सोमवार, 4 अप्रैल 2016

क्षणिकाए


(१ )
अँधेरी गलियों में चलते हुए ,
भयक्रांत मन को सँभालने के लिए ,
साहस को तौलकर पाता हूँ,
कि सचमुच गलियाँ सुनसान और खतरनाक हो गई है।

(२ )
दुनिया में एक दिन गुजारने  के बाद ,
जब आपने  बने बिगड़े कामों का हिसाब करता हूँ।
पाता हूँ कि अपने काम बनाने में।
मैं दुनिया से भी निचे गिर गया हूँ,
और बचे हुए समय जैसा कि है ही ,
ये दुनिया के जितना मैं बिगड़ के,
अपने बिगड़े काम बना न  सका।

(३)
किसी को कहते सुना था कभी ,
कभी ऐसे ही नज़र पड़ गई तो हो सकता है पढ़ा भी हो ,
कि सफलता कठिन परिश्रम मांगती है,
और मास्टर जी भी कहते है -
परीक्षा में सफल होना है तो पहले सरल सवाल किया करो।
मैं पूछता हूँ -
क्या सरल सवाल को ढूंढना सरल है ?
हो भी जाता है जब पेपर कठिन न हो ,
मुझे जंहा तक याद है।
मैंने तो पेपर कठिन ही देखे है।
मगर उनमे से अक्सर सरल सवाल ढूंढ ही लिया करता था।
 मगर ये काम भी  परिश्रम का होता था।

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