अपनी बुराइया देख सकने ,
की क्षमता होनी चाहिय ।
ये पंक्तिया बड़ी आसानी से ,
किसी भी नैतिकता के औजार पर ,
छापी हुई मिल जाएँगी ।
मुझे लगता है ,
इससे जीवन स्वर्ग मय हो गया है , पता नहीं ?
मुझे ऐसा कोई अनुभव याद नहीं ।
मगर नारकीय पीड़ा के ज्वर से ,
पूरा सरीर तप रहा है ।
आसुओ के बहने का कारन ,
मेरे दोषों का सरीर से निकलना मात्र नहीं है ।
ये मेरे समझ की कीमत की ,
आदायगी भी हो सकती है ।
ज्यादा कुछ नहीं, बस भूलभुलैया वाले बगीचे का नक्शा है। कुछ मुरझाए हुए फूल है जिनकी गंध अभी बाकि है । अधसड़े फल है जिनको किनारे से बचा के खाया जा सकता है और भँवरे-तितलियों की गैर मौजूदगी के कारण माली झींगुरों की सभ्यता को सहेजने के लिए .........
बुधवार, 1 अक्टूबर 2014
क्षणिकाएँ
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