेड़ उम्र के सेठ से होने की घटना अधेड़ के केवल सुखवादी होने की बात नहीं है बल्कि उसके धनाढय होनी की खशियत है।

(इसी बीच प्रेमचंद लिख ही देते है पैसा सब कुछ नहीं है लेकिन जो चीज़ सब कुछ है उसके बहुत करीब की चीज़ पैसा है। इसीलिए शायद भगवान विष्णु मोक्षदाता है तो देवी लक्ष्मी धन देवी है । लीजिये सबकुछ के नजदीक तक धन पहुँच गया ।)

इस सब के बीच दो नवजवानों के मन की उधेड़बुन को सुनते है और देखते है आज का मन क्या कहता है ? रोशनी आज के जमाने की लड़की तो नहीं है पर उसे आज के जमाने के अंदाज़ो को अपनाने से गुरेज भी नहीं है। ज्यादतरो की तरह उसने भी अपने साथी के साथ जीने मरने की कसमे खाई थी । लेकिन अचानक समय के गुजरने के साथ क्या हुआ , किसी को पता नहीं ? रोशनी का करीबी उसका हमदर्द, उसका पहला प्यार मृणाल आज एक मध्यम दर्जे की आय कमाता है। उसकी तंखावह कोई 20000 रुपये महीने है , शायद बाद मे बढ़ भी जाए लेकिन अभी तो इतनी ही है । ऐसे मे अगर दोनों की शादी हो जाए तो जितना मैं जनता हूँ मृणाल रोशनी को हर संभव सुख देने का प्रयास करेगा । लेकिन एक दिन रोशनी के लिए एक रिश्ता आता है परिवार काफी खानदानी है , लड़का काफी पढ़ा लिखा है और कमाता भी अच्छा है । ऐसे मे इस बात को रोशनी मृणाल को बताती है और दोनों कुछ बाते करते है –

रोशनी – मुझे तो बहुत अजीब लग रहा है । पता नहीं पिता जी क्या निर्णय लेंगे ? उनको तो मेरे और तुम्हारे बारे मे सब पता है ।
मृणाल – तो वो लड़को वालों को माना क्यों नहीं कर देते ।
रोशनी – कैसे कर दे ? पिता जी कहते है - ऐसा खानदानी परिवार और रिश्ता फिर मिले न मिले क्या पता ?
मृणाल – लड़का मुझे से ज्यादा कमाता है ।
रोशनी- हाँ ! उसकी शुरुआती तंख्वाह कोई 60000 है और पिताजी का कारोबार भी है। महीने के यही कोई मोटा-मोटा डेढ़ लाख रुपये घर आते है ।

क्या इनके बीच की बातो को हमे और आगे भी सुनना चाहिए, मुझे लगता है नहीं । क्योंकि रोशनी एक समझदार लड़की है। उसकी किस्मत अगर निर्मला के जैसे हुयी तो एक हाथ मे उसके मृणाल जैसा प्रेमी है और सब कुछ ठीक रहा तो शानदार कमाऊ पति । हाँ ! मैंने तो मृणाल को रिजैक्ट कर दिया क्योंकि पति कमाऊ ही अच्छा लगता है। वैसे भी समाज में सम्बन्धो को गढ़ते समय लड़के की आय और लड़की की सुंदरता समानुपातिक रूप से तौली जाती है।  

इसप्रकार की द्वन्द्वत्म्क परिस्थितियो मे या तो मृणाल रोशनी से ये कहकर पहले दूर हो जाए कि उसे कोई लाइलाज बीमारी हो गई है और वो ज्यादा दिनो का मेहमान नहीं है। और ऐसा कहने मे कोई हर्ज़ भी नहीं है क्योंकि अभावग्रसत्ता एक बीमारी ही है, एक लाइलाज बीमारी । या इंतज़ार करे कब रोशनी उसे अपने जीवन से निकाल उसी तरह फेंक देती है जैसे लोग दूध मे से मक्खी को निकाल फेंक दिया करते है। 

ऐसे मे क्या ये निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि जो संबंध बनते भले ही भावनाओ के आधार पर है पर उनका जीवनकाल भावनाओ पर नहीं टीका होता । 

गरीबी पैसे का अभाव है और भुखमरी को जनमती है । भुखमरी अनाज की कमी नहीं है । ये पैसो के अभाव मे खाना न खरीद पाने की मजबूरी है। सरकार कहती है जिसके पास पैसा है उसके हिस्से का अनाज गोदाम मे रखा है और जिसके पास पैसे नहीं है उसके हिस्से के अनाज को चूहे खा गए ।

सरकार ने व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए बोलने कि, घूमने कि, कही भी बसने, किसी भी धर्म को मानने कि स्वतन्त्रता तो दी है लेकिन इससे पहले उसने व्यक्ति को समानता दी है। समानता आर्थिक क्रियाओ मे भागीदार होने का। ये समानता के अधिकार के कवर मे आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार छुपा हुआ है। ये आरक्षण केवल समानता नहीं, आर्थिक स्वतंत्रता है क्योंकि वो धन ही है जो जाति से टक्कर ले सकता है। 

दुनिया मे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद व्यक्ति सिर्फ आयकर विभाग के प्रश्नो का जवाब देने के लिए बाध्य होता है । ऐसा जीवन एकाकी नहीं होता, चाटुकार हमेशा साथ होते है , बोरियत भी नहीं होती ।



रविवार, 17 अप्रैल 2016

अब समय आ गया है कि !!!

" मानवाधिकारों पर लेशमात्र भी आँच आने पर मानवाधिकार आयोग सक्रिय हो जाता है, होना भी चाहिए । क्योंकि मामला भी तो दुनिया के सबसे होनहार, समझदार दो पैरो वाले जीव से जो जुड़ा है । मगर मानवाधिकार अब आत्यंतिक रहने लायक बचे नहीं है क्योंकि मानव अब मानव बचा नहीं है। संविधान ने वो दौर भी देखा जब जमींदारी के लिए भारतीयों को दिए  मानवाधिकारों पर प्रश्न उठे, तो अब भी कई नए प्रश्न उठे है । जब व्यक्ति स्वयं से नहीं समझ रहा तो अब कानून का सहारा लेना ही पड़ेगा । "  
    सभ्यता का विकास भी क्या खूब अंदाज़ से हुआ । पहले समाज शिकारी था फिर पशुचारक और कृषक बना । और आज ज्ञान के गट्ठर ढो रहा है । क्या से क्या हो गए हम  ?

     मगर अब तो एक नया भाग जुड़ेगा या भाग 3 (क) बनेगा । और शीर्षक होगा - पशुओ के मूल अधिकार ।  तो क्या करे । संविधान तो बदलना पड़ेगा । वैसे पहले से एक कानून है बिलकुल अपाहिज शक्तिमान जैसा है , अरे वही शक्तिमान, जिसको उत्तराखंड के बी०जे०पी० विधायक के हाथों अपने  पैर से हाथ धोना पड़ा ।

     ऐसे मे कौन बचाएगा शक्तिमान को ? क्या कहा - कानून । कानून का नाम बता दू , बताता हूँ - पहला है, पशुओ पर अत्याचार रोकथाम अधिनियम, 1960 । लेकिन कानून तो कानून ही है। और दूसरा है ,आईपीसी सेक्शन 429 । आईपीसी मे तो बड़ी जबर्दस्त बात लिखी है,  मैं मूल पंक्तिया ही छापे देता हूँ -  https://indiankanoon.org/doc/3563/  इस लिंक पर जाकर जरूर पढ़े । क्योंकि देने को तो कुछ नहीं लेकिन धरे गए ।  जैसे की विधायक जी धरे गए है तो पाँच साल की सजा तक हो सकती है ।

      ऐसो मे एक बात तो साफ है जानवर मारने - पीटने की चीज़ न है । उनको भी दर्द होता है । और वो भी रोतो है ।  


      लेकिन आज कल ये आम आदमी की दिल्ली सरकार मे जनवरन की खैर नहीं है । अभी विडियो शेयर हो रहा है की कोई ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन की सीढ़ी मे बैठकर कुत्तन को चाकू से घायल कर रहा है । और एक पिल्ला का तो उसने वध भी कर दिया । कुत्तो का सिरियल किल्लर पैदा हो गवा है । एक दम राक्षस हो गवा है। लेकिन पुलिस भी विडियो को खंगाल के उको पकड़ ही ली । लेकिन इतने मे काम नहीं बनने वाला । पता चला है दिल्ली का गौतम बुध नगर जनवरन की कब्रगाह बन गया है । सबसे ज्यादा बेजुबानों पर अपराध वही हो रहे हैं ।


     ये हाल तो राजधानी का है । उसके बाद देश पर नजर डाले तो, खबरों की हैड लाइन कुछ ऐसी मिलती है - एक व्यक्ति कर रहा था, कुत्ते के साथ बलात्कार । प्यासे जानवर को इतनी बेदर्दी से मारा की चली गई उसकी जान । जानवरो को बूचड़खाने मे कितनी क्रूरता से मारा जाता है वो तो मुद्दा ही नहीं है, गाय को छोड़कर ।  हाँ ! अगर कोई नोनवेज खाने को दे तो एक बार ऐसे मे पूछना जरूर बनता है , ये क्या है ? क्योंकि आजकल सब कुछ उपलब्ध है ।

     दुनिया मे ऐसे देश भी है जहा जानवरो से बेहतर बर्ताव किया जाता है लेकिन शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहा मांसाहार के नाम पर उनको न काटा जाता हो इसलिए मांसाहार को छोड़कर बचे जानवरो पर किए जा रहे बर्ताव को ध्यान मे रखकर देखते है तो पता चलता है लगभग ज़्यादातर पश्चमी देश जहा इंसान मजे से है वहा जानवर के भी मजे है । ऐसे मे नाम गिनने से कुछ खास मिलने वाला नहीं ।
     क्योंकि जब रुस या अमेरिका लंबी दूरी की इंटेर्कोंटीनेंटल मिसाइल इराक या सीरिया पर दगता होगा तो क्या वहा के जानवर बच जाते होंगे। नहीं वो भी राख उनके मालिक भी राख । बिलकुल वैसे ही जैसे हड़प्पा कालीन कब्र की खुदाई मे मानव की अस्थियो के साथ कुत्ते के भी अस्थिपंजर मिले थे। मुसीबत मे गेंहू के साथ घुन भी पिस्ता है । अबे , जानवर आतंकवादी थोड़ी है । जानवर जिहादी थोड़ी है । गधा या बकरा इस्लामिक स्टेट का वफादार कब से हो गया ? लेकिन हो गया जानवर जो ठहरे । उनकी कौन सुनता है ?

      सेंसरबोर्ड भी क्या बैन करता है ? घंटा । अच्छे अच्छे डाइलॉग मे बीप गुसा गुसा के उनकी बीप बीप एक कर देता है । लेकिन अगर डाइलॉग कुत्तो पर हो तो क्या बात ।  गोविदा बोलते है - " जब दस कमीने मरते है तो एक कुत्ता पैदा होता है , मैं पूछता हूँ गोविंदा को ये दिव्य ज्ञान कैसे हुआ ? नहीं पता ।  इसके बाद सुरवीन चावला बोलती है - पागल कुत्ता और आवारा हाथी दोनों बंदूक की गोली के लिए बने हैं । और अंतिम मे बसंती इन कुत्तो के सामने मत नाचना । एक और ये वाला पक्का अंतिम है - जगिरा जी बोलते है इंडिया गेट मे मेरे मन को भाया मैं कुत्ता काट के खाया । मैं पूछता हूँ ये सब क्या है , माइ लॉर्ड । यही इंसाफ है । कानून की देवी कब तक आंखो मे इसी तरह  पट्टी बांध के रखेगी और उसके कुत्ते जुल्म सहते रहेंगे और हाँ ! घोडा और हाथी भी ।
   
      इसके बाद डबल्यूडबल्यूएफ़ , पेटा , वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल वेलफ़ैर जैसी संस्थाए क्या कर रही है ? कुछ तो करनाल मे भैस का क्लोने पैदा कर रही , कुछ चीता पकड़ रही , कुछ बाघ की गिनती कर रही , गंगा की डॉल्फ़िन बचा रही , चंबल से डोलफिनो को निकाल के दूसरी नदी मे डाल रही । या गिद्ध बचाओ, गौरैया बचाओ , गाय बचाओ, शेर बचाओ । यही सब चल रहा है । लेकिन ऐसे मे घोडा , कुत्ता और गधे का हाल पूछने वाला कोई नहीं है । बिलकुल अकेले पड़ गए है ये ।
    मैं पूछता हूँ आदमी का बच्चा किसके साथ खेलेगा , कुत्ते के साथ । आदमी का बच्चा किसकी सवारी करेगा , घोड़े की । और यही कष्ट मे है ।
 
    इसलिए कुत्ते को भोकने दे क्योंकि  कुत्ते तब ज्यादा भोकते है जब वो अकेलापन महसूस करते है । उनकी भावनाओ को समझे और उनपर अत्याचार करना बंद करे। और देश मे पशुओ के अधिकार की मांग जायज है इसका समर्थन करे। जानवरो से ही दुनिया गुलजार है  क्योंकि इंसान जानवर बन गया है  और  बेजुबान इंसान ही काम के है और वो कम  रह गए है । 
 
 
  

रविवार, 10 अप्रैल 2016

यह एक सामान्य व्यवहार है !!!

सुअर धरती में रहने वाले,
कुछ होशियार जानवरो में से है।
यहाँ तक की उन कुत्तों और बिल्लियों से भी ज्यादा, जिनके साथ हम रहते हैं । 
डॉल्फ़िन और हाथियों की तरह,
सुअर समझते है कि दर्पण कैसे काम करता है ?
और उन्हें कुछ सरल वीडियो गेम,
खेलना भी आता है ।

जब रात में वो सोते है ,
तो उन्हें सपने आते हैं ।
और उसके बच्चे अपना नाम जानते है,
और उत्तर देते हैं, जब उन्हें पुकारा जाता है ।
कुत्तों की तरह ही,
सुअर भी वफादार और स्नेही होते हैं ।
उन्हें उनका पेट अच्छे से रगड़े जाना पसंद है ।

बाड़ भले ही उनके और बच्चों के लिए भयानक था ।
लेकिन इसने उनकी जान बचाई ।
एक फैक्ट्री फॉर्म में,
अपना जीवन,
एक छोटे से धातु के पिंजड़े में बिताते हैं। 
जिसमेँ वो बड़ी मुश्किल से हिल डुल पाते हैं ।
वो ऐसे तंग परिस्थितियों में रखे जाते हैं,
जहाँ तनाव और मानसिक उतेजना की कमी
उनको पागल कर देती है ।

उनके बच्चे उनसे जन्म के बाद ही,
दूर कर दिए जाते हैं।
और बिना दर्द नाशक के ,
उन्हें बधिया बनाया जाता है।
और उनकी पूँछ भी काट दी जाती है।

वो बीमार होते, या
वो काफी तेजी से विकसित नहीं होते,
तो उनका सर ज़मीन पर पटक कर,
मर दिया जाता है ।
या उन्हें डिब्बे में फेंककर,
गैस देकर मर दिया जाता है।
यह सब आम है। 

पुराने सुअरों के बच्चे गंदे बाड़े में ठूस दिए जाते हैं।
वो एक भी दिन बाहर नहीं बिताते हैं।
उन्होंने कभी भी अपनी पीठ पर,
सूरज को महसूस नहीं किया ।
और न ही अपने पैरों के नीचे घास को ।

सिर्फ छह महीने की उम्र में,
उन्हें परिवहन ट्रको में भरकर,
उनका वध करने वाले करखानों में,
उन्हें भेज दिया जाता है ।
जहाँ उन्हें उल्टा लटका कर रखा जाता है।
बिजली के चिमटे से छेद किया जाता है,
और गले को काट दिया जाता है ।
सभी फार्म सुअरों के साथ,
अविश्वसनीय क्रूरता के साथ पेश आते हैं।
यह एक सामान्य व्यवहार है ।

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

अनगिनत छेद है ।

बीते सालों में,
ज्यादातर घर पर ही रहा ।
घर की अपनी महिमा होती है।
घर निजता प्रदान करते हैं,
और निजी मामले भी तैयार करते हैं।

जो हर मामले को,
निजी करके टालता हो,
उसे व्यक्तिगत विषयोँ पर टिप्पणियॉ,
कम ही मिलती है ।

समाज और व्यक्तिगत जीवन में,
कुछ तो अन्तर होना चाहिए,
और सारा जीवन ही,
व्यक्तिगत नहीं होना चाहिए।

जैसे दीवारों के कान होते है ।
वैसे ही घर की दीवारों में,
एक और भी बात होती है,
तोड़ने और जोड़ने की,
क्यों कि जब बात,
हद से ज्यादा बढ़ जाती है तो,
ये ऐसे ही समाज से हमें जोड़ती है ।

अब जब मौके आए है,
महसूस करने को कि,
क्या क्या गलत किया था, मैंने?
ताकि सुधार,
गलतियों के आदत में ,
तब्दील होने से पहले,
पहल हो जाए।
तो मालूम होता है कि ,
ऐसे दल-दल में फंसे हुए को देखकर,
जिंदगी कि नई सीख समझाईस यही है ।
कि अम्मा की हर बात का तपाक से ,
जवाब न देकर, मौन हो जाये ।

वैसे भी अपनी ग़लतियाँ खुद को कहाँ दिखती है ?
वो तो दूसरों में नुक्स और नखरे गिना रहे थे तो,
याद आया ऐसा तो कुछ हमारे पास भी है ।
मगर अब जब समझ ही गए है ।
तो बात को क्यों इतना घुमाना,
जो जब समझा सो तब सुधरा ।