यह एक लेख शृंखला है। जिसके इस भाग में मानव मन से संबन्धित विषय की चर्चा की गई है। मनुष्य के जीवन में विजय का वास्तविक अर्थ स्वयं पर विजय से लगाया जाता है और स्वयं पर विजय अर्जित करने वाले को स्वामी कहते हैं जैसे स्वामी विवेकानंद । ऐसा हम अक्सर सुनते हैं कि यदि किसी क्षेत्र में सफलता प्राप्त करनी है तो पहले स्वयं पर नियंत्रण करों। यहाँ स्वयं पर नियंत्रण से अर्थ अपनी अनावश्यक इच्छाओं पर नियंत्रण से है। जिसके लिए इच्छाओं का विज्ञान समझना जरूरी है । इच्छाओं के गुण-धर्मों को जानकार हम आत्मनियंत्रण के लक्ष्य को आसान बना सकते हैं ।
आगे इच्छाओं के कुछ समान्यतः प्रदर्शित होने वाले लक्षण दिये गए है। और इसके साथ ही उनका विस्तृत विवरण भी दिया गया है । ऐसे में इस जटिल विषय को समझने में सामने आने वाली कठिनाइयों को दूर करने के लिए इस लेख का विस्तार अधिक हो जाने के कारण इसे एक लेख में न समेटकर एक लेख शृंखला के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है । यह लेख श्रृंखला का पहला भाग है जिसमें इच्छाओं के पहले सात गुणधर्मों की विस्तार से चर्चा की गई है। आप से अपेक्षा की जाती है कि आप निश्चय ही स्वा अनुभव से अधोलिखित बातों को आसानी से समझ पाएंगे। चूँकि विषय भिन्न प्रकार का है इसलिए किसी बिंदु पर शंका होने पर आपके सुझाव एवं राय सम्मानीय और ध्यात्व है जिस पर प्रत्युत्तर अवश्य दिया जायेगा। आप अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में दे सकते हैं। उम्मीद है ये लेख आपको बाकि लेखों की तरह पसंद आएगा और जीवन जीने की कला का एक नया पायदान आप झट से चढ़ जायेंगे।
इच्छाओं के सामान्यतौर पर देखी जा सकने वाली विशेषताएँ निम्नलिखित है :
1) मानवीय इच्छाएँ अनंत होती है ।
2) मानवीय इच्छाओं का एक निश्चित जीवन चक्र होता है ।
3) बड़ी इच्छा छोटी इच्छाओं का आच्छादन कर लेती है ।
4) मानवीय इच्छाओं कि उत्पत्ति बुद्धि को शिथिल कर देती है ।
5) इच्छाओं में बल होता हैं।
6) इच्छाओं कि उत्पत्ति और उनका बलवती होना लगभग एक अनुत्क्रमणीय प्रक्रिया है ।
7) इच्छाएँ इंद्रियों से जुड़ी हुयी होती हैं ।
8) प्रायः एकल इंद्रि से संबन्धित इच्छा बहुल इंद्रि से संबन्धित इच्छा से कम प्रबल होती है।
9) इच्छाओं कि संतुष्टि संभव है।
10) इच्छाओं को नियंत्रित किया जा सकता है ।
11) इच्छाओं कि व्युत्पत्ति कि एक पृष्ठभूमि होती है ।
12) इच्छाएँ मानवीय आदत में तब्दील हो सकती है ।
13) इच्छाएँ विरोधाभाषी होती है ।
14) मानवीय इच्छाएँ प्रायः शुरू में सुखदायक और बाद में दुख दायक होती है आदि।
हम एक-एक कर इच्छाओं कि उपरोक्त लिखित विशेषताओं को विस्तार से देखते हैं । इस भाग में हम शुरू कि विशेषताओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे जबकि शेष पर चर्चा लेख के अगले भाग में किया जायेगा।
1) मानवीय इच्छाएँ अनंत होती है : इसका अत्यन्त सरल-सा अर्थ है कि एक इच्छा के पूर्ति के पश्चात वही इच्छा या दूसरी इच्छा मन में जन्म ले लेती हैं। इच्छाओं की उत्पत्ति मन में ही होती हैं या ये मन से परे विषय हैं इस बात से अलग इच्छाएँ निरंतर जन्म लेती रहती हैं। इनके विकास का एक निश्चित चक्र होता है। ये जन्म लेती हैं , नियंत्रण कर सकने तक मन में रहती है और अंततः परिपक्व होकर सतुष्ट हो जाती है।
2) मानवीय इच्छाओं का एक निश्चित जीवन चक्र होता है : इनके विकास का एक निश्चित चक्र होता है। ये जन्म लेती हैं , नियंत्रण कर
सकने तक मन में रहती है और अंततः परिपक्व होकर सतुष्ट हो जाती है। और या तो पुनः जन्म लेती है या इनका स्थान कोई और इच्छा ले लेती है। इसप्रकार ये चक्र निरंतर चलता रहता है। जैन दर्शन के अनुसार इन इच्छाओं के कारण ही मनुष्य मुक्त अर्थात निर्वाण को प्राप्त नहीं कर पता है।
3) बड़ी इच्छा छोटी इच्छाओं का आच्छादन कर लेती है : मनुष्य के दैनिक कार्यकलाप के कारण बिना किसी कारण के स्वतः ही कुछ इच्छाएँ वरीयता क्रम में पहले आ जाती है और कुछ बाद में । ऐसे में जब तक वरीयताक्रम में पहले कि इच्छा संतुष्ट नहीं होती तब तक बाद वाली इच्छा बलवती नहीं हो पाती है और इच्छाओं का जीवन चक्र बाधित हो जाता है। ऐसे में कई लाभ होते है। व्यक्ति को जीवन में कुछ परिवर्तन करने का अवसर मिल जाता है। कभी-कभी वरीयता क्रम में ऊपर की इच्छा सामान्य सी होती है पर उसके नीचे की इच्छा हानिकारक होती है। ऐसे में चक्र के बाधित होने से व्यक्ति बाद वाली इच्छा के नुकसान से बच जाता है। लेकिन ये तब तक ही चल पता है जब तक व्यक्ति स्वयं इस वरीयताक्रम को नहीं तोड़ता या बाह्य सहायता से वरीयताक्रम के नीचे की इच्छा को स्वयं ही उत्तेजित नहीं करता है।
4) मानवीय इच्छाओं कि उत्पत्ति बुद्धि को शिथिल कर देती है : इच्छाओं की उत्पत्ति बुद्धि को एकाएक शिथिल तो नहीं कर देती है पर प्रबल होने के साथ बुद्धि को शिथिल करती जाती है। बुद्धि के शिथिल होने से मनुष्य सही और गलत का निर्णय नहीं कर पता है। और ऐसे में उसे कई बार भयानक नुकसान सहना पड़ता है। बुद्धि के शिथिल होने पर मनुष्य स्वयं पर से नियंत्रण खो देता है जिसके दूरगामी हानिकारक परिणाम सामने आते हैं।
5) इच्छाओं में बल होता हैं : इच्छाएँ अत्यंत बलवती होती है और निरंतर बलवती होती जाती है। इच्छाओं को कुछ देर तक तो रोक जा सकता है परंतु उनके बल को कम नहीं किया जा सकता। इच्छाओं के पूर्ण होने को विलम्ब किया जा सकता है परन्तु कदापि स्थगित नहीं किया जा सकता है।
6) इच्छाओं कि उत्पत्ति और उनका बलवती होना लगभग एक अनुत्क्रमणीय प्रक्रिया है : इच्छाओं के निर्माण और उनका बलवान होना एक दिशा में जाने वाली प्रक्रिया है उसकी दिशा को पलटा नहीं जा सकता है।
7) इच्छाएँ इंद्रियों से जुड़ी हुयी होती हैं : इच्छाओं के इन्द्रियों से जुड़े होने से आशय इच्छाओं के उद्गम का स्थान बताना नहीं है। इच्छाएँ शरीर से भिन्न और मन के सहारे जीवित रहती है। मगर इच्छाएँ इन्द्रियों के सहारे शरीरी का भोग करती है। ज्यादा से ज्यादा इन्द्रियों से जुड़ी इच्छाएँ ज्यादा आनंद देती है। एक इंद्रि से जुड़ी इच्छा प्रायः दो या तीन इंद्री से जुड़ी इच्छा से ज्यादा बलवती और सुखदायक होती है। उदाहरणार्थ सूखे मुँह फिल्म देखने में और पॉपकॉर्न के साथ फिल्म देखने के फ़र्क़ को लेकर समझा जा सकता है।
6) इच्छाओं कि उत्पत्ति और उनका बलवती होना लगभग एक अनुत्क्रमणीय प्रक्रिया है : इच्छाओं के निर्माण और उनका बलवान होना एक दिशा में जाने वाली प्रक्रिया है उसकी दिशा को पलटा नहीं जा सकता है।
7) इच्छाएँ इंद्रियों से जुड़ी हुयी होती हैं : इच्छाओं के इन्द्रियों से जुड़े होने से आशय इच्छाओं के उद्गम का स्थान बताना नहीं है। इच्छाएँ शरीर से भिन्न और मन के सहारे जीवित रहती है। मगर इच्छाएँ इन्द्रियों के सहारे शरीरी का भोग करती है। ज्यादा से ज्यादा इन्द्रियों से जुड़ी इच्छाएँ ज्यादा आनंद देती है। एक इंद्रि से जुड़ी इच्छा प्रायः दो या तीन इंद्री से जुड़ी इच्छा से ज्यादा बलवती और सुखदायक होती है। उदाहरणार्थ सूखे मुँह फिल्म देखने में और पॉपकॉर्न के साथ फिल्म देखने के फ़र्क़ को लेकर समझा जा सकता है।
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