रविवार, 8 मई 2016

क्योंकि बच्चों ने देखा है माँ किस तरह पिता जी से बात करती है !!!!

किसी भारतीय महानगर के एक प्रगतिशील परिवार के घर के भीतर का हाल लेकर आया हूँ आपके लिए । परिवार में सिर्फ दो और उनके दो है । विपिन , रिंकि से छोटा है । विपिन और रिंकि कि माँ एक वर्किंग वुमन है और पापा घर संभालते है ।  मतलब पापा कुछ नहीं करते है ।  (अब आगे )


बच्चो ने अपनी आंखों से देखा है अपने प्यारे पापा को दिन भर घर का काम करते हुये । झाड़ू, पोंछा करते-करते उनकी तो कमर ही टूट जाती होगी । उसके बाद खाना भी तो बनाना पड़ता है । सुबह जल्दी उठकर दूध लेने जाना होता है और मम्मी के लिए चाय भी बनानी पड़ती है क्योंकि तभी मम्मी कि नींद खुल पाती है । थोड़ी सी भी अगर देर हो गई तो मम्मी तो पापा पर बहुत गुस्सा होती है । इन सबके बाद भी मम्मी तो कितना घूमती है पर पापा दिन भर घर के काम मे लगे रहते हैं । ऐसे में विपिन, हमने जो मदर्स डे के गिफ्ट के लिए पैसे सेव किए है उन पैसों से हम फाथर्स डे पर पापा को गिफ्ट देंगे । मजे की बात ये है कि फथर्स डे ,मदर्स डे के बाद आता है । ( बच्चों  ने  तो मदर्स डे कि हवा ही निकाल दी )

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बहुत पढ़ा भैया और खूब पढ़ा । क्या चातुर औलाद पाई है, तूने माँ । तेरे एहसानों को तुझको ही गिना-गिना के तेरे ही एहसानों में तुझे कैसा बंधा है ? वैसे तो कहने को पक्के दोस्त को थैंक यू नहीं बोलती हमारी ये पीढ़ी और मदर्स डे पर कैसे कृतज्ञता से लहूलुहान हो रही है । 
ये सब कुछ नहीं चोचले है इनके। डर गए है । ये आज कि औरत को कल कि माँ वाली कड़ुवाहट भरी जिंदगी थोपने के प्रपंच रचे जा रहे हैं । देखो आज कि लड़कियों  घर में रहकर चूल्हा चौका करना कितना महानता का काम है। गोल-गोल मकई कि रोटी बनाओगे तो एक दिन साल मे तुम्हारा बेटा तुमको शाबासी देगा ।
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जी जल जाता है, साहब ऐसे कपटी षडयंत्रो से । माँ को माँ बने रहने में  किसका हित है ये सब जानते हैं । उसके ऐसे घूचू बने रहने से खाने, धोने का टेंशन दूर रहता है माथे से । घर का काम करने वाला कोई तो चाहिए होता है न की नहीं । 
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मार्क्स ने सच ही कहा था, पूंजीवादी समाज के पनपने कि एक अनिवार्य शर्त है कि नारी को उसके शोषण का बोध न होने पाये। और भारत जिस पूंजीवादी समाज के रास्ते पर चल रहा है उसमें ऐसा बिलकुल होते दिख रहा है 

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गली के चलताऊ भाषा में  बोलू तो माँ कसम ये पुरुष वादी मानसिकता का खेल है, मायाजाल है और साहब एक और बात है नारीवादी चिल्ला-चिल्ला के कहते हैं  कि स्त्री पैदा नहीं होती बल्कि बनाई जाती है । क्योंकि कि मैं ने आज तक एक दिन ऐसा नहीं सुना जब भारत में ये कहता हो कोई कि " वर्किंग मदर्स डे " मनाएंगे । ऐसा तो हो नहीं सकता न , क्योंकि ऐसे में इन रूढ़िवादियों कि जान चली जाती। मुझे आश्चर्य नहीं है कि बजरंगदल के जोशीले नवजवान मदर्स डे का विरोध क्यो नहीं करते, कारण साफ है ऐसा कर पाने के लिए उनको समझ में भी तो आना चाहिए कि गलत क्या है ? और सही क्या है ? ,वो तो  भेड़ चाल चलने के माहिर है । 
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ऐसे में एक शानदार स्लोगन याद आता है कि स्त्री वो सब करने के लिए नहीं बनी है जो पुरुष करते हैं बल्कि वो तो वो सब भी करने के लिए बनी है जो पुरुष नहीं कर सकते हैं  ।  ऐसा क्या हो गया कि पुरुषों के रिकॉर्ड बनाने  का इंतज़ार करें  , और फिर उन रिकॉर्ड को तोड़ने वाला बने। 
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लेकिन मजे कि बात ये है कि इतने प्रपंचो के बाद भी बदलाव कि लहर तो चल चुकी है। विदेशों में और कुछ भारतीय महानगरों में अब ये चलन बढ़ रहा है जब परिवार में पिता घर संभालते हैं और माता काम पर जाती है। ऐसे परिवारों मे फथर्स  डे ज्यादा दिलचस्पी से मनाया जाता है, न कि मदर्स डे क्योंकि बच्चों ने देखा है माँ किस तरह पिता जी से बात करती है।

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