बंदरों के मनुष्य बनने की कहानी में एक बात छुपी है । और वह बात यह है कि बंदरों ने न केवल अपने चलने के ढंग में बदलाव लाया बल्कि वे अब सीधे खड़े भी हो सकते थे । सीधी रीढ़ की हड्डी हमेशा से कुछ कमाल करने के लिए होती है । अब बन्दर सोच पा रहे थे कि चार पैरों के बजाय दो पैरो पर चलना बेहतर है; और बचे दो पैरों से कुछ नया किया जाये । ये सोचने की कला ही थी कि बंदर से मनुष्य का बदलाव एक बड़ा बदलाव बनकर रह गया । इसके बाद मनुष्य लंबे समय से मनुष्य ही है ।
लेकिन प्रश्न ऐसे में उठना लाज़मी है कि मनुष्य होने का क्या अर्थ है ? वास्तव में मनुष्यता मानवता के ज्यादा नजदीक की चीज़ है या व्यक्तिवाद के । हम जब बहुत ध्यान से सोचते है तो व्यक्तिवादी हो जाते हैं लेकिन हमारा आखिरी लक्ष्य हमेशा मानवता के लिये जीने की आकांक्षा को समर्पित होता हैं । ऐसे में मार्क्स की बातें भी सच लगती है कि मनुष्य का 80 प्रतिशत तक संतोष स्वा को समर्पित हो सकता है लेकिन बाकि 20 प्रतिशत समाज का हित करने के बाद आता है ।
अब जब कि मनुष्य होने की सीमा कुछ हद तक खिंच गई है तो क्यों न इसे और स्पष्ट किया जाये । इस स्पष्टीकरण की प्रक्रिया में बुद्ध, महावीर, सुकरात, प्लूटो, अरस्तु, अरिस्टिपस, चर्वाक, सेरेनैक, स्टोइक, स्पेंसर, कांट, मिल, बेंथम, गांधी, टॉलस्टॉय आदि ने अपनी बारी आने पर योगदान दिया । ऐसे प्रयासों से थोड़ा-थोड़ा करके नैतिकता के प्रतिमान ईंट दर ईट जुड़ते गए और आज की आँखों से अतीत के इस प्रकल्प को देखने पर बोझा भर किताबें, परम्पराएँ, सीख, नियम, बंदिशे, कर्मकांड आदि दिखते हैं ।
इन्हीं सब नैतिकता के पूर्वजों के बीच एक संप्रदाय सिनिक का भी था । जैसे सब कह रहे थे इन्होंने ने भी कुछ कहने के लिए एक विचार की स्थापना के उद्देश्य से जीवन में मानवता के उद्भव के लिए परिवर्तन किये । ये सड़कों पर लोटते, दुःख का कारण ढूंढते । इन्हें ऐसा लग रहा था मानों वैराग्य की अवस्था जो कि इन्द्रियों के शिथिल हो जाने की अवस्था होती है, दुःख की मनः स्थिति के समतुल्य है । ये इस बात को साबित करने के लिए अपने समय में पगलाये हुए थे ।
लेकिन इनके लिए मेरे पास एक जवाब है। जब इनके बारे में जाने बगैर मैं अपने अनुभव के आधार पर दुःख को नैतिकता के लिए आवश्यक मान बैठा था तब मुझे ये अंदाजा नहीं था कि दुःख वास्तव में सीमित और क्षणिक प्रकार की मनः स्थिति में ले जाकर छोड़ देगा । दुःख के साथ मन सुधरता है। दुःख मन को मांजता है और कुछ करने लायक बनाता भी है । लेकिन जो मैं कहता हूँ उस पर भरोसा कीजिये दुःख आपको कभी भी बड़ी देर तक संघर्ष करने लायक नहीं बना पाता है । अंततः आप देखते है कि यह निराशा तो पंचर नाँव के भाँति हो गयी है, और अपने लक्ष्य को पाने के लिए आप असीम आशा की ओर बढ़ते है । आप एकाएक यह समझ जाते हैं कि दुःख से एक निश्चित दूरी तक ही यात्रा की जा सकती है जैसे कि गाड़ी का तेल ही ख़त्म हो गया हो वैसे ही दुःख भी अब जीवन में अपना महत्त्व खो चुका है । दुःख गाड़ी को स्टार्ट करने के लिए पहले गियर का काम करता हैं; उसके बाद गियर बदलना होगा ।
मैं यह पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि दुःख को जीवन में अपना जितना आप सम्भले है उससे ज्यादा आप जीवन में सुख को छोड़ कर संभल सकते हैं । शायद यदि सिनिको कि कोई मार्गदर्शिका होती तो उसका दूसरा अध्याय सुखों का परित्याग होता न कि पहले अध्याय दुखों के स्वांगिकरण का वृहद् पैमाने पर दोहराव ।
मैं यह नहीं कहता कि मुझे दुखों के अपनाने के दौरान लाभ नहीं हुआ, लाभ हुआ है । लेकिन अब दुःख सर दर्द बन गए है और संतरे के ऐसे गुझ्झे के समान हो गए है जिनमें नैतिकता को पोषित करने लायक रस एकदम बचा ही न हो । इसलिए रणनीति को बदलना पड़ रहा है । और दुखों को अपनाने के बजाय सुखों को छोड़ने की रणनीति को वरीयता देना पड़ रहा है । जब आप कोई कठिन लक्ष्य साधना चाहते हैं तो आपकों उस स्तर के व्यक्तित्व का भी निर्माण करना होता हैं । ऐसे में एक दृढ़ इच्छा शक्ति की भी जरुरत होती है और एकाग्र मन की भी । ये तीनों एक सशक्त व्यक्तित्व, दृढ़ इच्छा शक्ति और एकाग्र मन केवल दुःख के स्वार्थपूर्ण स्वांगीकरण से नहीं आ सकता है। इसके लिए जीवन में सुखों का भी नियमन उतना ही अनिवार्य है ।
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