शनिवार, 1 नवंबर 2014

यह " मैं " का अहम् से प्रश्न है ।

" वर्तमान के सुखों के आलोक में भूतकाल के दुखों को भूल सकना अत्यंत कठिन है । "

    इस एक पंक्ति को डोरी मानकर अपने विचारवान मन उपवन से रंग-रंग के विचार सुमन से माला गुथने का प्रयास ही आगामी वाक्यों में व्यक्त किया गया है और इसकी पूरी सम्भावना है कि मेरी मानसिक फुलवारी के पुष्पों से जड़ित माला , पुष्पों का रंग एवं गंध और संपूर्ण उपवन की संरचना आपको संदिग्ध लग सकती है । परन्तु हाँ , सारी बात की एक बात , मैंने जानबूझ कर  माला को गुथने के लिए पुष्पों को चुनते हुए आर्थिक परिस्थितियो को अन्य सभी चुनाव के आयामों में सर्व महत्वपूर्ण माना है । इस बिलकुल पिछली पंक्ति के बाद अब कुछ लोग ही सारी बात पड़ना चाहेंगे मगर उनके विचलन का कारण यदि उनके मंतव्य की भिन्नता है तो ये और कुछ नहीं बिलकुल ऐसी ही बात है जैसे कोई कहता है कि मेरे हृदय में क्रोध और लालच नहीं है । इसका सीधा अर्थ इतना सा है कि वह क्रोध और लालच को नहीं पहचानता अन्यथा शेष सभी एक से है।
    सुख और दुःख में अत्यंत घनिष्ठ सम्बन्ध है । परन्तु इस बार बात थोड़ी नई है , क्योंकि ऐसे सारे संबंधो से सभी पूर्व परिचित है । याद करिए आपने भूतकाल को और उस समय की असहनीय, वजनी , अनिवार्य सी आर्थिक तंगी को जिसमेँ पैसो को सबसे जरुरी जरूरतों की पूर्ती के लिए आपको बचाना पड़ा हो । क्या यह अभाव के क्षणों में जोड़ी गई सम्पति से अर्जित सुखों को सुख की संज्ञा देना उचित होगा ? अब एक बार फिर पहली पंक्ति को ध्यान करिए और आप पाएंगे की ये जीवन का कोई नया दर्शन या मानसिक परिष्करण नहीं अपितु यह साधारण से कथन के प्रारूप में " मैं " का अपने पुष्ट अहंकार से किया गया प्रश्न है । जिसका उत्तर खोजने जब आप बैठेंगे तो आप के पैरों तले की जमीन के खिसक जाने में ही आपके भविष्य कालिक आनंद की सम्भावना छुपी हुई है ।  यह कठिन है , जैसा की इस रचना के शुरू से ही था कि आप अपने सारे वर्तमान के सुखों के स्त्रोतों का चयन इस आधार पर नहीं कर पाएंगे , जिनमे आपके व्यक्तिगत किये जाने वाले निर्णयों के परिणामस्वरुप आपको कम और आपके माता - पिता को अधिक आनंद मिले और न ही इस आधार पर जिसमे भूतकाल के वेदना से अर्जित दृष्टी और यातना जनित दृष्टा का अपमान और अवहेलना का भाव केंद्र में हो ।
    
  

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