गुरुवार, 8 सितंबर 2016

इंद्रधनुष

हरी भरी धरा,
एक कोना भारत का,
कुछ उठा-सा हुआ ।

श्रृंखलाएं पर्वत की,
इन श्रृंखलाओ के ऊपर,
रंग बिरंगा इंद्र धनुष बना ।

किसी के घर की खिड़की से,
खेत में खड़े किसान की आँखों,
की पुतलियों के भीतर झलकती परछाई में ।
मजदूर के कारखाने की चिमनियों,
के धुएं में ।

दफ्तर में फाइलो के पन्ने पलटे ,
बाबू के लिए ।
बड़े बाबू के लिए ,
अफसर के लिए ,
और अफसर के भी सर के लिए ,
और उनके चेलो चापलूसों के लिए ।

बारिश से लबरेज तंग गलियों में,
ढलुआ टेड़े मेढे रास्तों ,
के किनारे बने किसी घर ,
कि नई दुल्हन के लिए ।
महीन कारीगरी से तराशे गए ,
मेज और कुर्सियों से भरे किताब घर ,
में बैठी हुयी नवयुवती के लिए ।

स्कूल जाती बच्चियों ,
के लिए ।
स्कूल जाते बच्चों के लिए ,
घाटी के नवजवानों के लिए ,
वृधो के लिए ।

घाटी के दहसतगर्द के लिए ,
जवान के लिए ,
इंसान के लिए ।

परिंदे के लिए ,
घाटी के हर बाशिंदे के लिए ,

सुबह-सुबह रात भर जलती ,
अंगीठी को बुझाते हुए ,
थकी आँखों से ,
सूजी हुयी आँखों से ,
हस्ती हुयी आँखों से ,
रोती हुयी आँखों से ,

किसी शमसान से ,
किसी मंदिर से ,
किसी  मस्जिद से ,
किसी गुरुद्वारे से ,
किसी गिरजाघर से ,
किसी इबादत खाने से ,
भगवान के घर से ,

श्रृंखलाएं पर्वत की ,
इन श्रृंखलाओ के ऊपर ,
रंग बिरंगे इंद्र धनुष के मायने ,
सब के लिए एक नहीं है ।
इंद्रधनुष के सारे रंगों को ,
देख सकने की क्षमता ,
सब में नहीं है ।
कुछ के लिए ये बेरंग है ।
या एक रंगी है ।

सभी ने इसमें से अपने निकट का रंग चुना है ।
सफ़ेद तो बिल्कुल गायब हो चुका है ।
घाटी में शांति के सफ़ेद रंग की कमी ।
की कहानी को आखिर किसने बुना है ?

किसान के लिए ये मौका ,
मौसम का हाल परखने का ।
मजदूरों ने देखा ,
इंद्रधनुष में नया रंग काला ।

स्कूल जाती बच्चियों के लिए ,
ये प्रकृति का चमत्कार था ,
उन्होंने इसके बनने का कारण जानना चाहा।
बच्चे भी उत्साह में थे ,
कुछ एक चौके हुए से ,
ध्यान से मास्टर जी की बातों को सब ने सुना ।

नवजवान मौसम की करवट को देख ,
नव उद्यम के लिए तैयार है ।
वृद्ध ने जीवन का आज एक और नया पाठ ,
इंद्रधनुष से भी सीखा ।

मगर घाटी का इंद्रधनुष मंदिर से सारा नारंगी है ।
और मस्जिद से सारा हरा ,
पर भगवान ने तो सात रंगों को ,
आसमान में एक लाइन में पोता था ।
पर फिर ये कैसे ? एक रंगी हो गया  ।

घाटी के जवान ने सातों रंगों ,
के लिए बलिदान होने की ठानी ।

मगर घाटी के दहसतगर्दों ने ,
इंद्रधनुष से कुछ न सीखने की ठानी ।
उनमें से कईयों को तो पता भी नहीं
कि उनकी घाटी में इंद्रधनुष बना था ,
वो अपनी दिमाग को ,
आँख को ,
चेहरे को ,
एक विशेष रंग में रंगने को पगलाये हुए है ।

इंद्रधनुष के मायने सब के लिए थे ।
घाटी के परिंदे और ,
घाटी के बाशिंदे ,
सभी ने बढ़िया मन से दिन को जिया ।
जिसने भी इंद्रधनुष को देखा ,
बस उसी का होकर रह गया ।






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