सुख में कैसे आनन्द हो सकता है ?
मुझे समझाओं,
खीर खाने तक,
मुँह मीठा रहता हैं ।
खिलौने के लिए बच्चा रोता हैं ।
दूसरे पल ही तोड़कर,
हँसता है ।
शाश्वत मिलन में ,
किसी सम्बन्ध की निष्ठा की
कैसी परीक्षा हो सकती है ?
ये मन तो,
वियोग की कामना में रमता हैं ।
रुक-रुक कर सीने में,
वेदना उठती है ।
मन घुटने टेककर निहत्था होता है जब,
तब शूलों से खरोंच के,
स्याही लाता हूँ ।
और मिलन की कटु यादों,
को लिखता जाता हूँ ।
मुझे समझाओं,
सुख में कैसे आनन्द हो सकता है ?
जो मिलता है,
वो खोता है ।
हंसने वाला,
रोता हैं ,
देख-देख कर मन के भीतर जो होता हैं ।
जब-जब जोर-जोर से,
हंसने वाला रोता है ।
नियति के चक्कर में पड़कर ।
मन को घायल करने को,
आमादा पागल,
चाले रच-रच चलता हैं ।
रोज बिछुड़ता है मिलने को,
मिलता है बिछुड़ने को,
कुछ भी कह लो,
दिल तो टूट ही गया ।
पूँछोगे नहीं किसका ?
पागल की प्रेमिका का ।
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