रविवार, 2 नवंबर 2014

"समस्या मैं नहीं, मेरे जैसा होना है।"

आज कल अजीब सा संयोग अनुभव कर पा रहा हूँ की मेरे आस - पास जो भी लोग अनायास ही उपस्थित होते है उनमें और मुझमे कुछ समानता होती है । मैं जानता हूँ , एक स्तर तक यह सामान्य सी बात है परन्तु भला मैं क्यों सीधी बात कहने लगा । ऐसी बात लायेंगे की आप की भृकुटी तन जाये और थोडा नहीं ठीक- ठाक मात्रा में आपका नजरिया बदल जाये। मैं बात कर रहा हूँ उन परिस्थितियों की जब आप अनजाने में अपने काल्पनिक करीबियों से सांसारिक करीबी बढ़ने के लिए अतार्किक और मनोंकूल समानताएँ गढ़ने लगते हैं । और तब कहना पड़ता है कि " समस्या मैं नहीं, मेरे जैसा होना है । "
      बात इतनी भी सीधी नहीं है , लेकिन कोई बात नहीं ; मिलकर बना देंगे । यही तो दिक्कत है जो लोग मिलने- मिलाने की बात करने लगते है और इसी बात में जब दो लोग मिल जाते है तो बाते उठती है कि मुझमें और तुममे बहुत समानता है परन्तु इस समानता जनित समस्या का आधार दोनों के स्वाभाव में अहंकार का परिपाक होना भी है और तब मुझे दुबारा कहना पड़ता है " समस्या मैं नहीं , मेरे जैसा होना है " । अब आप ही देख लीजिये अवधारणाओं को " मैं " और "मेरे " में समेटने से क्या झलकता है ? निश्चय ही घोर अहम् और स्वार्थ ।
    ये असहजता से शुरू हुए संबंधो की एक मात्र विशेषता नहीं अपितु संपूर्ण संस्कृति की उन पंक्तियों के लिए चुनौती है जिनमे रब ने जोड़ी बनाने का ठेका लिया हुआ है और संबंधो के तोड़ने का अधिकार मानव ने और इतने पर भी समानताएँ खोजी जाती है; शुरुआत से सामंजस्य नहीं । और तब चौथी बार कहना पड़ता है " समस्या मैं नहीं , मेरे जैसा होना है "
      
     

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