शनिवार, 24 सितंबर 2016

ये क्या कर दिया ?

नहीं रहा गया ,
नहीं सहा गया ,
सो चुन लिया ।
एक को ,
छोड़ दिया एक को ।
विकल्पों के द्वंद्व में हमेशा ,
कभी इस पाले।
कभी उस पाले ।
लड़ने का काम तो था ।
जीने का काम तो था ।
मगर विकल्पों के द्वन्द्व का ,
समाधान न था ।
किसे छोड़ देता ?
किसे न बोल देता ?
सब समझ के परे था ।
ऐसे में,
ये क्या कर दिया ?

बोला था घर आने को ,
फिर जान गवाने को ,
क्यों मना नहीं कर दिया ?
प्रतीक्षा के प्रत्युत्तर में
मौन से प्रहार किया ।
कितनी आसानी से कर्तव्य के
स्तरीकरण की पहेली को
बूझ लिया ।

घर पैसा भेजना था आज ,
क्या आज पीछे हट नहीं सकता ?
घर फ़ोन करना था आज ,
क्या एक बार फ़ोन नहीं कर सकता ?
सामने से चल रही गोलियों को ,
रोकने का काम कल तक नहीं टाला जा सकता ?
मेरे असहाय परिवार के लिए,
क्या दुश्मनों को थोड़ा कब्ज़ा नहीं दे सकता ?
मैं अपनी जान के बदले ,
अपने कुँवारे अनाथ साथी को ,
नहीं मरवा सकता ?
क्या मैं भाग नहीं सकता ?

कितने सारे प्रश्न है ?
समय कम है ।
और उत्तर देने नहीं चुनने है ।
घर पैसे तो पहुँच ही जायेंगे ।
इसलिए मर सकता हूँ ,
घर फ़ोन कर नहीं सकता ।
पर पिछले महीने तो किया था ।
इसलिए मर सकता हूँ ।
गोलियों को मुझसे अच्छा कौन रोक सकता है ?
इसलिए मैं मर सकता हूँ ।
मेरा परिवार असहाय है ,
पर मैं गद्दार, कमजोर और नालायक नहीं ,
इसलिए मैं मर सकता हूँ ।
मुझसे पहले मेरा कोई साथी जान दे ,
ये नहीं हो सकता ,
मैं भाग कर यहाँ आया हूँ,
यहाँ से भागने नहीं ,
इसलिए मर सकता हूँ ।

हर बार ड्यूटी पे ,
हर जवान वर्दी में ,
बिना वर्दी के ,
बंदूक के साथ ,
बिना बन्दूक के खाली हाथ ,
सवाल हल कर रहे होते हैं ।
इसलिए,
जान देना ,
सिर्फ मर जाना नहीं है ।

ये अनुमानित फैसला है ।
तौला हुआ फैसला है ।
सोचा हुआ फैसला है ।
जाँच परखा हुआ फैसला है ।
जो,
दिमाग और आत्मा में ,
गहराई तक धँसा हुआ है ।
जो बदलने वाला नहीं है ।
इसलिए एक जवान का मर जाना ,
सिर्फ सुपुर्दे खाक हो जाना नहीं है ।
उनके लिए जो मरने के पहले सोचते हैं ,
और जो नहीं सोचते ।

यह त्वरित आवेग पूर्ण ,
वो आत्मनिर्णय है ।
जिसमें हानि-लाभ,
शुभ-अशुभ को ध्यान में रखकर ,
सर्वकालिक नैतिक शुभ के लिए ,
लिया गया ।

यह निर्णय बदलता नहीं ,
केवल घर के लिए ।
इतना सोच कर भी ।

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