सच जानने के लिए ,
दुःख , पीड़ा और त्याग,
मिलके आग से देखो,
सब है राख ।
रेत में अंगुलियां फेरते थे ।
जो कभी गीली मिट्टी को ,
अँगुलियों का स्पर्श हो गया ।
क्या बन गया ?
ये क्या बना दिया ?
जैसा न पहले कभी किसी ने देखा था ।
केवल कुछ की सोच में आया होगा ।
इसी के जैसा कुछ मिलता जुलता ,
मगर ये नहीं ।
व्यवस्था में मत ढलो ।
लड़ो, भोगों, बदल सको ,
तो बदलों ,
मत भागों ,
जीवन सीमित है ।
मन का है तो भी,
मन का नहीं है तो भी ,
नहीं पता पहले क्या था ।
आगे नहीं पता क्या होगा ?
जब जीवन नहीं होगा ,
मैं नहीं होगा ।
किस-किस के लिए ,
मगर मरने के बाद,
खुद के लिए खुद का ,
क्या होता है ?
मरने के बाद क्या कभी ,
किसी ने देखा ,
मरने वाला रोता है ?
जेब भरती है ,
जेब से पेट भरता ,
फिर बुद्धि मोटी होती है ।
आकांक्षाएँ दुहराने लगती है ।
लोग अपना बोया काटने से डरने लगते है ।
नैसर्गिक मौत के आने से पहले ,
लाइन लगा के पैसे देकर ,
मरने लगते है ।
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