मंगलवार, 19 अप्रैल 2016

लेटैस्ट ट्रेंड इन सोसाइटी : द पावर ऑफ मनी

लगभग सब कुछ ठीक ही था। जिस समय की बात है उस समय एक बेटा और दो बेटियाँ होना शायद कोई बड़ी बात नहीं थी। घर भी नौकरो से गुलजार था। प्रेमचंद लिखते है निर्मला के लिए  शादी का रिश्ता आया है। रिश्ता एक अच्छे परिवार से आया है, लड़का काफी पढ़ा लिखा और परिवार भी खानदानी है। लेकिन ये क्या? विवाह की तैयारियों के बीच निर्मला के पिताजी की हत्या हो जाती है। अब निर्मला का विवाह उस परिवार मे न हो सकेगा क्योंकि वो बड़े खानदानी है और उनकी नजर लड़की के साथ-साथ लड़की के पिता की दौलत पर भी थी ।

(आर्थिक कारकों को व्यक्ति इतना महत्व क्यों देता है? क्या आर्थिक कारक सचमुच मे महत्वपूर्ण है ? समाज के द्वारा पैसो को महत्व देने पर व्यक्ति भी पैसो को महत्व देने लगता है या व्यक्ति के द्वारा पैसो को महत्व देने पर समाज भी उसी अनुसार चलने लगता है । दोनो मे से कोई भी बात पूरी तरह सही नहीं है । आंशिक रूप से दोनों का ही प्रभाव रहता है। ये एक दूसरे के समानार्थक नहीं अपितु पूरक है।)

अंततः निर्मला का विवाह वहाँ नहीं हो पाया जहा उसके पिता स्वर्गवासी होने के पहले तय करके गए थे , ये केवल नारी के शोषण की गाथा नहीं है, ये उसके अभावग्रस्त और निर्धन होने की मजबूरी है। निर्मला जैसी सुकुमारी का विवाह एक अधेड़ उम्र के सेठ से होने की घटना अधेड़ के केवल सुखवादी होने की बात नहीं है बल्कि उसके धनाढय होनी की खशियत है।

(इसी बीच प्रेमचंद लिख ही देते है पैसा सब कुछ नहीं है लेकिन जो चीज़ सब कुछ है उसके बहुत करीब की चीज़ पैसा है। इसीलिए शायद भगवान विष्णु मोक्षदाता है तो देवी लक्ष्मी धन देवी है । लीजिये सबकुछ के नजदीक तक धन पहुँच गया ।)

इस सब के बीच दो नवजवानों के मन की उधेड़बुन को सुनते है और देखते है आज का मन क्या कहता है ? रोशनी आज के जमाने की लड़की तो नहीं है पर उसे आज के जमाने के अंदाज़ो को अपनाने से गुरेज भी नहीं है। ज्यादतरो की तरह उसने भी अपने साथी के साथ जीने मरने की कसमे खाई थी । लेकिन अचानक समय के गुजरने के साथ क्या हुआ , किसी को पता नहीं ? रोशनी का करीबी उसका हमदर्द, उसका पहला प्यार मृणाल आज एक मध्यम दर्जे की आय कमाता है। उसकी तंखावह कोई 20000 रुपये महीने है , शायद बाद मे बढ़ भी जाए लेकिन अभी तो इतनी ही है । ऐसे मे अगर दोनों की शादी हो जाए तो जितना मैं जनता हूँ मृणाल रोशनी को हर संभव सुख देने का प्रयास करेगा । लेकिन एक दिन रोशनी के लिए एक रिश्ता आता है परिवार काफी खानदानी है , लड़का काफी पढ़ा लिखा है और कमाता भी अच्छा है । ऐसे मे इस बात को रोशनी मृणाल को बताती है और दोनों कुछ बाते करते है –

रोशनी – मुझे तो बहुत अजीब लग रहा है । पता नहीं पिता जी क्या निर्णय लेंगे ? उनको तो मेरे और तुम्हारे बारे मे सब पता है ।
मृणाल – तो वो लड़को वालों को माना क्यों नहीं कर देते ।
रोशनी – कैसे कर दे ? पिता जी कहते है - ऐसा खानदानी परिवार और रिश्ता फिर मिले न मिले क्या पता ?
मृणाल – लड़का मुझे से ज्यादा कमाता है ।
रोशनी- हाँ ! उसकी शुरुआती तंख्वाह कोई 60000 है और पिताजी का कारोबार भी है। महीने के यही कोई मोटा-मोटा डेढ़ लाख रुपये घर आते है ।

क्या इनके बीच की बातो को हमे और आगे भी सुनना चाहिए, मुझे लगता है नहीं । क्योंकि रोशनी एक समझदार लड़की है। उसकी किस्मत अगर निर्मला के जैसे हुयी तो एक हाथ मे उसके मृणाल जैसा प्रेमी है और सब कुछ ठीक रहा तो शानदार कमाऊ पति । हाँ ! मैंने तो मृणाल को रिजैक्ट कर दिया क्योंकि पति कमाऊ ही अच्छा लगता है। वैसे भी समाज में सम्बन्धो को गढ़ते समय लड़के की आय और लड़की की सुंदरता समानुपातिक रूप से तौली जाती है।  

इसप्रकार की द्वन्द्वत्म्क परिस्थितियो मे या तो मृणाल रोशनी से ये कहकर पहले दूर हो जाए कि उसे कोई लाइलाज बीमारी हो गई है और वो ज्यादा दिनो का मेहमान नहीं है। और ऐसा कहने मे कोई हर्ज़ भी नहीं है क्योंकि अभावग्रसत्ता एक बीमारी ही है, एक लाइलाज बीमारी । या इंतज़ार करे कब रोशनी उसे अपने जीवन से निकाल उसी तरह फेंक देती है जैसे लोग दूध मे से मक्खी को निकाल फेंक दिया करते है। 

ऐसे मे क्या ये निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि जो संबंध बनते भले ही भावनाओ के आधार पर है पर उनका जीवनकाल भावनाओ पर नहीं टीका होता । 

गरीबी पैसे का अभाव है और भुखमरी को जनमती है । भुखमरी अनाज की कमी नहीं है । ये पैसो के अभाव मे खाना न खरीद पाने की मजबूरी है। सरकार कहती है जिसके पास पैसा है उसके हिस्से का अनाज गोदाम मे रखा है और जिसके पास पैसे नहीं है उसके हिस्से के अनाज को चूहे खा गए ।

सरकार ने व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए बोलने कि, घूमने कि, कही भी बसने, किसी भी धर्म को मानने कि स्वतन्त्रता तो दी है लेकिन इससे पहले उसने व्यक्ति को समानता दी है। समानता आर्थिक क्रियाओ मे भागीदार होने का। ये समानता के अधिकार के कवर मे आर्थिक स्वतंत्रता का अधिकार छुपा हुआ है। ये आरक्षण केवल समानता नहीं, आर्थिक स्वतंत्रता है क्योंकि वो धन ही है जो जाति से टक्कर ले सकता है। 

दुनिया मे आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद व्यक्ति सिर्फ आयकर विभाग के प्रश्नो का जवाब देने के लिए बाध्य होता है । ऐसा जीवन एकाकी नहीं होता, चाटुकार हमेशा साथ होते है , बोरियत भी नहीं होती ।



रविवार, 17 अप्रैल 2016

अब समय आ गया है कि !!!

" मानवाधिकारों पर लेशमात्र भी आँच आने पर मानवाधिकार आयोग सक्रिय हो जाता है, होना भी चाहिए । क्योंकि मामला भी तो दुनिया के सबसे होनहार, समझदार दो पैरो वाले जीव से जो जुड़ा है । मगर मानवाधिकार अब आत्यंतिक रहने लायक बचे नहीं है क्योंकि मानव अब मानव बचा नहीं है। संविधान ने वो दौर भी देखा जब जमींदारी के लिए भारतीयों को दिए  मानवाधिकारों पर प्रश्न उठे, तो अब भी कई नए प्रश्न उठे है । जब व्यक्ति स्वयं से नहीं समझ रहा तो अब कानून का सहारा लेना ही पड़ेगा । "  
    सभ्यता का विकास भी क्या खूब अंदाज़ से हुआ । पहले समाज शिकारी था फिर पशुचारक और कृषक बना । और आज ज्ञान के गट्ठर ढो रहा है । क्या से क्या हो गए हम  ?

     मगर अब तो एक नया भाग जुड़ेगा या भाग 3 (क) बनेगा । और शीर्षक होगा - पशुओ के मूल अधिकार ।  तो क्या करे । संविधान तो बदलना पड़ेगा । वैसे पहले से एक कानून है बिलकुल अपाहिज शक्तिमान जैसा है , अरे वही शक्तिमान, जिसको उत्तराखंड के बी०जे०पी० विधायक के हाथों अपने  पैर से हाथ धोना पड़ा ।

     ऐसे मे कौन बचाएगा शक्तिमान को ? क्या कहा - कानून । कानून का नाम बता दू , बताता हूँ - पहला है, पशुओ पर अत्याचार रोकथाम अधिनियम, 1960 । लेकिन कानून तो कानून ही है। और दूसरा है ,आईपीसी सेक्शन 429 । आईपीसी मे तो बड़ी जबर्दस्त बात लिखी है,  मैं मूल पंक्तिया ही छापे देता हूँ -  https://indiankanoon.org/doc/3563/  इस लिंक पर जाकर जरूर पढ़े । क्योंकि देने को तो कुछ नहीं लेकिन धरे गए ।  जैसे की विधायक जी धरे गए है तो पाँच साल की सजा तक हो सकती है ।

      ऐसो मे एक बात तो साफ है जानवर मारने - पीटने की चीज़ न है । उनको भी दर्द होता है । और वो भी रोतो है ।  


      लेकिन आज कल ये आम आदमी की दिल्ली सरकार मे जनवरन की खैर नहीं है । अभी विडियो शेयर हो रहा है की कोई ग्रीन पार्क मेट्रो स्टेशन की सीढ़ी मे बैठकर कुत्तन को चाकू से घायल कर रहा है । और एक पिल्ला का तो उसने वध भी कर दिया । कुत्तो का सिरियल किल्लर पैदा हो गवा है । एक दम राक्षस हो गवा है। लेकिन पुलिस भी विडियो को खंगाल के उको पकड़ ही ली । लेकिन इतने मे काम नहीं बनने वाला । पता चला है दिल्ली का गौतम बुध नगर जनवरन की कब्रगाह बन गया है । सबसे ज्यादा बेजुबानों पर अपराध वही हो रहे हैं ।


     ये हाल तो राजधानी का है । उसके बाद देश पर नजर डाले तो, खबरों की हैड लाइन कुछ ऐसी मिलती है - एक व्यक्ति कर रहा था, कुत्ते के साथ बलात्कार । प्यासे जानवर को इतनी बेदर्दी से मारा की चली गई उसकी जान । जानवरो को बूचड़खाने मे कितनी क्रूरता से मारा जाता है वो तो मुद्दा ही नहीं है, गाय को छोड़कर ।  हाँ ! अगर कोई नोनवेज खाने को दे तो एक बार ऐसे मे पूछना जरूर बनता है , ये क्या है ? क्योंकि आजकल सब कुछ उपलब्ध है ।

     दुनिया मे ऐसे देश भी है जहा जानवरो से बेहतर बर्ताव किया जाता है लेकिन शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहा मांसाहार के नाम पर उनको न काटा जाता हो इसलिए मांसाहार को छोड़कर बचे जानवरो पर किए जा रहे बर्ताव को ध्यान मे रखकर देखते है तो पता चलता है लगभग ज़्यादातर पश्चमी देश जहा इंसान मजे से है वहा जानवर के भी मजे है । ऐसे मे नाम गिनने से कुछ खास मिलने वाला नहीं ।
     क्योंकि जब रुस या अमेरिका लंबी दूरी की इंटेर्कोंटीनेंटल मिसाइल इराक या सीरिया पर दगता होगा तो क्या वहा के जानवर बच जाते होंगे। नहीं वो भी राख उनके मालिक भी राख । बिलकुल वैसे ही जैसे हड़प्पा कालीन कब्र की खुदाई मे मानव की अस्थियो के साथ कुत्ते के भी अस्थिपंजर मिले थे। मुसीबत मे गेंहू के साथ घुन भी पिस्ता है । अबे , जानवर आतंकवादी थोड़ी है । जानवर जिहादी थोड़ी है । गधा या बकरा इस्लामिक स्टेट का वफादार कब से हो गया ? लेकिन हो गया जानवर जो ठहरे । उनकी कौन सुनता है ?

      सेंसरबोर्ड भी क्या बैन करता है ? घंटा । अच्छे अच्छे डाइलॉग मे बीप गुसा गुसा के उनकी बीप बीप एक कर देता है । लेकिन अगर डाइलॉग कुत्तो पर हो तो क्या बात ।  गोविदा बोलते है - " जब दस कमीने मरते है तो एक कुत्ता पैदा होता है , मैं पूछता हूँ गोविंदा को ये दिव्य ज्ञान कैसे हुआ ? नहीं पता ।  इसके बाद सुरवीन चावला बोलती है - पागल कुत्ता और आवारा हाथी दोनों बंदूक की गोली के लिए बने हैं । और अंतिम मे बसंती इन कुत्तो के सामने मत नाचना । एक और ये वाला पक्का अंतिम है - जगिरा जी बोलते है इंडिया गेट मे मेरे मन को भाया मैं कुत्ता काट के खाया । मैं पूछता हूँ ये सब क्या है , माइ लॉर्ड । यही इंसाफ है । कानून की देवी कब तक आंखो मे इसी तरह  पट्टी बांध के रखेगी और उसके कुत्ते जुल्म सहते रहेंगे और हाँ ! घोडा और हाथी भी ।
   
      इसके बाद डबल्यूडबल्यूएफ़ , पेटा , वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन सोसाइटी ऑफ इंडिया और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एनिमल वेलफ़ैर जैसी संस्थाए क्या कर रही है ? कुछ तो करनाल मे भैस का क्लोने पैदा कर रही , कुछ चीता पकड़ रही , कुछ बाघ की गिनती कर रही , गंगा की डॉल्फ़िन बचा रही , चंबल से डोलफिनो को निकाल के दूसरी नदी मे डाल रही । या गिद्ध बचाओ, गौरैया बचाओ , गाय बचाओ, शेर बचाओ । यही सब चल रहा है । लेकिन ऐसे मे घोडा , कुत्ता और गधे का हाल पूछने वाला कोई नहीं है । बिलकुल अकेले पड़ गए है ये ।
    मैं पूछता हूँ आदमी का बच्चा किसके साथ खेलेगा , कुत्ते के साथ । आदमी का बच्चा किसकी सवारी करेगा , घोड़े की । और यही कष्ट मे है ।
 
    इसलिए कुत्ते को भोकने दे क्योंकि  कुत्ते तब ज्यादा भोकते है जब वो अकेलापन महसूस करते है । उनकी भावनाओ को समझे और उनपर अत्याचार करना बंद करे। और देश मे पशुओ के अधिकार की मांग जायज है इसका समर्थन करे। जानवरो से ही दुनिया गुलजार है  क्योंकि इंसान जानवर बन गया है  और  बेजुबान इंसान ही काम के है और वो कम  रह गए है । 
 
 
  

रविवार, 10 अप्रैल 2016

यह एक सामान्य व्यवहार है !!!

सुअर धरती में रहने वाले,
कुछ होशियार जानवरो में से है।
यहाँ तक की उन कुत्तों और बिल्लियों से भी ज्यादा, जिनके साथ हम रहते हैं । 
डॉल्फ़िन और हाथियों की तरह,
सुअर समझते है कि दर्पण कैसे काम करता है ?
और उन्हें कुछ सरल वीडियो गेम,
खेलना भी आता है ।

जब रात में वो सोते है ,
तो उन्हें सपने आते हैं ।
और उसके बच्चे अपना नाम जानते है,
और उत्तर देते हैं, जब उन्हें पुकारा जाता है ।
कुत्तों की तरह ही,
सुअर भी वफादार और स्नेही होते हैं ।
उन्हें उनका पेट अच्छे से रगड़े जाना पसंद है ।

बाड़ भले ही उनके और बच्चों के लिए भयानक था ।
लेकिन इसने उनकी जान बचाई ।
एक फैक्ट्री फॉर्म में,
अपना जीवन,
एक छोटे से धातु के पिंजड़े में बिताते हैं। 
जिसमेँ वो बड़ी मुश्किल से हिल डुल पाते हैं ।
वो ऐसे तंग परिस्थितियों में रखे जाते हैं,
जहाँ तनाव और मानसिक उतेजना की कमी
उनको पागल कर देती है ।

उनके बच्चे उनसे जन्म के बाद ही,
दूर कर दिए जाते हैं।
और बिना दर्द नाशक के ,
उन्हें बधिया बनाया जाता है।
और उनकी पूँछ भी काट दी जाती है।

वो बीमार होते, या
वो काफी तेजी से विकसित नहीं होते,
तो उनका सर ज़मीन पर पटक कर,
मर दिया जाता है ।
या उन्हें डिब्बे में फेंककर,
गैस देकर मर दिया जाता है।
यह सब आम है। 

पुराने सुअरों के बच्चे गंदे बाड़े में ठूस दिए जाते हैं।
वो एक भी दिन बाहर नहीं बिताते हैं।
उन्होंने कभी भी अपनी पीठ पर,
सूरज को महसूस नहीं किया ।
और न ही अपने पैरों के नीचे घास को ।

सिर्फ छह महीने की उम्र में,
उन्हें परिवहन ट्रको में भरकर,
उनका वध करने वाले करखानों में,
उन्हें भेज दिया जाता है ।
जहाँ उन्हें उल्टा लटका कर रखा जाता है।
बिजली के चिमटे से छेद किया जाता है,
और गले को काट दिया जाता है ।
सभी फार्म सुअरों के साथ,
अविश्वसनीय क्रूरता के साथ पेश आते हैं।
यह एक सामान्य व्यवहार है ।

सोमवार, 4 अप्रैल 2016

अनगिनत छेद है ।

बीते सालों में,
ज्यादातर घर पर ही रहा ।
घर की अपनी महिमा होती है।
घर निजता प्रदान करते हैं,
और निजी मामले भी तैयार करते हैं।

जो हर मामले को,
निजी करके टालता हो,
उसे व्यक्तिगत विषयोँ पर टिप्पणियॉ,
कम ही मिलती है ।

समाज और व्यक्तिगत जीवन में,
कुछ तो अन्तर होना चाहिए,
और सारा जीवन ही,
व्यक्तिगत नहीं होना चाहिए।

जैसे दीवारों के कान होते है ।
वैसे ही घर की दीवारों में,
एक और भी बात होती है,
तोड़ने और जोड़ने की,
क्यों कि जब बात,
हद से ज्यादा बढ़ जाती है तो,
ये ऐसे ही समाज से हमें जोड़ती है ।

अब जब मौके आए है,
महसूस करने को कि,
क्या क्या गलत किया था, मैंने?
ताकि सुधार,
गलतियों के आदत में ,
तब्दील होने से पहले,
पहल हो जाए।
तो मालूम होता है कि ,
ऐसे दल-दल में फंसे हुए को देखकर,
जिंदगी कि नई सीख समझाईस यही है ।
कि अम्मा की हर बात का तपाक से ,
जवाब न देकर, मौन हो जाये ।

वैसे भी अपनी ग़लतियाँ खुद को कहाँ दिखती है ?
वो तो दूसरों में नुक्स और नखरे गिना रहे थे तो,
याद आया ऐसा तो कुछ हमारे पास भी है ।
मगर अब जब समझ ही गए है ।
तो बात को क्यों इतना घुमाना,
जो जब समझा सो तब सुधरा ।

क्षणिकाए


(१ )
अँधेरी गलियों में चलते हुए ,
भयक्रांत मन को सँभालने के लिए ,
साहस को तौलकर पाता हूँ,
कि सचमुच गलियाँ सुनसान और खतरनाक हो गई है।

(२ )
दुनिया में एक दिन गुजारने  के बाद ,
जब आपने  बने बिगड़े कामों का हिसाब करता हूँ।
पाता हूँ कि अपने काम बनाने में।
मैं दुनिया से भी निचे गिर गया हूँ,
और बचे हुए समय जैसा कि है ही ,
ये दुनिया के जितना मैं बिगड़ के,
अपने बिगड़े काम बना न  सका।

(३)
किसी को कहते सुना था कभी ,
कभी ऐसे ही नज़र पड़ गई तो हो सकता है पढ़ा भी हो ,
कि सफलता कठिन परिश्रम मांगती है,
और मास्टर जी भी कहते है -
परीक्षा में सफल होना है तो पहले सरल सवाल किया करो।
मैं पूछता हूँ -
क्या सरल सवाल को ढूंढना सरल है ?
हो भी जाता है जब पेपर कठिन न हो ,
मुझे जंहा तक याद है।
मैंने तो पेपर कठिन ही देखे है।
मगर उनमे से अक्सर सरल सवाल ढूंढ ही लिया करता था।
 मगर ये काम भी  परिश्रम का होता था।

मंगलवार, 24 नवंबर 2015

एक अनन्त गहरा कुँआ !!!!

घनी झाड़ियों में छिपा हुआ,
एक अनंत गहरा कुँआ।
पाताल तक गहरा,
शायद उससे भी ज्यादा
कहते थे ऐसा सभी,
जब भी इसमें फेंका पत्थर,
जानने को कितना गहरा ?
आज तब एक आवाज नहीं किया।
गूँगा है,
बूढ़ा भी है।
अंदर के दीवारों की छपाई,
उधड़ गई है।
कोई अब नहीं जाता है उसके पास,
मनहूस भी है।
कहते थे ऐसा सभी,
लील ही लेता है।
जो भी गिरता है इसमें।

पता नहीं क्यूँ,
पर कई तो कूदे थे इसमें,
आज तक एक आवाज नहीं आई।
भूखा भी है।

आम हलचल से दूर,
अकेला पड़ा,
झाड़ियों ने जिसके मुँह को है ढक रखा।
एक अनन्त गहरा कुँआ।

मैंने एक दिन उसमें झाँका,
और आवाज़ लगाई ।
ओये! कुँए कब तक नहीं बोलेगा?
इतने दिनों तक चुप रहकर
शायद बोलना ही भूल गया।

हर बरसात के बाद मुँह में पानी,
भर कर बैठ जाता है।
इस बार सूखे,
पर कुछ तो बोलेगा।

अकेला अनमना सा,
उदास होगा शायद,
इसकी पसंद का ही कुछ
देकर देखता हूँ।
कितना कुछ व्यर्थ पड़ा है।
मेरे पास,

लेकिन कितना कुछ डालकर देखा,
एक आवाज़ न आई।
अब कि बार एक ऐसी चीज़,
उसके पास लेकर गया दिखाने को,
जो मेरी मनपसंद थी ।
मैं सतर्क था पर पता नहीं,
कैसे हाँथ से छूट गई ।

मैं चिल्लाया,
अंदर से भी वैसी ही आवाज़ आई।
मेरे पास से गई।
और उसको मिल गई।
एक के बाद एक,
मैं और कुँआ ।
उसका नाम पुकारते रहे।

तब से आज तक,
कुँए ने वही बोला।
जो मैं बोलता हूँ।

मैं ने पूँछा,
क्यों रे कुँए ?
मेरी दी हुयी चीज़ इतनी पसंद आ गई।
मैं तब से,
जवाब के इंतज़ार में चुप हूँ,
और शायद कुँए को अब मुझ से,
बात करने में दिलचस्पी रही नहीं।







कल रात माता का मुझे ईमेल आया है ।

ज्यादातर हिन्दू भगवान की मूर्तियों में -
१) भगवान खड़े रहते हैं।
२) भगवान आशीर्वाद दे रहे होते हैं। 
३) भगवान के हाथों में अस्त्र-शस्त्र होते हैं।
    
     ( पिछले दिनों एक गाना बड़ा प्रचलित था। जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे - कल रात माता का मुझे ईमेल आया है माता ने मुझे फेसबुक पर बुलाया है। ये बात आज हास्यास्पद लग सकती है। लेकिन सोचिये जब भगवान की मूर्ति के हाथों में इलेक्ट्रानिक गैज़ेट होंगे, एक हाथ में लैपटॉप, दूसरे में स्मार्ट फ़ोन हो। तब ये सोचना बिलकुल लाजमी होगा की माता का ईमेल मुझे क्यों नहीं आया ? )

     मूर्ति का निर्माण अक्सर एक पूर्वधारणा लेकर किया जाता है । एक परिस्थिति सोची जाती है उसके बाद मूर्ति का निर्माण किया जाता है । मूर्तिकला चित्रकला का थ्री डायमेंशनल व्यू होता है इसलिए मूर्ति का प्रभाव मानव मन पर भी चित्र से कहीँ अधिक होता है । चित्रकला से मूर्तिकला की तनिक सी समानता के कारण चित्र कला के किंचित आधारभूत गुण एक आदर्श मूर्ति से भी अपेक्षित होते हैं।
      हमारी नैतिकता का एक स्रोत धर्म है। धर्म हमें नैतिकता के आधार भगवान को अपना आराध्य मानने की अपेक्षा रखता है । सामान्यतः भगवान को मानने से बहुदा धार्मिक व मनोवैज्ञानिक उलझनों का जवाब सरलता से मिल जाता है । 
       परंतु यहाँ प्रश्न यह नहीं है। सोचने की बात ये है कि शक्तिपीठों में स्थापित पिंडो से लेकर बुद्ध और महावीर की ऊर्ध्वाधर गगन चुम्बी मूर्तियों की व्यवहारिकता कितनी है ? अर्थात् ये मूर्तियाँ केवल आशीर्वाद दे सकती है क्या ? ये हमें एक गैर लचीले नियम में बाँधती है जिसमें भगवान से हमारा रिश्ता फिक्स हो गया है। 
       पिछले दिनों हिंदी के जाने माने अख़बार पर एक लेख पढ़ा । लेख हनुमान जी की बदसूरत सी दिखने वाली मूर्ति पर था । लेखक का मानना था जब हमारी चेतना में हनुमान जी की इतनी शक्तिशाली छवि है तो उनकी ऐसी मरियल सी मूर्ति बनाना कैसे उचित हो सकता है ? यूरोप के देवताओं की नंगी मूर्तियों को देख कर हमें शर्म आ जाती है इस प्रकार का भाव मन में आना में ही उस मूर्तिकार की सफलता है । शर्म तो हमें आती है उनके लिए तो धरोहर है। 
       जो बात कहने के लिए इतनी भूमिका बांधी गई वो बात बहुत साधारण सी है कि जगजीत सिंह के एक वीडियो में एक बच्ची राम को अपना भाई मानती है। देश में कौन से मंदिर में राम जी मूर्ति को देख कर पाँच साल की लड़की को उसमें अपना भाई दिखेगा ? निश्चय ही किसी में भी नहीं । इसीप्रकार फेसबुक पर एक फ़ोटो तैर रही है जिसमेँ लगभग 5-6 साल की बच्ची हनुमान जी की मूर्ति से गले मिल रही है और मूर्ति तब भी आशीर्वाद दे रही है । मेरा मानना है एक ऐसी मूर्ति बननी चाहिए जिसमेँ भगवान से गले मिलने का सुख भी मिल सके और लगे भगवान भी हमसे गले मिलने में सहज मासूस कर रहे है क्योंकि निकटता से प्रेम बढ़ता है। 
        नैतिकता का बीज बचपन में बोया जाता है इसलिए मंदिरों में मूर्तियाँ बच्चों का मनोविज्ञान ध्यान में रख कर बनानी चाहिए न की तलवार, भाला लिए हुए और सिर्फ आशीर्वाद देते हुए।

    

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

निराश मत होओ, सब ठीक हो जायेगा

"निराशा से सिर्फ मन घायल होता है, हमारी नसमझी हमारी जान ले लेती है । "

      मनोनुकूल जीवन न होने के कारण निराश होना मन का स्वाभाविक लक्षण है। ऐसे में किसी के यह कहने पर की "निराश मत होओ सब ठीक हो जायेगा "। सिर्फ और सिर्फ कोरा झूठ प्रतीत होता है जो कि मन बहलाने के लिए बोला जा रहा है । हालाँकि हो सकता है, ऐसा बोलने वाला हमारा हित ही चाहता हो फिर भी उसकी इन बातों से मन का हाल और जीवन का अकाल दोनों ही दूर तो नहीं हो पायेगा । और इसकी जकड़न के बढ़ने का परिणाम अत्यंत भयवाह होता है । निराश और हताश व्यक्ति ही आत्महत्या करते हैं। मच्छर और मक्खी से बचने के लाख जुगत भिड़ने वाला मनुष्य खुद को मर लेगा । सुनने भर से विश्वास नहीं होता । आत्महत्या की ऊँची दर वैश्विक समस्या है । विश्व में, हर 40 सेकेण्ड में एक मनुष्य खुद को मर लेता है । 
      देख लिया इतनी खतरनाक चीज़ है निराशा। निराशा और कुछ नहीं मनुष्य के पञ्च चिर शत्रुओं का ही ऐसा मिश्रण है जिसमें इन पाँचों के विपरीत गुण भरे हुए है । उदाहरण के लिए सामान्यत: निराश व्यक्ति स्वतः भले क्रोध, काम, लोभ से बचा रहे पर उससे जुड़े अन्य लोगों में वह इन भावों को बोता और सींचता रहता है । निराश व्यक्ति वास्तव में चलता फिरता शांति विनाशक यंत्र है । 
       ऐसे में निराशा के साथ किये गए प्रयोग के कुछ संभावित परिणाम अग्र लिखित है । शायद ये आपकी या आपके किसी अपने के मन से निराशा को दूर कर आशा का संचार कर सके । और हाँ ये प्रयास उस एक बेकार लाइन से लाख गुना अच्छे है जिसमें कथा कथित शुभचिंतक ये कहते है कि 'निराश मत होओ सब ठीक हो जायेगा' । ऐसे में एक ही बात बोलने का मन करता है-" घण्टा ठीक हो जायेगा, आप के ऊपर आएगा तब पता चलेगा और तब देखूँगा कैसे सब अपने आप ठीक होता है ?"


(१) सबसे पहले निराशा को मन का स्वाभाविक गुण मानते हुए अपनी निराशा को और उसके कारण को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना चाहिए । ऐसा करने से आपको अपनी भावनाओं की सही समझ बनेगी । कभी-कभी निराशा के कारण इतने संश्लिष्ट होते है कि उनको पहचानना कठिन होता है । ऐसा करके आप खुद को जान पाएंगे । और सबसे मजेदार बात आप यह जान पाएंगे कि किसी विषय में कौन-सी बात आपको सबसे ज्यादा मानसिक स्तर पर चुभ रही है और तब आप अनायास ही मन ही मन कहेंगे "ओ तेरी, अबे इस बात को लेकर मैं इतना परेशान हूँ । " व्यक्ति केवल चिंतन न करने के कारण सामान्य सी बातों को भी नज़रअंदाज़ कर देता है । ऐसा करने से बचें ।

(२) अपने जीवन की परिस्थितियों को आप से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता । हाँ हाँ ! वो चाहे कितना बड़ा बाबा या फ़क़ीर हो । दूसरों से जल्दबाजी में अपने भाव शेयर न करें । क्योंकि वो कुछ नहीं कर सकते वो केवल वही घिसी पिटी पञ्च लाइन " निराश मत होओ......." दे सकते हैं । और आपके इस कुत्सित मानसिक दशा से बाहर निकलने के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं । इस तरह का हर असफल प्रयास आप को और निराश के दलदल में धकेलते जायेंगे ।

(३) यह बिंदु सबसे महत्त्वपूर्ण है । समस्या को पहचान जाने के बाद उसके वास्तविक हल का विकल्प खोजें (बस इतनी सी ही बात है) । यह उपाय अखंड, अपराजेय, सब मन शोक निवारक, विशेष तरीकों से सिद्ध किया हुआ है । यह उपाय किसी भी निराशाग्रस्त मन से उसके निराशा के कारण को क्षण भर में तो नहीं हटा सकेगा पर हाँ हटाना शुरू जरूर कर देगा । अब समस्या बढ़ेगी नहीं । धीरे-धीरे ही सही उपचार होने लगेगा ।
एक आम जीवन की परंतु काल्पनिक-सी परिस्थिति को लेकर इसका परिक्षण करके देख सकते है जैसे कि मान लेते हैं कोई परीक्षार्थी किसी अमुक 'सफलता' की प्राप्ति की आकांक्षा में मेहनत करता है और हर बार विफल हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसके मन में निराशा घर कर जायेगी । कुछ भी करने का उसका मन नहीं करेगा । और इस मनः दशा के साथ उसका जीवन दिन ब दिन कठिन होता जायेगा । सम्भावना है कि एक विषम दिन वो आत्महत्या भी कर ले । ऐसी स्थिति में यदि विकल्प रूप में उसे शीघ्रता से कोई अन्य सफलता मिल जाती है तो निश्चितरूप से उसकी निराशा में कमी आएगी ।

कुछ अन्य अवलोकन का भी सहारा लेकर इसे समझ सकते हैं । मान लेते है कि कोई व्यक्ति किसी बड़े व प्रतिष्ठित संस्थान से इंजीनियरिंग करना चाहता था परंतु ऐसा नहीं हो पता है तो वह किसी अन्य संस्थान से भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर सकता है । और यदि वो ऐसा कर पता है तो उसके जीवन में कम से कम इस कारण से कभी भी स्थाई और दृढ़ निराशा नहीं छायेगी ।

(४) विकल्पों की जहाँ भी बहुलता होगी । वहाँ निराशा के मामले कम मिलेंगे । व्यक्ति सिर्फ अपनी आकाँक्षाओं की पूर्ती करना चाहता है । स्वाभाविक सी बात है जब एक ही प्रकार की इच्छा कई लोग पालेंगे तो कुछ को निराशा और विफलता हाथ लगेगी ही परंतु ऐसे में भी मनुष्य को चाहिए की तुलनात्मक रूप से समानान्तर विकल्प की तलाश करते हुए सदा आशावादी बने रहने का प्रयास करना चाहिए ।

"निराशा से सिर्फ मन घायल होता है हमारी न समझी हमारी जान ले लेती है । "

सोमवार, 16 नवंबर 2015

मुझे तो जाना ही था ।

खोजते हुए ठिकाना,
मेरा वहाँ आना,

शायद वो दो थे,
एक हो ही पाना ।
बाजू वाली कुर्सी पे नज़र पड़ते ही,
मेरा समझ जाना,
और चुप चाप वहाँ से चले जाना,
मुझे तो जाना ही था ।

किसने सोचा था,
होगी ऐसी मुलाकात,
आँखों का टकराना ।
न मुझे कुछ कहना था ।
और न उसने कुछ कहाँ,
ऐसा ही होगा पता था ।
रो रो कर खुद को समझाना ।
की मुझे तो जाना ही था ।

ऐसा कैसे हो गया ?
मैंने कभी खुद के लिए,
जो नहीं माँगा,
वो कैसे मैं समझ गया ।
करीब एक घंटे बिताने का इरादा था मेरा,
पर पता नहीं क्या हुआ,
मैं उठा और सेकंड भर में वहाँ से चला गया,
क्योंकि मुझे तो जाना ही था ।

ये बात उसको कैसे बताता,
की उसकी विवश्ता को,
समझता हूँ मैं न ।
इसलिए तो ,
कुछ कहे बिना ही चला गया ।

क्योंकि मुझे तो जाना ही था। 

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में न्याय को अपने हाथ में लेने का जूनून तथा कंगारू न्याय की सोच  कँहा तक जायज है ? क्या दिमापुर घटनाक्रम ने भारत की न्याय व्यवस्था की लचर स्थिति को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है ?
 भारत, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जिसकी आबादी लगभग सवा सौ करोड़ के पास है । विश्व में इतनी बड़ी आबादी के साथ संसाधनों के सदुपयोग को सुनिश्चित करने के साथ संसाधनों का विकास एक बड़ी चुनौती और समस्या है । संसाधनों में सबसे महत्वपूर्ण मानव संसाधन है । मानव ही अपनी विवेक अनुसार अन्य संसाधनों का उपयोग करता है इसप्रकार आर्थिक समृद्धि ही सामाजिक विकास सुनिश्चित करता है ।
        अशिक्षित और अकुशल मानव संसाधन देश के लिए बोझ के सामान है और सामाजिक बुराई में वृद्धि करता है । अविकसित मानव संसाधन वाले समाज में अपराधों का दर भी अधिक होता है इसलिए एक अति विशाल और कार्यशील न्यायतंत्र की जरूरत होती है । परंतु भारत की व्यापक जनसंख्या के लिए यहाँ का न्याय तंत्र अपर्याप्त, लचर और बहुत धीमा प्रतीत होता है।
         भारत में आधुनिक न्याय व्यवस्था का शुभारम्भ  1772 से हो गया था। जिसमें  पूर्ववर्ती ब्रिटिश सरकार और स्वतंत्र भारत की सरकार के द्वारा आवश्यक सुधार किये गए परंतु सुधार की मांग की तुलना में आपूर्ति के अत्यंत धीमे होने के कारण अधिकांश मामलो में न्याय व्यवस्था की आलोचना की जाती है ।
         न्याययिक मामलो में भ्रष्टाचार, वकीलो के द्वारा मांगी गई ज्यादा फीस, न्यायप्रक्रिया का धीमापन और ताकतवर के पक्ष में ही न्याय होने की मान्यता ने सामान्य जान मानस में लोकतान्त्रिक न्यायव्यवस्था में विश्वास रखने की बजाय कंगारू न्याय को अपनाने की ओर बढ़ रहे है । ऐसा होने पर मात्र आरोप के आधार पर सजा दिया जाने लगेगा इसमें न्याय होने की गुंजाईश बिलकुल शून्य हो जायेगी ।
          भीड़ का न कोई चेहरा होता है और न ही कोई दिशा । कंगारू न्याय या सड़क पर न्याय की प्रवृत्ति लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलने का परिचायक है । जो की किसी भी शर्त पर अस्वीकार्य है ।