मंगलवार, 24 नवंबर 2015

एक अनन्त गहरा कुँआ !!!!

घनी झाड़ियों में छिपा हुआ,
एक अनंत गहरा कुँआ।
पाताल तक गहरा,
शायद उससे भी ज्यादा
कहते थे ऐसा सभी,
जब भी इसमें फेंका पत्थर,
जानने को कितना गहरा ?
आज तब एक आवाज नहीं किया।
गूँगा है,
बूढ़ा भी है।
अंदर के दीवारों की छपाई,
उधड़ गई है।
कोई अब नहीं जाता है उसके पास,
मनहूस भी है।
कहते थे ऐसा सभी,
लील ही लेता है।
जो भी गिरता है इसमें।

पता नहीं क्यूँ,
पर कई तो कूदे थे इसमें,
आज तक एक आवाज नहीं आई।
भूखा भी है।

आम हलचल से दूर,
अकेला पड़ा,
झाड़ियों ने जिसके मुँह को है ढक रखा।
एक अनन्त गहरा कुँआ।

मैंने एक दिन उसमें झाँका,
और आवाज़ लगाई ।
ओये! कुँए कब तक नहीं बोलेगा?
इतने दिनों तक चुप रहकर
शायद बोलना ही भूल गया।

हर बरसात के बाद मुँह में पानी,
भर कर बैठ जाता है।
इस बार सूखे,
पर कुछ तो बोलेगा।

अकेला अनमना सा,
उदास होगा शायद,
इसकी पसंद का ही कुछ
देकर देखता हूँ।
कितना कुछ व्यर्थ पड़ा है।
मेरे पास,

लेकिन कितना कुछ डालकर देखा,
एक आवाज़ न आई।
अब कि बार एक ऐसी चीज़,
उसके पास लेकर गया दिखाने को,
जो मेरी मनपसंद थी ।
मैं सतर्क था पर पता नहीं,
कैसे हाँथ से छूट गई ।

मैं चिल्लाया,
अंदर से भी वैसी ही आवाज़ आई।
मेरे पास से गई।
और उसको मिल गई।
एक के बाद एक,
मैं और कुँआ ।
उसका नाम पुकारते रहे।

तब से आज तक,
कुँए ने वही बोला।
जो मैं बोलता हूँ।

मैं ने पूँछा,
क्यों रे कुँए ?
मेरी दी हुयी चीज़ इतनी पसंद आ गई।
मैं तब से,
जवाब के इंतज़ार में चुप हूँ,
और शायद कुँए को अब मुझ से,
बात करने में दिलचस्पी रही नहीं।







कल रात माता का मुझे ईमेल आया है ।

ज्यादातर हिन्दू भगवान की मूर्तियों में -
१) भगवान खड़े रहते हैं।
२) भगवान आशीर्वाद दे रहे होते हैं। 
३) भगवान के हाथों में अस्त्र-शस्त्र होते हैं।
    
     ( पिछले दिनों एक गाना बड़ा प्रचलित था। जिसके बोल कुछ इस प्रकार थे - कल रात माता का मुझे ईमेल आया है माता ने मुझे फेसबुक पर बुलाया है। ये बात आज हास्यास्पद लग सकती है। लेकिन सोचिये जब भगवान की मूर्ति के हाथों में इलेक्ट्रानिक गैज़ेट होंगे, एक हाथ में लैपटॉप, दूसरे में स्मार्ट फ़ोन हो। तब ये सोचना बिलकुल लाजमी होगा की माता का ईमेल मुझे क्यों नहीं आया ? )

     मूर्ति का निर्माण अक्सर एक पूर्वधारणा लेकर किया जाता है । एक परिस्थिति सोची जाती है उसके बाद मूर्ति का निर्माण किया जाता है । मूर्तिकला चित्रकला का थ्री डायमेंशनल व्यू होता है इसलिए मूर्ति का प्रभाव मानव मन पर भी चित्र से कहीँ अधिक होता है । चित्रकला से मूर्तिकला की तनिक सी समानता के कारण चित्र कला के किंचित आधारभूत गुण एक आदर्श मूर्ति से भी अपेक्षित होते हैं।
      हमारी नैतिकता का एक स्रोत धर्म है। धर्म हमें नैतिकता के आधार भगवान को अपना आराध्य मानने की अपेक्षा रखता है । सामान्यतः भगवान को मानने से बहुदा धार्मिक व मनोवैज्ञानिक उलझनों का जवाब सरलता से मिल जाता है । 
       परंतु यहाँ प्रश्न यह नहीं है। सोचने की बात ये है कि शक्तिपीठों में स्थापित पिंडो से लेकर बुद्ध और महावीर की ऊर्ध्वाधर गगन चुम्बी मूर्तियों की व्यवहारिकता कितनी है ? अर्थात् ये मूर्तियाँ केवल आशीर्वाद दे सकती है क्या ? ये हमें एक गैर लचीले नियम में बाँधती है जिसमें भगवान से हमारा रिश्ता फिक्स हो गया है। 
       पिछले दिनों हिंदी के जाने माने अख़बार पर एक लेख पढ़ा । लेख हनुमान जी की बदसूरत सी दिखने वाली मूर्ति पर था । लेखक का मानना था जब हमारी चेतना में हनुमान जी की इतनी शक्तिशाली छवि है तो उनकी ऐसी मरियल सी मूर्ति बनाना कैसे उचित हो सकता है ? यूरोप के देवताओं की नंगी मूर्तियों को देख कर हमें शर्म आ जाती है इस प्रकार का भाव मन में आना में ही उस मूर्तिकार की सफलता है । शर्म तो हमें आती है उनके लिए तो धरोहर है। 
       जो बात कहने के लिए इतनी भूमिका बांधी गई वो बात बहुत साधारण सी है कि जगजीत सिंह के एक वीडियो में एक बच्ची राम को अपना भाई मानती है। देश में कौन से मंदिर में राम जी मूर्ति को देख कर पाँच साल की लड़की को उसमें अपना भाई दिखेगा ? निश्चय ही किसी में भी नहीं । इसीप्रकार फेसबुक पर एक फ़ोटो तैर रही है जिसमेँ लगभग 5-6 साल की बच्ची हनुमान जी की मूर्ति से गले मिल रही है और मूर्ति तब भी आशीर्वाद दे रही है । मेरा मानना है एक ऐसी मूर्ति बननी चाहिए जिसमेँ भगवान से गले मिलने का सुख भी मिल सके और लगे भगवान भी हमसे गले मिलने में सहज मासूस कर रहे है क्योंकि निकटता से प्रेम बढ़ता है। 
        नैतिकता का बीज बचपन में बोया जाता है इसलिए मंदिरों में मूर्तियाँ बच्चों का मनोविज्ञान ध्यान में रख कर बनानी चाहिए न की तलवार, भाला लिए हुए और सिर्फ आशीर्वाद देते हुए

    

गुरुवार, 19 नवंबर 2015

निराश मत होओ, सब ठीक हो जायेगा

"निराशा से सिर्फ मन घायल होता है, हमारी नसमझी हमारी जान ले लेती है । "

      मनोनुकूल जीवन न होने के कारण निराश होना मन का स्वाभाविक लक्षण है। ऐसे में किसी के यह कहने पर की "निराश मत होओ सब ठीक हो जायेगा "। सिर्फ और सिर्फ कोरा झूठ प्रतीत होता है जो कि मन बहलाने के लिए बोला जा रहा है । हालाँकि हो सकता है, ऐसा बोलने वाला हमारा हित ही चाहता हो फिर भी उसकी इन बातों से मन का हाल और जीवन का अकाल दोनों ही दूर तो नहीं हो पायेगा । और इसकी जकड़न के बढ़ने का परिणाम अत्यंत भयवाह होता है । निराश और हताश व्यक्ति ही आत्महत्या करते हैं। मच्छर और मक्खी से बचने के लाख जुगत भिड़ने वाला मनुष्य खुद को मर लेगा । सुनने भर से विश्वास नहीं होता । आत्महत्या की ऊँची दर वैश्विक समस्या है । विश्व में, हर 40 सेकेण्ड में एक मनुष्य खुद को मर लेता है । 
      देख लिया इतनी खतरनाक चीज़ है निराशा। निराशा और कुछ नहीं मनुष्य के पञ्च चिर शत्रुओं का ही ऐसा मिश्रण है जिसमें इन पाँचों के विपरीत गुण भरे हुए है । उदाहरण के लिए सामान्यत: निराश व्यक्ति स्वतः भले क्रोध, काम, लोभ से बचा रहे पर उससे जुड़े अन्य लोगों में वह इन भावों को बोता और सींचता रहता है । निराश व्यक्ति वास्तव में चलता फिरता शांति विनाशक यंत्र है । 
       ऐसे में निराशा के साथ किये गए प्रयोग के कुछ संभावित परिणाम अग्र लिखित है । शायद ये आपकी या आपके किसी अपने के मन से निराशा को दूर कर आशा का संचार कर सके । और हाँ ये प्रयास उस एक बेकार लाइन से लाख गुना अच्छे है जिसमें कथा कथित शुभचिंतक ये कहते है कि 'निराश मत होओ सब ठीक हो जायेगा' । ऐसे में एक ही बात बोलने का मन करता है-" घण्टा ठीक हो जायेगा, आप के ऊपर आएगा तब पता चलेगा और तब देखूँगा कैसे सब अपने आप ठीक होता है ?"


(१) सबसे पहले निराशा को मन का स्वाभाविक गुण मानते हुए अपनी निराशा को और उसके कारण को स्पष्ट रूप से स्वीकार करना चाहिए । ऐसा करने से आपको अपनी भावनाओं की सही समझ बनेगी । कभी-कभी निराशा के कारण इतने संश्लिष्ट होते है कि उनको पहचानना कठिन होता है । ऐसा करके आप खुद को जान पाएंगे । और सबसे मजेदार बात आप यह जान पाएंगे कि किसी विषय में कौन-सी बात आपको सबसे ज्यादा मानसिक स्तर पर चुभ रही है और तब आप अनायास ही मन ही मन कहेंगे "ओ तेरी, अबे इस बात को लेकर मैं इतना परेशान हूँ । " व्यक्ति केवल चिंतन न करने के कारण सामान्य सी बातों को भी नज़रअंदाज़ कर देता है । ऐसा करने से बचें ।

(२) अपने जीवन की परिस्थितियों को आप से बेहतर और कोई नहीं समझ सकता । हाँ हाँ ! वो चाहे कितना बड़ा बाबा या फ़क़ीर हो । दूसरों से जल्दबाजी में अपने भाव शेयर न करें । क्योंकि वो कुछ नहीं कर सकते वो केवल वही घिसी पिटी पञ्च लाइन " निराश मत होओ......." दे सकते हैं । और आपके इस कुत्सित मानसिक दशा से बाहर निकलने के विश्वास को कमजोर कर सकते हैं । इस तरह का हर असफल प्रयास आप को और निराश के दलदल में धकेलते जायेंगे ।

(३) यह बिंदु सबसे महत्त्वपूर्ण है । समस्या को पहचान जाने के बाद उसके वास्तविक हल का विकल्प खोजें (बस इतनी सी ही बात है) । यह उपाय अखंड, अपराजेय, सब मन शोक निवारक, विशेष तरीकों से सिद्ध किया हुआ है । यह उपाय किसी भी निराशाग्रस्त मन से उसके निराशा के कारण को क्षण भर में तो नहीं हटा सकेगा पर हाँ हटाना शुरू जरूर कर देगा । अब समस्या बढ़ेगी नहीं । धीरे-धीरे ही सही उपचार होने लगेगा ।
एक आम जीवन की परंतु काल्पनिक-सी परिस्थिति को लेकर इसका परिक्षण करके देख सकते है जैसे कि मान लेते हैं कोई परीक्षार्थी किसी अमुक 'सफलता' की प्राप्ति की आकांक्षा में मेहनत करता है और हर बार विफल हो जाता है। ऐसी स्थिति में उसके मन में निराशा घर कर जायेगी । कुछ भी करने का उसका मन नहीं करेगा । और इस मनः दशा के साथ उसका जीवन दिन ब दिन कठिन होता जायेगा । सम्भावना है कि एक विषम दिन वो आत्महत्या भी कर ले । ऐसी स्थिति में यदि विकल्प रूप में उसे शीघ्रता से कोई अन्य सफलता मिल जाती है तो निश्चितरूप से उसकी निराशा में कमी आएगी ।

कुछ अन्य अवलोकन का भी सहारा लेकर इसे समझ सकते हैं । मान लेते है कि कोई व्यक्ति किसी बड़े व प्रतिष्ठित संस्थान से इंजीनियरिंग करना चाहता था परंतु ऐसा नहीं हो पता है तो वह किसी अन्य संस्थान से भी इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी कर सकता है । और यदि वो ऐसा कर पता है तो उसके जीवन में कम से कम इस कारण से कभी भी स्थाई और दृढ़ निराशा नहीं छायेगी ।

(४) विकल्पों की जहाँ भी बहुलता होगी । वहाँ निराशा के मामले कम मिलेंगे । व्यक्ति सिर्फ अपनी आकाँक्षाओं की पूर्ती करना चाहता है । स्वाभाविक सी बात है जब एक ही प्रकार की इच्छा कई लोग पालेंगे तो कुछ को निराशा और विफलता हाथ लगेगी ही परंतु ऐसे में भी मनुष्य को चाहिए की तुलनात्मक रूप से समानान्तर विकल्प की तलाश करते हुए सदा आशावादी बने रहने का प्रयास करना चाहिए ।

"निराशा से सिर्फ मन घायल होता है हमारी न समझी हमारी जान ले लेती है । "

सोमवार, 16 नवंबर 2015

मुझे तो जाना ही था ।

खोजते हुए ठिकाना,
मेरा वहाँ आना,

शायद वो दो थे,
एक हो ही पाना ।
बाजू वाली कुर्सी पे नज़र पड़ते ही,
मेरा समझ जाना,
और चुप चाप वहाँ से चले जाना,
मुझे तो जाना ही था ।

किसने सोचा था,
होगी ऐसी मुलाकात,
आँखों का टकराना ।
न मुझे कुछ कहना था ।
और न उसने कुछ कहाँ,
ऐसा ही होगा पता था ।
रो रो कर खुद को समझाना ।
की मुझे तो जाना ही था ।

ऐसा कैसे हो गया ?
मैंने कभी खुद के लिए,
जो नहीं माँगा,
वो कैसे मैं समझ गया ।
करीब एक घंटे बिताने का इरादा था मेरा,
पर पता नहीं क्या हुआ,
मैं उठा और सेकंड भर में वहाँ से चला गया,
क्योंकि मुझे तो जाना ही था ।

ये बात उसको कैसे बताता,
की उसकी विवश्ता को,
समझता हूँ मैं न ।
इसलिए तो ,
कुछ कहे बिना ही चला गया ।

क्योंकि मुझे तो जाना ही था। 

शनिवार, 24 अक्टूबर 2015

भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में न्याय को अपने हाथ में लेने का जूनून तथा कंगारू न्याय की सोच  कँहा तक जायज है ? क्या दिमापुर घटनाक्रम ने भारत की न्याय व्यवस्था की लचर स्थिति को कटघरे में लाकर खड़ा कर दिया है ?
 भारत, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है जिसकी आबादी लगभग सवा सौ करोड़ के पास है । विश्व में इतनी बड़ी आबादी के साथ संसाधनों के सदुपयोग को सुनिश्चित करने के साथ संसाधनों का विकास एक बड़ी चुनौती और समस्या है । संसाधनों में सबसे महत्वपूर्ण मानव संसाधन है । मानव ही अपनी विवेक अनुसार अन्य संसाधनों का उपयोग करता है इसप्रकार आर्थिक समृद्धि ही सामाजिक विकास सुनिश्चित करता है ।
        अशिक्षित और अकुशल मानव संसाधन देश के लिए बोझ के सामान है और सामाजिक बुराई में वृद्धि करता है । अविकसित मानव संसाधन वाले समाज में अपराधों का दर भी अधिक होता है इसलिए एक अति विशाल और कार्यशील न्यायतंत्र की जरूरत होती है । परंतु भारत की व्यापक जनसंख्या के लिए यहाँ का न्याय तंत्र अपर्याप्त, लचर और बहुत धीमा प्रतीत होता है।
         भारत में आधुनिक न्याय व्यवस्था का शुभारम्भ  1772 से हो गया था। जिसमें  पूर्ववर्ती ब्रिटिश सरकार और स्वतंत्र भारत की सरकार के द्वारा आवश्यक सुधार किये गए परंतु सुधार की मांग की तुलना में आपूर्ति के अत्यंत धीमे होने के कारण अधिकांश मामलो में न्याय व्यवस्था की आलोचना की जाती है ।
         न्याययिक मामलो में भ्रष्टाचार, वकीलो के द्वारा मांगी गई ज्यादा फीस, न्यायप्रक्रिया का धीमापन और ताकतवर के पक्ष में ही न्याय होने की मान्यता ने सामान्य जान मानस में लोकतान्त्रिक न्यायव्यवस्था में विश्वास रखने की बजाय कंगारू न्याय को अपनाने की ओर बढ़ रहे है । ऐसा होने पर मात्र आरोप के आधार पर सजा दिया जाने लगेगा इसमें न्याय होने की गुंजाईश बिलकुल शून्य हो जायेगी ।
          भीड़ का न कोई चेहरा होता है और न ही कोई दिशा । कंगारू न्याय या सड़क पर न्याय की प्रवृत्ति लोकतंत्र के भीड़तंत्र में बदलने का परिचायक है । जो की किसी भी शर्त पर अस्वीकार्य है ।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

मुझे भी अब चुभने लगा है !

"यदि मुझे अपनी जाति को भूल कर आरक्षण सही लगता है तो अपनी आर्थिक स्थिति को याद करके उतना ही गलत भी लगता है"
"आरक्षण का विरोध जायज है और उस विरोध का समर्थन भी पर .र..र..र..र न्तु। "

      घर में सबसे बड़े होने के कारण पहले सभी से बहुत सारा प्यार और दुलार मिलता था । जैसे-जैसे छोटे भाई और बहन परिवार में आते गए । अब वो बात नहीं रही, किसी चीज़ को बाँटना मेरे लिए बहुत कठिन हो गया। अचानक से सेंटर ऑफ़ अट्रैक्शन कहीँ और शिफ्ट हो गया था। उस वक्त 5 साल की उम्र में ये समझना कठिन था कि ये अचानक सब को क्या हो गया। वैसे ये तो बेहद सरल सा नियम है कि जिस भी चीज़ का मार्केट में विकल्प उपलब्ध हो जायेगा उसकी यू. एस. पी. पर बट्टा लगना तो तय है। अब जीवन में प्रतिस्पर्धा सा अनुभाव होने लगा परन्तु प्रतिस्पर्धा में तो कोई न कोई विजेता होता है । मगर यहाँ तो घरेलु समाजवाद आ गया था जिसमें " क्षमता के अनुसार काम और आवश्यकता के अनुसार सुविधाएं " का नियम चलता था। अब बस सोचने को रह गया था कि वो भी क्या दिन थे ?  किसी ने सच ही कहा है कि समाजवाद सिर्फ सोचने में अच्छा लगता है ।
       लेकिन यहाँ पर बालकाण्ड से इस लेख का  श्रीगणेश करने का क्या औचित्य हो सकता है ? कुछ तो जरूर होगा तभी लिखा गया है। 

        50 के दशक से पहले तक अंग्रेजों की गुलामी सबसे बड़ी राष्ट्रीय समस्या थी। इससे  निजात पाने के लिए दलितों, किसानों और जनजातियों ने भी संघर्ष किया था तो नवनिर्मित राष्ट्र किसी एक को महत्त्व कैसे दे सकता है ?

        ऐतिहासिक परिदृश्य में देखे तो जब तक समाज की संरचना इस प्रकार की थी कि उच्च वर्ण सत्ता, संसाधन और शक्ति का एकमात्र उपभोगकर्ता था तब तक तो सब ठीक था । मगर जैसे ही देश में लोकतंत्र के आने के बाद सभी के साथ और सभी के विकास की बात होने लगी तो पहले से स्थापित जमींदारो, पूंजीपतियों के पेट में दर्द उठना स्वाभाविक था। अब जन्म जात स्वामित्व छीनने वाला था, जो कल तक बराबरी में चलने की हिम्मत नहीं करते थे वो अब साथ में बैठने वाले थे । सिर्फ बाहर से कानूनी दबाव के कारण भाईचारे का दिखावा तो कर लिया पर अंदर से अभी भी उतनी ही दूरियाँ थी।
        
         1949 में पास हुए संविधान के कुछ अनुच्छेद उन चुनिंदा जातियों को जो पिछड़ी हुयी है और जिनका सरकारी नौकरी में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं उनके लिए सकारात्मक कार्यवाही के माध्यम से आरक्षण की व्यवस्था की। इस नई व्यवस्था से जिनको फायदा था उनका प्रसन्न होना और जिनको ऐसा लग रहा था कि  उनके साथ अन्याय हुआ है उनका क्रोधित होना अपेक्षित था। 

           आज देश के आजाद होने के बाद के 68 साल बीत जाने के बाद ऐसे क्या कारण हो सकते है ? कि बहुत प्रयास करने पर भी ऐसा लगने लगा है कि आरक्षण का विरोध भी जायज है और उस विरोध का समर्थन भी ।

इस सम्बन्ध में निम्न तथ्य व तर्क प्रस्तुत है :
           
(1) आरक्षण व्यवस्था के विरोध में सर्वाधिक उठाया जाने वाला सवाल है, आखिर कब तक ? कोई तो तारीख होगी जब यह व्यवस्था ख़त्म होगी ? कोई तो वह लक्ष्य होगा जिसकी प्राप्ति के बाद ये घोषणा की जायेगी कि अब से आरक्षण ख़त्म । यद्यपि संविधान सरकारी नौकरी और पिछड़ेपन के उन्मूलन को आरक्षण का लक्ष्य मानता है । पर क्या भरोसा? कल को पिछड़ेपन की नई परिभाषा गढ़ ली जाये । जिस देश में आज तक गरीबी की सटीक परिभाषा निर्धारित कर नहीं पाये वे पिछड़ापन क्या बताएँगे ? और जहाँ तक बात सरकारी नौकरी में भागीदारी की रही तो ऐसा क्यों लगता है सरकार को कि दलित सरकारी नौकरी ही करेंगे। मोदी जी के स्टार्ट अप इंडिया, मेक इन इंडिया, मुद्रा बैंक, सामाजिक बैंकिंग, स्किल इंडिया में आरक्षित वर्गों को उद्यमशीलता के लिए भी प्रोत्साहित कर सकते है ।
      'डिक्की' नामक संगठन दलित उद्यमशीलता को बढ़ावा भी देता है ।

(2) जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था में समय के साथ कई कमियाँ उजागर हुयी है। जिनमें से एक तो दलित आरक्षित जाति के भीतर ही अति/महा दलित आज भी अपने वर्ग के ऊपरी तबके के लोगों द्वारा शोषित है । फलस्वरूप आरक्षण का लाभ संपूर्ण आरक्षित वर्ग को न होकर सिर्फ कुछ चुनिंदा लोगों तक सीमित होकर रह गया है ।

(3) चूँकि वर्तमान समय में देश डिजिटल क्रांति और तेज आर्थिक समृद्धि के दौर से गुजर रहा है । इस दौर में सभी अर्थशास्त्री एक स्वर में महंगाई को अपरिहार्य बता रहे है । अगले कई दशकों तक ऊँची महंगाई दर इसी प्रकार बनी रहेगी । इस माहौल में जीवित रहने के लिए
देश सस्ता अनाज, तेल, नमक सभी जाति के गरीबों और वंचितों को दे रहा है तो सरकारी नौकरी और शिक्षण संस्थान में आरक्षण क्यों नहीं दे सकता ?

(4) आरक्षण व्यवस्था का लाभ एक बार ले चुकने के बाद भी ठीक आर्थिक स्थिति वाले परिवार कई पीढ़ियों तक इसका अवैध लाभ लेते रहते हैं जो कि अनुचित और अन्याय है। इसको रोकने का सरकार को प्रयास करना चाहिए ।

(5) एक अत्यंत रोचक तथ्य और तर्क इस व्यवस्था के विपक्ष में यह है कि अनुसूचित जाति के मुस्लिम और ईसाइयों को आरक्षण सिर्फ धर्मान्तरण के भय से नहीं दिया जा रहा । यह किस हद तक उचित है ?
      
       इसके अतिरिक्त कई अन्य ख़ामियाँ भी हो सकती है जिनका वर्णन न करने का कारण उनके प्रति मेरी अनभिज्ञता है ।

       कोई भी व्यवस्था पूर्णतः सही नहीं हो सकती। कुछ न कुछ ख़ामियाँ समय के साथ रेंगते हुए प्रवेश कर ही जाती है इसलिए सरकार को चाहिए की एक विशेषज्ञ कमिटी के माध्यम से व्यवस्था में विद्यमान त्रुटियों को दूर करने के सम्बन्ध में आवश्यक सिफारिशें ग्रहण करे और देश में बढ़ रहे आरक्षण के विरुद्ध रोष को समय रहते सीमित और नियंत्रित करें । अन्यथा गुजरात से शुरू हुयी यह चिंगारी कब भयवाह अग्निकांड में तब्दील हो जायेगी पता भी नहीं चलेगा ।
      

      
        

गुरुवार, 17 सितंबर 2015

जो देखता हूँ वही लिखता हूँ ।

( दृश्य ) अपनी छोटी बेटी और सबसे छोटे लड़के के साथ एक मुस्लिम महिला । लड़की सर झुककर ही बैठी रही, काफी निस्तेज सी । अपनी माँ की जिम्मेदारियों को देखकर शायद सहमी हुई सी। छोटा बेटा मोबाइल में गेम खेलने की ज़िद लिए मोबाइल माँ के हाथों से छीनने के असफल प्रयास करता हुआ । माँ का मन चिंताग्रस्त था । तभी मोबाइल में मैं हूँ डॉन की रिंगटोन के बजने पर फ़ोन को उठाने के बाद की बातचीत के अंश अग्रलिखित है ।
     " आफ़ताब ! हाँ हाँ । सब ख़ैरियत । बड़े वाले लड़के की तबियत अब ठीक है । (माँ की आँखों में आँशु आ गए ) मझोले की तबियत बहुत ख़राब है । छोटे वाले को अभी अस्पताल से इंजेक्शन दिला के आ रही । उसको कुत्ता काट लिया था । " 
      हाल ही में आये धर्म आधारित जनगणना के आंकड़े पहले ही मेरे नादान से हिन्दू हृदय को कचोट रहे है । उस पर इस प्रकार का मार्मिक दृश्य देख कर सचमुच हृदय पसीज जाता है । एक माँ और चार बेटे और एक बेटी । मुसीबत के समय में किस-किस की सेवा करे । ऊपर से घर के काम भी देखने होते है । ये है जनसंख्या विस्फोट जिसकी लपटे जब तब इंसान को जलाती रहती है । 

इस दृश्य को देखने के बाद उठे विचारों को एक एक कर नीचे लिखे देता हूँ, ठीक लगे तो मान लीजियेगा :


(1) सब कहते हैं कि मुसीबतों को झेलने के बाद ही इंसान मजबूत बनता है और मजबूती से शक्ति आती है । शक्ति के अर्जन पर जिम्मेदारी आती है । एक जिम्मेदार मुस्लिम महिला के पास मोबाइल होना चाहिए । भले ही ये मुसीबतों की देन है पर किंचित खुलेपन का द्योतक भी तो है । नहीं तो कहा फतवा के फेर में मोबाइल बिना चूड़ियों वाले हाथों में आने वाला था । माँ के हाथ में मोबाइल की पहुँच निश्चय ही बेटी को भी इसके लिए उकसायेगी । 
    इस्लाम के नाम पर जितना लश्कर-ए-तोएबा ने भारत में बम से तबाही मचाई है उतनी और बल्कि उससे ज्यादा तबाही इस समाज ने महिलाओं के मूलभूत अधिकारों को छिन के मचाई है । बस किसी तरह भारत की हर मुस्लिम बाला बन जाये 'मलाला' तो समझो काम हो गया।


(2) जनसंख्या किसी भी समाज की बढ़े अंततः प्रत्यक्ष रूप से कष्ट उस समाज को और उसके बाद देश को झेलना पड़ता है । 
      वैसे ही इतनी महंगाई है । उसके बाद दिल्ली जैसे मेट्रो शहरोँ में प्रवसन के कारण जनसंख्या का जमघट लग गया है । खाने को अनाज पुज नहीं पा रहा है । न्यूनतम जरूरत तक लोग पूरा नहीं कर पा रहे । गंदगी से बुरा हाल है । डेंगू का प्रकोप चरम स्तर पर है । डेंगू के इलाज के लिये शहर भर के पपीते के पेड़ नंगे हो चुके है और बकरी का दूध 2000 रूपये प्रति लीटर बिक रहा है । इतने पर भी नहीं समझियेगा की "हम दो हमारे दो " का स्लोगन सरकार ने ट्रक और ऑटो के पिछवाड़े का सूनापन कम करने के लिए नहीं दिया था । इस भीषण महंगाई में कैसे सबल और सकुशल श्रमिक तैयार करेंगे यही सबसे बड़ी चुनौती है । भारत विश्व का सबसे युवा देश होने के इस सुनहरे अवसर के लाभ को भुनाते हुए फिलहाल नहीं दिख रहा है। 

(3) एक नारी के जीवन की व्याख्या प्रश्नों के अबूझ गट्ठर से ही हो सकती है । जिनके उत्तर वेदना और वेदना की सीमा के निरन्तर उतार चढ़ाव के दौरान शरीर पर खिंची अनगिनत आड़ी तिरछी रेखाएँ बयाँ करती है ।       
               " पीड़ा ही व्यक्ति में ज्ञान के स्रोत के उद्गम द्वार को खोलती है । पीड़ा ही जीवन है । " 
          
सर झुका कर बैठी हुई उस लड़की के मन की सबसे बड़ी कुंठा क्या होगी ? क्या लडकियाँ मौन रहने को, सर झुकाने को, सिर्फ बाते मानने को ही होती है ? क्या कभी किसी को अपनी दयनीय स्थिति का निवारण अपने धर्म को छोड़ने में छिपा हुआ लग सकता है ? क्या लव जिहाद जैसी घटनाएँ प्रेमजाल न होकर धर्म, समाज और पारिवारिक बन्दिशों को ठेंगा दिखने की तरकीब है ? इन प्रश्नों के और इनके अतिरिक्त कई अनगिनत प्रश्नों के प्रकोप से घायल उस मासूम से चेहरे में सुंदरता बची ही नहीं थी । क्या यही उसका भाग्य है ?
               इसके अतिरिक्त अपने सम वयस्क भाई की तरह क्यों वह भी मोबाइल में गेम खेलने की ज़िद नहीं कर रही थी ?
                
(4) कुछ भी हो इतनी तकलीफों के बाद भी मोबाइल का रिंगटोन " मैं हूँ डॉन" शाहरुख़ खान की पिक्चर वाला था । 
                    
चीजों को लिख देने से उन पर विश्वास पक्का हो जाता है और भरोसे की एक अपनी अलग नज़र होती है । जिस नज़र से देखने पर सब कुछ सच लगने लगता है । इसलिए जो देखता हूँ वही लिखता हूँ । फ़ोन पर बातचीत खत्म करते हुए बोले गए आखिरी लफ़्ज के साथ यही विराम लेता हूँ ।

"Salawalikum"
                
       
       

शनिवार, 27 जून 2015

"सबसे अच्छा दिन, सबसे भाग्यशाली दिन, सबसे मजेदार दिन वो दिन होता है जिस दिन सभी आपको आपके जन्मदिन की बधाई देते है न की वो दिन जिसकी तारीख आपके जन्म दिनाँक से मेल खाती है । "

क्षणिकाएँ

         (1)
आस पास लोग है ।
और उन्ही में से कुछ की ,
आवाज़ लगातार आती रहती है ।
नए आते है ।
उठती आवाज़ों में ,
अपनी भी आवाज़ घोलते है ।
कुछ जाते है ।
खालीपन छोड़ जाते है ।
सिर्फ उनके लिए जिन्होंने ,
उनको आते और जाते देखा था ।

           (2)
रंग बदलते रहते है ।
सभी हलचल ध्यान नहीं खिंच पाते ।
आँखे खुली हुई है ।
क्या कुछ नया है ?
पुराने में क्या नया है ?
आज किसने क्या पहना है ,
कौन क्या देखता है ?
देखो, वो आ गई ।
कपड़ो का रंग मैच कर रहा है ।
आँखे आँखों में पता नहीं क्या देखती है ?

            (3)
बिलकुल भी समय नहीं है ।
सब कुछ बीतता जा रहा ।
व्यस्तता का अपना आनंद है ।
शांत हो जाने के कितने नुकसान है ।
साँसे रुक जाये,
नहीं ?
तो जिंदगी क्यों रुक जाये ।
एक दिन की सन्डे की छुट्टी के मजे
का आधार 6 दिन की मेहनत में है ।










आर्थिक आरक्षण : एक सोच ऐसी भी

जाति निरपेक्ष आरक्षण व्यवस्था, जो की गरीबी और अमीरी पर आधारित होती है आर्थिक आरक्षण कहलाती है, ऐसे में गरीब ब्राह्मण और क्षत्रिय भी आरक्षन का लाभ ले सकेंगे । 1991 में नरसिम्हा राव की सरकार ने तात्कालिक तौर पर इसका प्रयास किया था परंतु माननीय सुप्रीम कोर्ट के यह पूछने पर की यह आर्थिक आरक्षण किस आधार पर दिया जायेगा सरकार के द्वारा आज तक जवाब नहीं दिया गया । जवाब न दे पाने का कारण ऐसी व्यवस्था को न लाने की मंशा नहीं अपितु ऐसी किसी भी भरोसे मंद व्यवस्था का अभाव है जिसके आधार पर यह निर्धारित किया जा सके कौन गरीब है ?

भारत में 2001 की जनगणना के अनुसार कुल कार्य शील जनसँख्या लगभग 40 करोड़ है । जिसमे से लगभग 3.5  करोड़ लोग टैक्स देते है और इस 3.5 करोड़ में से 89% लोग की आय 5 लाख से कम है । एक और बात कृषि से हुई आय पर टैक्स नहीं लगता है इस बात का लाभ उठा कर हर जमींदार गरीब बनकर आरक्षण लेगा, इसको कैसे रोकियेगा ।

इतना ही नहीं भारतीय समाज में टैक्स चोरी के कारण काला धन की समस्या किसी से छुपी हुई नहीं है ।

हालात इतने ख़राब है की बी.पी. एल. कार्ड सबसे पहले उसका बनता है जिसे उसकी सबसे कम जरुरत है ।

वर्तमान में जाति आधारित व्यवस्था सबसे सही है जब तक उपरोक्त वर्णित समस्याओं का हल नहीं हो जाता । आज भी मलाई दार परत और गैर मलाई दार परत के बीच के विभाजन का भी दुरूपयोग हो रहा है । फर्जी आय प्रमाण पत्र कितनी आसानी से बन जाता है सब जानते है ।

आरक्षण को जाति के आधार पर करने का मूल कारन भारतीय समाज की संरचना है । जिसमे जाति केवल सामाजिक मामला न होकर के सामाजिक आर्थिक मामला है । अर्थात् धन एवं संपत्ति का जमाव उच्च जातियों के पास अधिक है और वही शोषण कर्ता भी है ।

यदि इतने पर भी जिस किसी को लगता हो की उसके " समानता के अधिकार का हनन हुआ है तो मैं रोज सुप्रीम कोर्ट (जोकि दिल्ली में प्रगति मैदान मेट्रो स्टेशन के पास है) के सामने से गुजरता हूँ तो एक दिन रुक के पी. आई. एल. पीड़ित के नाम से डाल देता हूँ ।

या फिर जिस किसी को भी वर्तमान आरक्षण व्यवस्था में लगता है सुधार की जरुरत है वो ज्यादा उचित और दोष रहित व्यवस्था के साथ सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रख सकता है । व्यवस्था निश्चय ही बदल जायेगी ।

आलोचना करना आसान है परंतु सुधार के उपाय बताना उतना ही कठिन । और सबसे आसान उपाय बताये - "अपना सरनेम भूल कर सोचिये सब सही लगेगा ।"