क्यूँ ? अजीब सा शीर्षक है न । भला अपनी असफलता को कोई क्यों देखना चाहेगा ? और यही कारण है कि लोग असफलता के भय से पलायनवादी हो जाते हैं । लेकिन सच-मुच में जीवन के प्रबंधन का सुंदर-सा सूत्र है अपनी असफलता को देखना । मगर कैसे ?
इस लेख में हम मुख्यतः इन्ही दो प्रश्नों पर विस्तार से चर्चा करेंगे कि पहला , अपनी असफलता को देखना क्यों आवश्यक है ? और दूसरा ऐसा हम कैसे कर सकते है ?
मुझे इस तरह के जीवन जीने की कला के माला के कुछ मोतियों से जब भी स्पर्श होता है मैं उन्हें आप सबसे बाँटने चला आता हूँ । इस लेख का श्रेय मैं उन हज़ारो लोगोँ को देना चाहूँगा जो फेल होने के लिए लड़ते है और अंततः साक्षी भाव से स्वयं का आत्म मूल्यांकन करके अपनी कमियों को दूर करते हैं । ये लोग सच-मुच के आम इंसान है जिन्होंने एक सच-मुच के गलत तरीके से शुरू करके सचमुच के सही तरीके से मन माफ़िक सफलता हासिल कि । ये लोग इतने आम और साधारण होते है कि इनकी शुरुआत बिलकुल कछुए की भांति धीमी और आंधी में उड़ते पत्तों की तरह दिशाहीन होती है । लेकिन इन लोगों में दिवार पर चढ़ने वाली मकड़ी की तरह बार-बार प्रयास करने की क्षमता भी होती है। बस यही वो बात है जो साधारण से झारखंडी को धोनी और एक बिहारी को मनोज बाजपेयी बना देती है। इसके आगे ये हाल उन सभी का होता है जो प्रतिस्पर्धा के भवर में फँस जाते हैं। ऐसे में हम भी कैसे जीरो से हीरो बन जाये यही तो सीखना है ? और यह लेख भी इसी उद्देश को लेकर अनसुलझे प्रश्नों का आम सी लगने वाली रोजमर्रा के अनुभव से हल खोजने का अथक प्रयास करता है।
ऐसे में मुझे वह क्षण याद आता है जब मैं सिविल सर्विसेज की परीक्षा में पास हुए दो प्रतिभागियों के व्यूज यूट्यूब पर देख रहा था। उनमें से एक प्रतिभागी ने अपने आखिरी प्रयास अर्थात् छठवे प्रयास में उच्च पद प्राप्त किया और ऐसा ही कुछ दूसरे प्रतिभागी की भी सफलता का हाल था । परन्तु इन दोनों में एक और बात कॉमन थी । और वो बात ये थी कि दोनों ने अपने वक्तव्य के दौरान कहा कि हमने अपना पहला प्रयास यूँ ही हल्के में गवाँ दिया मगर दूसरे प्रयास में हमने जम कर मेहनत कि, पर फिर भी सिफर ही हाथ लगा ऐसे में यह जानना यहाँ रोचक होगा कि दूसरे प्रयास में दोनों ने अपने असफल होने की बात बताते हुए जो कहा वो बेहद शिक्षाप्रद और रोचक क्यों था ? और जो इस लेख का शीर्षक भी हैं । तो आप समझ ही गए होंगे कि उन्होंने क्या कहा - उन दोनों ने ही कहा कि हम पहले प्रयास की तुलना में अपनी असफलता को दुसरे प्रयास में ज्यादा करीब से देख पाये ।
ऐसे में यहाँ पर अपने पहले प्रश्न को लेने का सही समय आ गया है कि अपनी असफलता को करीब से देखने का अर्थ क्या है ?
देखिये जीवन एक ही है और उसी में जीना भी है उसी में प्रयोग भी करना है। ऐसे में ये स्वाभाविक ही है कि या तो आपके पास या किसी के भी पास जीवन जीने के कुछ मूलभूत फ़ॉर्मूले होंगे। मगर जीवन गणित या भूगोल नहीं है जीवन पहेली है जिसे सुलझाना पड़ता है। यह एक मैट्रिक्स है। यह दर्शन की प्रयोगशाला है और कुछेक का पसंदीदा खेल भी। इसलिए हमेशा एक फ़ॉर्मूला बहुत काम का होता नहीं हैं । कठिन परिस्थितियों में बेहतर यही होता है कि हम कुछेक समस्याओं का हल रटने के बजाय अपनी प्रॉब्लम सोल्विंग स्किल्स को ही शार्प कर ले ताकि किसी भी रैंडम प्रॉब्लम को झट से सॉल्व कर सके। हम सभी इस तथ्य को जानते हैं की जब हम छोटे थे तो परीक्षा के लिए किंचित प्रश्न मात्र रट कर अंक ला लेते थे मगर हम जैसे बड़े हुए प्रश्नों को रटने के बजाय उस मूल अवधारणा या कांसेप्ट को समझने पर जोर देने लगे जिस पर बहुत सारे प्रश्न आधारित होते हैं। और इसप्रकार हम कम समय में ज्यादा सटीक तैयारी कर लेते हैं। लेकिन इसके आगे की स्थिति में जब हमारे कांसेप्ट भी किसी समस्या को हल करने में कमतर साबित हो तो एक मात्र रास्ता बचता हैं ट्रायल एंड एरर मेथड। अब तो आप सभी समझ ही गए होंगे की मेरा इशारा किस ओर हैं। हम जब भी कोई परीक्षा देते हैं तो उसे हमें एक ट्रायल की तरह लेना चाहिए और यदि हम असफल हो जाते हैं तो एरर को पहचान कर कुछ लिमिट्स और कंडीशन स्वयं ही तय कर लेनी चाहिए। इसतरह हम कई तरह के फायदे मिलेंगे जैसे एक तो हमारी गलती की रेपितिसन बंद हो जाएगी और हम निरंतर स्वयं में सुधार कर पाएंगे। ऐसे में हम हो न हो एक दिन सफल भी जरुर हो जायेंगे। इसलिए हमारे दोनों सिविल सेवा के सफल अभ्यर्थियों ने अपने दोनों शुरूआती प्रयास में असफल होने के बाद भी यही कहा की हम अपनी असफलता को ज्यादा अच्छी प्रकार से देख पा रहे हैं।
और हमारा दूसरा प्रश्न जो था की हम अपनी असफलता को कैसे देख सकते हैं अब उसपर भी लगे हाथ थोड़ी चर्चा कर लेते हैं। जैसी ही हम इस बात को समझ जाते हैं कि असफलता को देखना क्यों जरुरी है हम स्वतः ही आत्म मूल्यांकन की प्रक्रिया से गुजरने लगते हैं और अपने दोषों को देख पाते हैं। यह कोई राकेट साइंस नहीं हैं। व्यक्ति को अपने आत्म मूल्यांकन के बाद हर उस कार्यविधि में परिवर्तन के लिए तत्पर होना होता है जिससे उसे लगता है उसने उसकी सफलता को उससे दूर कर दिया। ऐसे में केवल गधे की तरह मेहनत ही बस करना अनिवार्य नहीं होता बल्कि उसके साथ मेहनत को ज्यादा कारगर बनाने के लिए नित्य निरंतर नए तरीके भी अपनाने होते हैं ।
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