लगभग सब कुछ ठीक ही था। जिस समय की बात है
उस समय एक बेटा और दो बेटियाँ होना शायद कोई बड़ी बात नहीं थी। घर भी नौकरो से गुलजार था। प्रेमचंद लिखते है निर्मला के लिए
शादी का रिश्ता आया है। रिश्ता एक अच्छे परिवार से आया है, लड़का
काफी पढ़ा लिखा और परिवार भी खानदानी है। लेकिन ये क्या?
विवाह की तैयारियों के बीच निर्मला के पिताजी की हत्या हो जाती है। अब निर्मला का
विवाह उस परिवार मे न हो सकेगा क्योंकि वो बड़े खानदानी है और उनकी नजर लड़की के साथ-साथ लड़की के पिता की दौलत पर भी थी ।
(आर्थिक कारकों को व्यक्ति इतना महत्व
क्यों देता है? क्या आर्थिक कारक सचमुच मे महत्वपूर्ण है ? समाज के द्वारा पैसो को महत्व देने पर व्यक्ति भी पैसो को महत्व देने
लगता है या व्यक्ति के द्वारा पैसो को महत्व देने पर समाज भी उसी अनुसार चलने लगता
है । दोनो मे से कोई भी बात पूरी तरह सही नहीं है । आंशिक रूप से दोनों का ही
प्रभाव रहता है। ये एक दूसरे के समानार्थक नहीं अपितु पूरक है।)
अंततः निर्मला का विवाह वहाँ नहीं हो पाया जहा
उसके पिता स्वर्गवासी होने के पहले तय करके गए थे , ये केवल नारी के शोषण की
गाथा नहीं है, ये उसके अभावग्रस्त और निर्धन होने की मजबूरी
है। निर्मला जैसी सुकुमारी का विवाह एक अधेड़ उम्र के सेठ से होने की घटना अधेड़ के
केवल सुखवादी होने की बात नहीं है बल्कि उसके धनाढय होनी की खशियत है।
(इसी बीच प्रेमचंद लिख ही देते है पैसा सब
कुछ नहीं है लेकिन जो चीज़ सब कुछ है उसके बहुत करीब की चीज़ पैसा है। इसीलिए शायद
भगवान विष्णु मोक्षदाता है तो देवी लक्ष्मी धन देवी है । लीजिये सबकुछ के नजदीक तक
धन पहुँच गया ।)
इस सब के बीच दो नवजवानों के मन की
उधेड़बुन को सुनते है और देखते है आज का मन क्या कहता है ? रोशनी
आज के जमाने की लड़की तो नहीं है पर उसे आज के जमाने के अंदाज़ो को अपनाने से गुरेज
भी नहीं है। ज्यादतरो की तरह उसने भी अपने साथी के साथ जीने मरने की कसमे खाई थी
। लेकिन अचानक समय के गुजरने के साथ क्या हुआ , किसी को पता
नहीं ? रोशनी का करीबी उसका हमदर्द,
उसका पहला प्यार मृणाल आज एक मध्यम दर्जे की आय कमाता है। उसकी तंखावह कोई 20000 रुपये महीने है , शायद बाद मे बढ़ भी जाए लेकिन अभी तो इतनी ही है । ऐसे मे अगर दोनों की
शादी हो जाए तो जितना मैं जनता हूँ मृणाल रोशनी को हर संभव सुख देने का प्रयास करेगा । लेकिन एक दिन रोशनी के लिए एक रिश्ता आता है परिवार काफी खानदानी है , लड़का काफी पढ़ा लिखा है और कमाता भी अच्छा है । ऐसे मे इस बात को रोशनी
मृणाल को बताती है और दोनों कुछ बाते करते है –
रोशनी – मुझे तो बहुत अजीब लग रहा है ।
पता नहीं पिता जी क्या निर्णय लेंगे ? उनको तो मेरे और तुम्हारे बारे मे सब पता है
।
मृणाल – तो वो लड़को वालों को माना क्यों
नहीं कर देते ।
रोशनी – कैसे कर दे ? पिता जी कहते है - ऐसा
खानदानी परिवार और रिश्ता फिर मिले न मिले क्या पता ?
मृणाल – लड़का मुझे से ज्यादा कमाता है ।
रोशनी- हाँ ! उसकी शुरुआती तंख्वाह कोई
60000 है और पिताजी का कारोबार भी है। महीने के यही कोई मोटा-मोटा डेढ़ लाख रुपये
घर आते है ।
क्या इनके बीच की बातो को हमे और आगे भी
सुनना चाहिए, मुझे लगता है नहीं । क्योंकि रोशनी एक समझदार लड़की है। उसकी
किस्मत अगर निर्मला के जैसे हुयी तो एक हाथ मे उसके मृणाल जैसा प्रेमी है और सब
कुछ ठीक रहा तो शानदार कमाऊ पति । हाँ ! मैंने तो मृणाल को रिजैक्ट कर दिया
क्योंकि पति कमाऊ ही अच्छा लगता है। वैसे भी समाज में सम्बन्धो को गढ़ते समय लड़के की आय और लड़की की सुंदरता समानुपातिक रूप से तौली जाती है।
इसप्रकार की द्वन्द्वत्म्क परिस्थितियो मे
या तो मृणाल रोशनी से ये कहकर पहले दूर हो जाए कि उसे कोई लाइलाज बीमारी हो गई है
और वो ज्यादा दिनो का मेहमान नहीं है। और ऐसा कहने मे कोई हर्ज़ भी नहीं है क्योंकि अभावग्रसत्ता एक बीमारी ही है, एक लाइलाज बीमारी । या इंतज़ार करे कब रोशनी
उसे अपने जीवन से निकाल उसी तरह फेंक देती है जैसे लोग दूध मे से मक्खी को निकाल फेंक दिया करते है।
ऐसे मे क्या ये निष्कर्ष निकालना सही नहीं
होगा कि जो संबंध बनते भले ही भावनाओ के आधार पर है पर उनका जीवनकाल भावनाओ पर
नहीं टीका होता ।
गरीबी पैसे का अभाव है और भुखमरी को
जनमती है । भुखमरी अनाज की कमी नहीं है । ये पैसो के अभाव मे खाना न खरीद पाने की मजबूरी है। सरकार कहती है जिसके पास पैसा है उसके हिस्से का अनाज गोदाम
मे रखा है और जिसके पास पैसे नहीं है उसके हिस्से के अनाज को चूहे खा गए ।
सरकार ने व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के
लिए बोलने कि, घूमने कि, कही भी बसने, किसी भी धर्म को मानने कि स्वतन्त्रता तो दी है लेकिन इससे पहले उसने
व्यक्ति को समानता दी है। समानता आर्थिक क्रियाओ मे भागीदार होने का। ये समानता
के अधिकार के कवर मे आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार छुपा हुआ है। ये आरक्षण केवल
समानता नहीं, आर्थिक स्वतंत्रता है क्योंकि वो धन ही है जो जाति से टक्कर ले सकता है।
दुनिया मे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने
के बाद व्यक्ति सिर्फ आयकर विभाग के प्रश्नो का जवाब देने के लिए बाध्य होता है ।
ऐसा जीवन एकाकी नहीं होता, चाटुकार हमेशा साथ होते है , बोरियत भी नहीं होती ।
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